Friday, 9 February 2024

आज प्रभु तुम मौन क्यूँ हो ? मानता हुं तुम मेरे हो पर, मैं तेरा न बन पाया

आज प्रभु तुम मौन क्यूँ हो ? 
मानता हुं तुम मेरे हो 
पर, मैं तेरा न बन पाया 
अपने पतित मन को मैंने 
अब तक न समझा पाया 
अपने मूल माता पिता से 
सनातन संबंध न समझ पाया 
शायद इसी को देख तुमने 
 मौन धारण कर लिया !

आज प्रभु तुम मौन क्यूं हो ?
मानता मैं, अति हीं पतित हूं 
संसार चक्र से ही व्यथित हूं 
फिर भी इस जग के मोह से 
स्वयं को न छुड़ा पाया 
तुमने अथक परिश्रम करके 
हमको दुर्लभ ज्ञान दिया 
फिर भी लोक रंजन के खातिर 
हमने ज्ञान भुला दिया 
साधना करते नहीं हम 
हममें सेवा का भाव नहीं 
शायद इसी को देख तुमने
मौन धारण कर लिया ! 

आज प्रभु तुम मौन क्यूं हो ?
तुमने अपनी दिव्य भाव से 
जग में प्रेम को प्रकट किया 
प्रेममंदीर के रूप में तुमने 
ब्रज में खुद को साकार किया 
'कीर्तिमंदिर' बरसाने में, प्रकट कर 
अपने ममता का इजहार किया 
'भक्तिमंदिर' के रूप में तुमने 
हमको भक्ति का दान किया 
फिर भी हमने अपनी करनी से 
हरवक्त तुमको निराश किया 
हमारी दैनिय दशा देख कर तुमने 
मौन धारण कर लिया ! 

आज प्रभु तुम मौन क्यूं हो ?
देखो प्रिय , तुम निराश होते नहीं 
हमारी विचित्र स्थिति को देखकर 
कभी व्यथित होते नहीं 
वादा करता हूं तुमसे प्रिय 
तेरा ही गुण गाऊंगा 
जैसा तुमने राह दिखाया 
उसी पथ को अपनाऊंगा 
है देर, पर दुर नहीं है
दुरूस्त होकर आऊंगा  
तुम तो कृपा साध्य हो प्रियतम 
तुमको हीं मैं पाऊंगा 
तेरी हीं कृपा दृष्टि से 
मैं पवित्र हो जाऊंगा 
तेरे ही कृपाबल से गुरूवर 
अवश्य ही तुमको पाऊंगा 
है विश्वास अति मन में 
मैं भी, अपना वचन निभाऊंगा ।।

:- मेरी कविता, प्रार्थना तथा संकल्प, आपके इस तस्वीर की गहराई के चिंतन से , संजीव कुमार ।

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