Sunday, 18 February 2024

श्री महाराज जी द्वारा बतलाया गया भक्ति का निम्नलिखित मूल सिद्धांत हमेशा याद रहना चाहिए हमें, तभी भक्ति किया जा सकता है नहीं तो भटकने का पुरा चांस रहता है ।

श्री महाराज जी द्वारा बतलाया गया भक्ति का निम्नलिखित मूल सिद्धांत हमेशा याद रहना चाहिए हमें, तभी भक्ति किया जा सकता है नहीं तो भटकने का पुरा चांस रहता है ।

1. सबसे पहले भक्ति क्या है ? 
तो भक्ति भगवान और गुरू से प्रेम करने के भावक क्रिया का नाम है । भगवान और गुरू से मन के अटैचमेंट करने के साधना को साधन भक्ति करना कहते हैं । और मन जब पुरी तरह अटैच्ड हो जाए तो उसे सिद्ध भक्ति कहते हैं । 

2.भक्ति किसकी करनी है ? 
तो भक्ति गुरू और भगवान की करनी है ।

3.भक्ति किसको करनी है ? 
तो भक्ति मानव तन धारी जीवात्मा को मन से करनी है ।

4.भक्ति किससे करनी है ? तथा भक्ति में किन किन साधनों की जरूरत होती है ?
तो भक्ति "मन" से करनी है, देह तथा ईंद्रियों से भक्ति हो या न हो कोई फर्क नहीं पड़ता । हां ईंद्रिया भी अगर सहायक हो तो साधना का स्पीड थोड़ा बढ़ जाता है । 
भक्ति में किसी भी बाह्य साधन या आधार की जरूरत नहीं , भगवान और गुरू के प्रति निष्काम प्रेम तथा उनकी सेवा की चाहत के आंसू ही प्रयाप्त है भगवान और गुरू को द्रवित करने के लिए । जिसके आंख में भगवद् प्रेम का निष्काम आंसू हैं , भगवान उनसे रीझ जाते हैं । 
"भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी " 

5.भक्ति का अधिकारी कौन कौन है ? 
तो भक्ति का अधिकारी प्रत्येक मानव तन धारी जीवात्मा है , चाहे वो कोई भी मनुष्य हो वो भक्ति करने का अधिकारी है । चाहे वो अमीर हो या गरीब हो , वो किसी भी देश , जाति , धर्म या संप्रदाय का हो,पढ़ा लिखा हो या अनपढ़ गंवार हो, विद्वान हो या कोई हो । 
 सभी भक्ति का अधिकारी जीव है । भक्ति देहाभिमान से परे होकर भगवद् प्रेम भाव से करनी चाहिए। 

6.भक्ति किस उम्र का मनुष्य कर सकता है? 
तो भक्ति किसी भी उम्र का व्यक्ति कर सकता है और कैसा भी देह धारी मनुष्य कर सकता है , चाहे वो बालक हो , युवा हो , बृद्ध हो , अपंग हो, लंगड़ा हो, लूला हो , गूंगा हो , बहरा हो , अंधा हो, काना हो, नर हो , नारी हो , चाहे नपुंसक हो , यानि  कोई भी मनुष्य हो ।
हां भक्ति अगर बचपन से प्रारंभ की जाए तो बहुत जल्दी उन्नति हो सकती है भक्ति मार्ग में , क्योंकि कुसंग से बचना आसान हो जाता है शुरू से हीं ।

7.भक्ति कौन से समय या काल में करनी है ? 
भक्ति हर क्षण, हर समय , हर काल में किया जाना चाहिए , चाहे वो दिन हो या रात हो , सुबह हो , या दोपहर या शाम हो । कोई मुहुर्त नहीं , कोई काल अनिवार्य नहीं । भक्ति में समय,  काल और मुहुर्त की कोई जरूरत नहीं, ऐसा नहीं कि ब्रह्म मुहूर्त हीं भक्ति के लिए श्रेष्ठ तथा फलदायी है। ब्रह्म मुहूर्त का महत्व सिर्फ इतना है कि अति सवेरे सो कर उठने पर मन काफी तरो ताजा तथा शांत रहता है एवं इस समय पुरा वातावरण भी शांत तथा अनुकुल होता है ध्यान तथा चिंतन के लिए । अन्यथा ऐसा नहीं है ब्रह्म मुहूर्त में कोई दिव्य शक्ति साथ देती है और अन्य समय में नहीं । 
यह सब सोंच केवल एक भ्रम है । गुरू और ईष्ट हर क्षण हमारे साथ रहते हैं , वो किसी भी क्षण साथ नहीं छोड़ते हमारा । 

8.भक्ति कहां की जा सकती है ? 
तो भक्ति इस धरती पर कहीं भी की जा सकती है । हां एकांत साधना के लिए , यानि कर्म संन्यास कि साधना के लिए एकांत और विल्कूल शांत जगह आवश्यक है । हां सामुहिक साधना के लिए गुरू धाम , भगवद् धाम, शिविर आदि विशेष अनुकुल तथा विशेष सहायक है । 

9. केवल मानव देह धारी जीवात्मा ही भक्ति कर सकता है , ऐसा क्यों ? 
क्योंकि मनुष्य शरीर ही कर्म प्रधान , ज्ञान प्रधान, चिंतन प्रधान है और भक्ति मन को हीं करनी है , इसमें हरि गुरू का नाम,  रूप , लीला, धाम तथा गुणों  का चिंतन प्रमुख हैं जो मन से हीं कि जा सकती है । इसलिए मानव देह धारी जीव ही भक्ति कर सकता है , अन्य देह धारी जीव चिंतन नहीं कर सकता , इसलिए अन्य देह धारी जीव भक्ति नहीं कर सकता । 

