Thursday, 15 February 2024

साधक साधना तथा सावधानी।

साधक साधना तथा सावधानी। 
श्री महाराज जी के पुराने सत्संगी 50, 60 तथा 70 के दशक वाले लोग साधना के दरम्यान धड़ाम धड़ाम नीचे जमीन पर गिरने लगते थे , श्री महाराज जी द्वारा साधना शुरू कराने के कुछ देर के अंदर हीं , क्योंकि उनकी अपने चेतनावस्था की विस्मृति हो जाती थी । वो रूपध्यान के समय अपने भाव शरीर द्वारा गहरी ध्यान की अवस्था में भगवान और गुरू के लीला में शामिल में हो जाते थे ।‌
यह आजकल के हम साधकों में नहीं है क्योंकि हमारा फोकस डाईवर्ट हो चुका है साधना के प्रैक्टिस के जगह हम लोग बढ़िया गवईया , बढ़िया बजईया और बढ़िया नृत्य कला की ओर बढ़ रहे हैं और इसी को साधना समझ बैठे हैं । सिर पद के ताल लय सुर में खोने लगा है और हिलने लगा है । सिद्धि गाने बजाने तथा नृत्य में जरूर मिल गया, लेकिन भगवान और गुरू का रूप ध्यान कब छूट गए पता नहीं हीं चला । 
इसलिए जाना है जापान पहुंच रहे चीन वाली बात हो रही है आजकल । मन झूम रहा है सुर ताल सरगम तथा लय पर और हमको भ्रम है कि साधना हो रही है । 

साधना में विशेष ध्यान रखने की बात यह है कि साधना किसकी करनी है ? साधना किससे करनी है ? कैसे करनी है ? किन बातों का ध्यान रखना परम आवश्यक है ? किन बातों का सावधानी जरूरी है ? 
नहीं तो भगवान तथा गुरू के रूपध्यान के साधना के जगह केवल सुर, ताल, लय, नृत्य संगीत और बाद्य यंत्र बजाने की साधना यानी प्रैक्टिस न हो जाए , लोग बेहरत गवईया या बजईया या नृत्यकार न बन जाए । अगर साधना के जगह पर यह होने लगे तो समझना चाहिए कि हरि गुरू के रूप ध्यान लीला के साधना की दिशा की जगह हम भटक कर कही और जा रहे हैं ।
क्योंकि जब हमारा ध्यान ताल सुर लय और बजाने का एक्सपर्ट बनने पर केंद्रित हो जाए तो साधना तो गया । 
क्योंकि अक्सर ऐसा ही होता है लोग साधना के बजाए बेहतर गवईया , बजईया बन जाने की ओर अग्रसर हो जाते हैं , क्योंकि साधना करते करते साधना के वास्तविक रास्ते पर से भटक कर लोग गीत गाने , बाद्य यंत्र बजाने और नृत्य का साधना यानि प्रैक्टिस की ओर कब डाईवर्ट हो जाते हैं पता ही नहीं चलता । 

रूपध्यान साधना में गुरू या भगवान या दोनों का रूपध्यान आवश्यक है , फिर पद् के भाव के अनुसार उनके उस जीवंत लीला में खूद के भाव शरीर द्वारा शामिल होना परम आवश्यक है । 

ध्यान रखने की बात है कि साधना का प्रैक्टिस हमको उस ओर ले जाएं , उस ऊंचाई पर ले जा रही है हमारे चिंतन को या नहीं जिसमें हम आभासीय चल चित्र की भांति भगवान या गुरू या दोनों के लीला में खूद को समायोजित करने लग रहे हैं या नहीं । अगर नहीं तो सावधानी कि जरूरत है कहीं हम साधना के दिशा से भटक कर कोई और दिशा में तो नहीं बढ़ रहे हैं । असली साधना के जगह हमारा गाने बजाने तथा नृत्य की साधना या प्रैक्टिस तो नहीं हो रही है ? 

क्योंकि गुरू द्वारा असली रूपध्यान साधना जैसे जैसे ऊंचाई पर पहुंचती है वैसे वैसे हम उनके रूपध्यान तथा पद् के भाव चिंतन के द्वारा एक प्रकार से जीवंत लीला में प्रविष्ट होने लगते हैं और जैसे जैसे हम लीला में आपने भाव शरीर के द्वारा प्रविष्ट होने लगते हैं हम अपने शारीरिक स्वरूप, यानि देह को भूलने लगते हैं , हम चेतन मन से निकल कर पहले अवचेतन मन के द्वारा लीला में प्रविष्ट करते हैं तथा और भी अधिक साधना के ऊंचाई के कारण अवचेतन मन से भी निकल कर अचेतन मन के रास्ते रूपध्यान द्वारा उनके लीला में प्रविष्ट कर जाते हैं जहां हम अपने देह तथा बाहरी दुनियां को साधना काल में विस्तृत कर देते हैं । 
ऐसे में भला ताल लय सुर , गाने बजाने तथा नृत्य का होश कैसे रहेगा ।
और फिर जीव का शरीर धड़ाम से जमीन पर गिरने लगता है । गला अवरूद्ध । 
अगर सुर ताल नृत्य के स्टेप का ख्याल है इसका मतलव साधना नहीं हो रही है , कुछ और उदेश्य की पूर्ति हो रही है । मन सुर ताल लय में खोया झूम रहा है । 

