महापुरुषों में बहुत प्रकार के महापुरुष होते हैं। कुछ अवतारी महापुरुष होते हैं, कुछ साधन सिद्ध महापुरुष होते हैं लेकिन कष्ट किसी महापुरुष को नहीं होता। बाहर का जो भी स्वरूप हो शारीरिक रोग का या बाप मरे, बेटा मरे, कुछ हो उनको भीतर से कष्ट नहीं होता। एक फार्मूला याद कर लो। तुलसीदास को संग्रहणी हुई मर गये, रामकृष्ण परमहंस को कैंसर हुआ मर गये और वैसे भी हमेशा बुखार-वुखार सब ये होता रहता है शरीर जब तक है, लेकिन भीतर से कष्ट नहीं होता उनको। "ज्ञानी भुगतै ज्ञान ते मूरख भुगते रोय" सबका बाप, बेटा, स्त्री, पति मरेंगे अपने समय पर लेकिन महापुरुष को फीलिंग नहीं होगी और मायाबद्ध को फीलिंग होगी इतना सा अन्तर है। और तुमको महापुरुषों की फिकर क्यों है? अपनी फ़िकर करो। कितने ही महापुरुषों को संसार वालों ने जेल भेज दिया, पिटाई किया। कितने- कितने नाटक हुए हैं- प्रह्लाद वगैरह को, मीरा वगैरह को, सब इतिहास भरा पड़ा है। लेकिन वो भीतर से दुःखी नहीं हुये, बाहर से सब दिखाई पड़ रहा है और बहुत से महापुरुषों ने अपने भक्तों का कष्ट ले लिया है। बहुत सी बातें हैं उसमें बारीक। महापुरुष और भगवान् की बातें न पूछो, न सोचो, न अकल लगाओ। वो बुद्धि से परे हैं।
भागवत में लिखा है कि श्रीकृष्ण ने १६,१०८ ब्याह किया और एक-एक स्त्री के दस-दस बच्चे हुए और सौ वर्ष के बाद उनको वैराग्य हो गया। रामायण पढ़ते हो? लक्ष्मण के वियोग में राम रो रहे हैं-बाकायदा रो रहे हैं और सीता के वियोग में तो बहुत ही बुरा हाल। सब एक्टिंग है। भगवान् और महापुरुष जो हैं नम्बरी चार सौ बीस होते हैं समझे रहो। "भगवत् रसिक रसिक की बातें रसिक बिना कोउ समुझि सकै ना"। कोई नहीं समझ सकता। राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न ये चारों एक हैं, भगवान् हैं इसमें कोई महापुरुष नहीं है। सदा से अनादिकाल से हैं। चतुर्व्यूह कहलाते हैं ये। लेकिन जगह-जगह कैसी एक्टिंग हो रही है ? श्रीकृष्ण बलराम दोनों एक हैं और श्रीकृष्ण ने ब्रह्मा को जब मोह हुआ और सब गाय, बछड़े, ग्वाल बाल सब हर ले गया, चुरा ले गया योगमाया से और भगवान् ने नया बना दिया। साल भर चलता रहा वो और बलराम को नहीं पता चला। तो बलराम ने देखा कि ये बड़ी-बड़ी अजीब-अजीब बातें हो रही हैं ! ये ग्वाल बाल ये आजकल ऐसा-ऐसा प्यार अपनी माँ से, भाई से, बहन से सब से कर रहे हैं। ये तो ऐसा कभी नहीं हुआ ये बात क्या है? मेरा तो दिमाग खराब है। क्या हो रहा है? कहीं कोई राक्षस की लीला तो नहीं हो रही है हमारे ऊपर। तब भगवान् से पूछा। तब भगवान् ने कहा- हाँ हाँ, वह मैं ही बना हूँ सब गाय, ग्वाल बाल, बछड़े सब मैं ही बन गया हूँ। एक्टिंग करते हैं सब इसी प्रकार की।
हनुमान जी राम को नहीं पहचान रहे हैं। जो हृदय फाड़कर के सीताराम को दिखा सकते हैं और जिनके रोम-रोम से सदा राम-राम निकलता रहता है, वह अपने इष्टदेव ही को नहीं पहचाने। "की तुम तीन देव मँह कोई।" की तुम, की तुम, की तुम....। ये की तुम, की तुम क्या लगा रखा है? और राम भी वैसी ही एक्टिंग करते हैं- अरे! तुम कौन हो भाई! हाँ, अपना परिचय तो बताओ। तो हनुमान जी कहते हैं- "मोर न्याउ मैं पूछा साईं।" मैं मायाबद्ध हूँ। अच्छा ! ये भगवान् के पार्षद हैं सदा से और अपने को बता रहे हैं मायाबद्ध हैं-
मोर न्याउ मैं पूछा साईं। तुम कस पूछिय नर की नाईं।
तुम बन्दर की तरह हो वह नर की तरह है दोनों एक्टिंग कर रहे हैं। राम लक्ष्मण के लिए रो रहे हैं बैठ के, पहाड़ उठा के ला रहे हैं हनुमान जी। सब नाटक है। नाटक में सब तरह की बातें होती हैं। वहाँ बुद्धि का काम नहीं। बस लीला सुनकर के विभोर हो जाओ। सोचने विचारने की, अकल लगाने का काम नहीं है।
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