आजकल 99.9% व्यक्ति अपने अपने परसेप्शन में हीं जीतें है और अपनी अपनी दृष्टिकोण को ही सही ठहराते रहते है । अपने अपने कमजोरी को छिपाने तथा दोष को सही सिद्ध करने के लिए तमाम दलीलें देतें है चाहे वो कुतर्क ही क्यूं न हो !
एक शराबी शराब पीना क्यूँ सही है यह सिद्ध करने में लगा रहता है और इसी को जायज मानता है , दुसरा व्यक्ति मांस खाना क्यूं दोष पुर्ण नहीं है , तीसरा व्यक्ति बिना विवाह के लिविंग रिलेशन क्यूं गलत नहीं है ! चौथा व्यक्ति समलैंगिकता क्यूं सही है ! पांचवां व्यक्ति धर्म तथा भगवान की परिभाषा अपने अनुसार करता है , छंटवा व्यक्ति संत और शास्त्र क्यों गलत है यह सिद्ध करने में लगा रहता है और अपने समझ के अनुसार ही सातवें को आंकता है ! सब कि अपनी अपनी अलग अलग डफली और राग है और इसी तरह अपने गलत अवधारणाओं को जीते जीते अशांति भरे , असंतोष भरे जीवन को जीते हुए अंत को प्राप्त करता है एक दिन ।
फिर भी आगे के लोग यानी अगली पीढ़ी अपनी ही बातों को सही साबित करने के लिए अपना अपना दलील देते रहते है और अपने समान सोंच रखने वाले का समर्थन करते हैं और दुसरे का विरोध । यही समर्थन और विरोध चलता रहता है उम्र भर लेकिन अधिकतर लोग न तो जिंदगी ठीक से समझ पाते हैं और न जीने के ढंग को ! लोग जीते रहते हैं अपने अपने गलतफहमियों का शिकार होकर । कोई पहले से स्थापित सदियों संस्थापित शास्त्रों को सही से नहीं समझते, और न कोशिश करते हैं , वास्तविक संतों को नहीं समझते और न कोशिश करते हैं , कुछ समझते भी है तो मानते नहीं , मानते भी हैं तो उनके बतलाए रास्तों पर नहीं चलते । जो चलते हैं केवल वही जीते हैं और शरीर छोड़ने के बाद भी जीते रहते हैं । वांकी जन्म लेते रहते हैं और मरते रहते हैं , यही नियति है ।
बस सब अपने अपने नशे में है और उसी नशे को सही समझते हैं और दुसरे के नशे को गलत , लेकिन हमाम में सब नंगे हैं यह कोई स्वीकार नहीं करता । और यही सबसे बड़ा दुख तथा विषाद का कारण है । और इसी का नाम कलयुग है । :
लोग पुछते है संजीव भाई आप किताब लिखो !
अरे क्या लिखूं , अगर लिखूं तो वो भी मेरे खूद का परसेप्शन होगा और यही फिर मेरी भी मुर्खता हीं होगी , अत: मैं एक और गलतफहमी क्यों थोपु लोगों पर ? बेहतर है अनेकों वास्तविक संत लिख चुके हैं उसी को पढूं और पढ़ने के लिए प्रेरित करूं दुसरे को , तथा स्वयं उसी को जिऊं और अपने जिंदगी को सार्थक बना लूं । यही सबसे बड़ा उपकार होगा खूद पर और अन्य लोगों पर भी । - संजीव कुमार
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