इसलिए श्री महाराज जी के पुराने सत्संगी 50, 60 तथा 70 के दशक वाले लोग साधना के दरम्यान धड़ाम धड़ाम नीचे जमीन पर गिरने लगते थे , श्री महाराज जी द्वारा साधना शुरू कराने के कुछ ही देर के अंदर हीं , क्योंकि उनकी अपने चेतनावस्था की विस्मृति हो जाती थी । वो रूपध्यान के समय अपने भाव शरीर द्वारा गहरी चिंतन की अवस्था में भगवान और गुरू के लीला में शामिल में हो जाते थे ।‌

स्वाभाविक है कि जैसे जैसे जीव साधना के लेवल के ऊंचाई को प्राप्त करने लगता हैं तो जीव पहले तो अवचेतन फिर अचेतन की अवस्था में जाने लगता है और ऐसे में उसकी वाणी अवरूद्ध , शरीर में कंपन , शरीर बेसुध , होश समाप्ति की ओर उन्मुख होने लगता है , भला उसके लिय सुर ताल लय गाने बजाने और नृत्य को संभाले रखना सब असभंव बन जाता है , सुर ताल तो लड़खाने लगता है । 

तो जब इन सब बातों के जगह सुर ताल लय 
और भी बढ़िया होते जा रहा है तो साधक को सावधान हो जाना चाहिए। हम रूपध्यान साधना के यानि प्रैक्टिस के जगह गाने बजाने , सुर ताल लय तथा नृत्य के प्रैक्टिस की ओर उन्मुख हो रहे हैं । कहीं एक अच्छा साधक बन कर साधना के गहराई में पहुंचने की जगह कुछ और बनने कि दिशा में तो नही बढ़ चले है ! कहीं फोकस डाईवर्ट तो नहीं हो चुका है हमारा ?? 

अगर ऐसा है तो कुछ भी हासिल नहीं होने वाला । कुछ भी अनुभव नहीं होगा , यह निश्चित है तथा स्वाभाविक है ।‌ हां बढ़िया गवईया , बजईया तथा नृत्यांगना जरूर बन जाएंगे क्योंकि साधना तो ( प्रैक्टिस ) गाने बजाने तथा नृत्य की हो रही है । 
साधना में चिंतन आवश्यक है और सुध बुध खोना आवश्यक है । लय ताल सुर मदहोश करता है , वेहोश नहीं । 
लय ताल सुर तो संसारिक गीत सुनने पर आम आदमी को भी मदहोश कर देता है । अत: सुर ताल के मदहोशी और साधना में सुध बुध खोने में जमीन आसमान का अंतर है । साधना में पद के अनुसार चिंतन जरूरी है , सुर ताल लय को एक सीमा तक सिमित रहना है प्रारंभिक अवस्था तक, उसके बाद सुर ताल की जरूरत नहीं रहता । साधना में पांच दस मिनट के बाद पद् के भाव के चिन्तन द्वारा लीला में प्रविष्ठ होना महत्वपूर्ण है , सुर ताल लय तो साधन है साध्य नहीं । यह तो केवल सहायक होते हैं मन को भाव लीला में प्रविष्ट कराने के लिय । 

जब साधना में गहरा रूपध्यान बनता है तो जीव उसी तरह का हो जाता है जैसे गहरी नींद में बाहर कितना भी खट पट की आवाज हो वो कान से सुन ही नहीं सकता । तो भला ये बाहरी सुर ताल लय तथा बाद्य यंत्र की आवाज कैसे रहेगी कान में । गहरी ध्यानावस्था में बाहरी दुनियां से वाह्य ईंद्रिया कट जाती है जीव समाधी में प्रविष्ट कर जाता है । जीव का मन तो भगवान की आभासिय लीला भाव में प्रविष्ट करने लग जाता है । लेकिन असली लगता है चल चित्र की तरह । सुर ताल लय में खोना तो स्व सुख है , कर्ण सुख है । 
श्री राधे ।

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