श्री महाराजजी के प्रमुख प्रचारक पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी, श्री युगल शरण जी , श्री मुकुंदानंद जी श्री महाराज जी के सिद्धांतों का समझ तथा उनके व्यवहारिक उपयोगिता यानि अप्लिकेशन पर सबसे अधिक जोर देते हैं ।
ये लोग हु बहु श्री महाराज जी का फिलासफी न बोल कर, उनका हु बहु नकल न करके उसको अपने शब्दों में समझाते हैं, तथा वर्तमान काल के घटनाओं का अधिक से अधिक वर्तमान उदाहरणों के साथ प्रस्तुत करते हुए तथा समझाते हुए श्री महाराज जी के सिद्धांतों का व्यवहारिक समझ पर जोर देते हैं । इसलिए मुझे इन तीनों के समझाने की शैली बहुत पसंद है । और मुझे हीं नहीं आज लाखों लाख युवा लोग , बच्चे , आदि इनका कायल हो चुके है क्योंकि इन लोगों ने स्वयं न कभी श्री महाराज जी के बोली का नकल किया और न उनके सिद्धांतों का , और न उन्हीं के हु बहु बोले गय शब्दों में शैली में जिक्र किया यहां तक कि ये लोग न उनके किताबों का हुबहु नकल किया और न उनके भाषा में प्रवचन दिया कभी । ये लोग श्री महाराज जी से ग्रहित किए शास्त्रों के परसेप्शन को स्वयं ग्रहण करके हमें समझाते हैं अपनी भाषा शैली में जो बहुत लाभकारी है ।
महापुरुषों के किताबों का नकल करके या रट्टा मार कर हु बहु बोलना , लिखना, कभी भी लाभप्रद नहीं है । इसलिए इन तीनों का हमेशा प्रयास रहता है कि महापुरुषों के वाणी को , उनके सिद्धांतों के सार ( gist) को बोले अपने स्टाईल में , अपने उन शब्दों में , जिसके लिए श्री महाराज जी ने प्रेरित किए हैं, ताकि लोग समझ जाए तथा उसका व्यवहारिक उपयोग भी ठीक से कर सकें अपने जीवन में । तभी कोई भी शिक्षा , ज्ञान सार्थक होती है ।
अन्यथा महापुरुषों का हु बहु नकल करके तो तोता भी मनुष्य से बेहतर बोल देता है ।
"शिकारी आएगा , जाल बिछाएगा , दाना डालेगा , लोभ से उसमें फंसना नहीं "
ये सिद्धांत तोता बोलना सीख लिया और लगा बोलने।
लेकिन जब शिकारी आया वास्तव में और जाल बिछाया , दाना डाला तो यह सिद्धांत बोलते बोलते उस जाल में फंस जाता है , और फिर शिकारी उसको पकड़ लेता है लेकिन फिर भी पिंजरे में भी वो बोलते रहता है यही रट्टा मारा हुआ सिद्धांत ।
तो भला ऐसे छात्र, या लोग का भला या क्या कल्याण होगा जो हुबहु नकल करके लिखते हैं और बोलते हैं और ऐसा ही करने की प्रेरणा दुसरे को भी देते हैं ।
यह एक गंभीर धोखा है ।
मैं तो स्वयं, महापुरूषों के सिद्धांतों को अच्छी तरह समझ कर अपनी भाषा में लिखने का प्रयास करता हूं ताकि उनके सिद्धांतों का समझ ठीक से मस्तिष्क में बैठ जाए जो हमारे व्यवहारिक उपयोग में आ सके । हमारा लाभ हो सके ।
रटा हुआ बात , या किताबों का हु बहु नकल किया हुआ बात दिमाग में अधिक दिनों तक नहीं ठहरता कभी , यह एक युनिवर्सल ट्रूथ है ।
मैंने अनुभव किया है प्रत्यक्ष रूप से सामने से संसार में , न की केवल सोसल मिडिया पर बहुत लोग श्री महाराज जी के फिलासफी को हु बहु बोल देते हैं लिख देते हैं लेकिन उनके खूद के जीवन में वो सिद्धांत का अप्लिकेशन दुर दुर तक नहीं है । आजकल ऐसे रट्टामल नकलची बंदर रूपी विद्वान अधिक मिल जाते हैं फिजिकल वर्ल्ड में तथा इस वर्चुअल सोसल मिडिया पर भी सभी क्षेत्रों में चाहे वो आध्यात्मिक बिषय हो यह अन्य बिषय ।