10. भक्ति किस भाषा के लोग तथा कौन से भाषा में संभव है ?
तो भक्ति के लिए किसी भी भाषा या बोली कि अनिवार्यता नहीं है । ऐसा नहीं है कि केवल संस्कृत भाषा वाले ही भक्ति कर सकते हैं । भगवान और गुरू किसी भी विशेष भाषा के पोषक नहीं है । वो सर्वज्ञ हैं , सर्वांतर्यामी है, भावक ग्राही हैं ,  मर्मज्ञ है, सर्वसुह्रत है । वो देश , काल,  भाषा, भेष, भूषा, नियम , निषेध आदि से परे हैं । 

इसलिए चाहे जिस भाषा का मनुष्य हो वो अपनी अपनी भाषा में , अपने भाव में भगवान और गुरू का चिंतन करने का अधिकारी है । भक्ति भगवान और गुरू से प्रेम करने का नाम है इसलिए इसमें शब्दों या भाषा की कोई अनिवार्यता नहीं है । भाषा और शब्द अपने मन के भावों को व्यक्त करने का माध्यम भर है । भक्ति जीवात्मा द्वारा उसके मन में भगवान तथा गुरू के नाम रूप लीला तथा धाम के चिंतन से उठे अपने प्रेम भावों को मन ही मन भगवान और गुरू को अर्पित करने का नाम है । 

इसमें कोई भी भेष भूषा,भाषा, शब्द बाधक नहीं हो सकता । डाकु रत्नाकर मरा मरा मरा बोल कर महान ऋषि बन गए , इतिहास गवाह है । इसलिए भक्ति में शब्द आदि का महत्व नहीं है । भक्ति में भाव , चिंतन तथा गुरू अनुकूल बिचार प्रमुख हैं जो मन के उपर निर्भर है । बाहर के क्रिया से इसका कोई मतलव नहीं । भक्ति गोपनीय बस्तू है , यह मनुष्य के ह्रदय में गुप्त रूप से अंकुरित भगवद् प्रेम का नाम है । 

बाहर प्रकट करने से यह प्रेम कि लता सुख जाती है , कुम्हला जाती है , अगर भक्ति परिपक्व न हुआ हो तो । क्योंकि भगवद् प्रेम को बाहर प्रकट करने से लोक रंजन नामक रोग इस लता में लग जाता है, लोक रंजन के फल के रूप में उपजे मान सम्मान तथा अभिमान रूपी खर पतवार भक्ति के लता को प्रारंभ में ही सुखा देती है और जीव भक्ति के राह से भटक सकता है अगर उसका तत्वज्ञान परिपक्व नहीं हुआ हो तो ।

इसलिए तत्वज्ञान तथा भक्ति जबतक परिपक्व न हो जाए तब तक इसे छुपाने के लिए कहा गया है गुरू द्वारा  । जब भक्ति परिपक्व होने लगती है , तब अष्ट सात्विक भाव के कुछ लक्षण अनजाने में कभी कभी अपने आप बिना चाहे बाहर प्रकट होने लगती है तो दोष नहीं है । लेकिन जानबूझ कर भाव भरने या प्रकट करने का दंभ करने से भक्त का पतन संभव है। 
इसलिए साधना काल में भक्ति में गोपनीयता अनिवार्य है  । 

11. भक्ति में क्या क्या नियम और निषेध है ? 
तो भक्ति में कोई नियम निषेध नहीं, केवल निम्नलिखित बातों को छोड़ कर :- 

भक्ति मार्ग के पथिक को अपने गुरू तथा ईंष्ट का अपने साथ उपस्थिति को एक पल भी नहीं भूलना चाहिए । अत: भक्ति में भगवान और गुरू को एक पल के लिए भी भूलना निषेध है । 
और नियम यह है कि भक्ति निरंतर हो , भक्ति अनन्य हो तथा भक्त केवल अपने गुरू तथा ईष्ट का ही शरणागत हों हमेशा के लिए  । गुरू के सिद्धांतों के अनुकूल चिंतन करना , बतलाए मार्ग पर  चलना तथा व्यवहार करना ही शरणागति है । 

12. भक्ति में क्या क्या अर्पित तथा समर्पित करना है ? 
तो भक्ति में अपना सर्वस्व समर्पित करना है अपने गुरू तथा ईंष्ट को मन से । यानि तन मन धन तथा आत्मा । आत्म दान सबसे बड़ी भक्ति है । और मन के संकल्प शक्ति से इन बस्तूओं को एक बार समर्पित करने के बाद कभी भूल कर भी हमें इन सब बस्तूओं को अपना नहीं मानना चाहिए। यह विशेष रूप से ख्याल हमेशा रहे, तो यह भाव हमेशा रहे कि अब जो भी है मेरे पास वो सभी गुरू और ईष्ट का है , मेरा नहीं है । 

बस ये 12 प्वाइंट भक्ति करने वाले को हमेशा याद रहना चाहिए । इन बारह बातों  में से अगर हम एक को भी भूले तो भक्ति से भटकने का खतरा रहता है । श्री राधे ।

( तो लगभग सैकड़ों लोगों ने जो मुझसे मेरे मैसेंजर पर जिज्ञासा कि थी तथा आग्रह किया था कि मैं पोस्ट लिख कर बता दूं तो  मैंने अपने गुरू श्री महाराज जी की कृपा से जो बातें ग्रहण किया है अपने अभी तक के साधना जीवन की यात्रा में वो बातें अपने स्मृति से लिख दिया है यहां । इसको सेभ करके रख लिजिए , ताकि भविष्य में फिर पुछने की आवश्यकता न हो ) श्री राधे ।।

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