बस केवल लिख दिया महापुरुषों के किताबों का हु बहु नकल करके । इससे कोई लाभ नहीं ।
आज सीबीएसई बोर्ड ने जो फैसला किया है "ओपन बुक एक्जाम" उसका मैं स्वागत करता हूं ।
अभी तक जो भी परीक्षाएं हो रही है वो परीक्षा रटंत विद्या पर आधारित है । जो विद्यार्थी परीक्षा में रट्टा मार कर प्रश्नों का हु बहु उत्तर दे दे, हुं बहु जो किताबों में लिखा है तो उसको बढ़िया मार्क्स मिल जाता है ।
यही कारण है कि जो छात्र परीक्षा में चोरी करके किताब का नकल करके हु बहु लिख दे उसको भी बढ़िया मार्क्स मिल जाता है । लेकिन जिंदगी के इंतिहान मे वो अधिकतर लोग हर जगह असफल रहते हैं ।
ऐसे व्यवस्था में पीछे रह जाता है बेचारा वो छात्र जो पढ़ कर, किताबों में लिखे सिद्धांतों को अच्छी तरह समझ कर अपने शब्दों में प्रश्नों का उत्तर देता है । लेकिन यहां ऐसे छात्र जो अपने व्यवहारिक जीवन में उस ज्ञान का उपयोग करता है वहीं हल जगह सफल होता है ।
अब हमारे देश में भी नया परीक्षा पद्धति Open book examination का फर्मुला लागु होने जा रहा है जो बड़ा ही उत्तम है ।
मैं इसका बहुत बहुत स्वागत करता हूं ।
इसमें छात्र किताब खोल कर प्रश्नों का उत्तर दे सकता है लेकिन प्रश्नों का उत्तर किताब से हु बहु नकल करके लिख देने से "0"
नंबर आएगा ।
किताबों को खोलकर प्रश्नों का उत्तर अपने शब्दों में देने से हीं अच्छे मार्क हासिल होंगे ।
क्योंकि अपने शब्दों में उत्तर देने से पता चलेगा कि छात्रों ने सिद्धांतों को ठीक ठीक समझ लिया है और उसका उपयोग करने में वो सक्षम है , इस तरह से ज्ञान तथा शिक्षा की व्यवहारिक उपयोगिता बढ़ेगी ।
रट्टा मारने पर आज याद है कल वो भूल जाएगा , दुसरा उस शिक्षा का , ज्ञान का उपयोग वो अपने जीवन में नहीं कर पाता है । केवल रटा हुआ सिद्धांत ज्ञान , शाब्दिक ज्ञान कोई ज्ञान नहीं है । ज्ञान प्राप्त कर उसका उपयोग जीवन में आवश्यक है ।
नहीं तो पोथी पढ़ी पढ़ी जग मुआ पंडित भया न कोई बाली बात ही अभी तक हो रही है अधिकांश लोगों के साथ ।
अब ओपन बुक एक्जाम में प्रश्न कुछ इस तरह का होगा कि- पानी के वैपोराईजेशन कि प्रक्रिया को , सिद्धांतों के द्वारा यह समझावे कि कीचड़ से वाष्पीकरण किस प्रकार होता है ?
अब जो स्टूडेंट ओपन बुक से वाष्पीकरण का सिद्धांत लिख देगा हुं बहु उसको जीरो मार्क्स और जो उस सिद्धांतों के आधार पर अपनी भाषा में , समझे हुए प्रैक्टिकल ज्ञान से उत्तर देगा वो बढ़िया मार्क्स से उत्तीर्ण होगा ।
तो मैं तो स्कूल जीवन में अपने शिक्षकों से तथा आज भी अपने गुरू श्री महाराज जी से एवं उनके प्रमुख प्रचारक पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी से यह प्रेरणा हासिल किया है कि कोई भी ज्ञान चाहे वो संसारिक हो या आध्यात्मिक बातें या सिद्धांत वो महापुरुषों का या उनके किताबों का हु बहु नकल करके मत लिखो ।
तुमने क्या समझा वो लिखो अपनी भाषा में ताकि वो मस्तिष्क में ठीक ठीक बैठ जाएं और व्यवहार में आ सके । यही तरीका है जिसने मुझे काफी लाभ पहुचाया है ।
श्री राधे ।
No comments:
Post a Comment