Monday, 30 November 2020

अंतर्चेतना और सद्गुरू देव श्री कृपालु महाप्रभु ।।

बहुत बहुत महत्त्वपूर्ण :- 
Radha Rani दीदी , जब जीव को ऐसी अवस्था प्राप्त हो जाती है जिसमें हरि गुरू के सिवा कुछ भी नहीं दिखे , और ना वो कोई संसारिक शब्द ग्रहण करें , हर वस्तु व्यक्ति में भगवान नज़र आए तो वो अपने माईक ज्ञान इंद्रियों से उपर उठ जाता है । 
वो हजारों के बीच रहने के बाद भी , यानि घोर कुसंग का बातावरण में रहने के बाद भी उसे यह सब विचलित ना करें अंदर से , आंतरिक चेतना के स्तर पर तभी असली भक्ति की शुरूआत होती है । और ऐसी अवस्था में आने के बाद हीं वो असली शिष्य होता है अपने गुरू का , यह शुरूआत है ।
वर्णा जीव अभी प्ले स्कूल में हीं है । 
और जब जीव विना किसी स्थूल जगत के माध्यम से , यानि माईक कर्मेंद्रिया और ज्ञानेंद्रियों से परे होकर अपने ईष्ट और गुरू को अपने आंतरिक चेतना के स्तर पर महसूस करने लगता है तो उनका तार वेतार रूप मानसिक स्तर पर अपने  हरिगुरू से जुड़ जाता है । 

वो जीव फिर इस स्थूल जगत के सुख दुख , अच्छाई बुराई , भला बुरा की भावना से ऊपर उठ जाता है , सारा संसार उसे भगवद् मय नज़र आता है , हर किसी में अपना ईष्ट और उनकी वाणी सुनाई देता है । 
भला ऐसे जीव को भला बुरा का एहसास , संसारिक सुख दुख का एहसास क्यों हो !

वो भगवान के इस सृष्टि को साक्षि भाव से देखता है और साक्षि भाव से व्यवहार भी करता है संसार में ।
वो जीव उस दिव्य अवस्था को पा लेता है जिसमें उसे अपने हरि गुरू से प्राप्त दिव्य चेतना काम करने लग जाती है । 
अव वो जीव आंतरिक स्तर पर हमेशा मस्ती में रहता है,‌एक दिव्य नशे में रहता है  और केवल उपर से साक्षि भाव से संसार में कर्म करने लगता  है ।

संसार से विल्कुल डिटैच होकर संसार का कर्म करता है वो जीव ।
इस स्तर पर पहुंचने के बाद उसके सारे कर्म भगवान के द्वारा होने लगता है , गुरू के द्वारा होने लगता है ।
जीव तो हमेशा प्रेम रस में , आनंद में खो जाता है , उसे भला बहिरंग व्यक्ति , कोई जीव या  घटना विचलित क्यों करेगा ? 
हर तरफ प्रेम हीं प्रेम , संसार में कोई गाली दिया उसका भी कोई फिलिंग नहीं , तारिफ किया उसका भी कोई फिलिंग नहीं । 
विल्कुल ‌स्थित प्रज्ञ की अवस्था की प्राप्ति ।

उसके लिए तो सारा संसार प्रभु का है , सब जीव जंगम , स्थावर ,सब उनका है , ऐसा महसूस होता है । 
कोई भी घटना , दुर्घटना  सब उस जीव के लिए प्रभु की मर्जी से होता हुआ देख कर उसे हर जगह प्रेम हीं प्रेम महसूस होता है ।
कोई गाली दिया तो प्रेम , विरोधी बातें किया तो भी प्रेम ।

ऐसी अवस्था सिद्धावस्था कहलाती है ।
इस अवस्था में पहुंचने के बाद उस जीव के माईक कर्मेंद्रियां से किया कर्म और ज्ञानेंद्रिया यानि आंख ,‌नाक , कान , जीव, त्वचा से प्राप्त किसी संवेदना का कोई महत्त्व नहीं होता ।
उसको तो दिव्य ज्ञानेंद्रिया मिल जाता है या यूं कहिए की गुरू के द्वारा इन्ही इंद्रियो को दिव्य बना दिया जाता है जिससे वो जीव डाईरेक्ट अपने गुरूसे  हर क्षण जुड़ा रहता है विना माध्यम के , और प्रत्येक क्षण उसे दिव्य संगीत (गोलोक वाला)  सुनाई देता है संप्रेशन के माध्यम से ।

इसलिए अगर हम अभी यह भेद महसूस कर रहें हैं कि कोई हरि गुरू के विपरित बातें कर रहा है या कोई अनूकूल बातें कर रहा है तो इसका मतलब है कि हमारा कान ,‌नाक, मुख , आंख और त्वचा संसारिक रस रूप गंध और और शब्द में हीं मसगुल है और असली साधना की शुरूआत हुई हीं नहीं है अबतक ।
दीदी आपके प्रश्न का उत्तर श्री महाराज जी, मेरे  उसी अंतर्चेतना के स्तर पर दिए हैं । यह उत्तर उनके द्वारा संप्रेषित है मुझे माध्यम बना कर । श्री राधे ।
आपका और सबका कल्याण हो । जय जय श्री राधे ।।

Sunday, 29 November 2020

*‼क्या पाया और क्या खोया❓‼*

*‼क्या पाया और क्या खोया❓‼*

एक वृद्ध व्यक्ति बहुत परेशान था कारण शारीरिक बीमारी से ग्रस्त था। वो बैठा कुछ सोच रहा था तभी बहु की आवाज आई-- "बैठे रहते है दिन भर। बस बैठे-बैठे खाते है।"
वृद्ध व्यक्ति सुनकर रोने लगा। ओर याद करने लगा उस पल को जब बचपन में खेल कर बिताया ओर जवानी में मस्त होकर जीवन जिया अब बुढापा आया तो आज शरीर तो दुःख दे रहा है साथ में अपने भी दुःख दे रहे है। क्या जो जीवन मैंने जिया 80 वर्ष वो सब बेकार था❓ आज मेरे पास क्या है❓ यह शरीर जिसके लिए न जाने क्या-क्या नही किया आज वही दुःख का कारण बन बैठा है। जिसके लिए किया वो भी आज दुःख के समय दुःखी कर रहे है।
   आखिर इतने वर्ष में मैंने क्या पाया❓😞 अब तो मौत आने वाली है। यह मानव जीवन इतना दुःख से भरा हुआ है आरम्भ से लेकर अंत तक लेकिन मुझे कभी अफसोस नही हुआ लेकिन आज अफसोस हो रहा है क्योंकि आज मुझे जीवन का कोई लक्ष्य नही दिख रहा है।
 पहले धन कमाने का लक्ष्य था, मकान बनाने का लक्ष्य था, बेटों को पढ़ाने का लक्ष्य था बहुत सारे लेकिन ये सब एक जगह आकर रुक गए लेकिन इसमें मेरा क्या लाभ हुआ❓ जहाँ से शुरू हुआ वही पर आकर रुक गया हूँ। *खाली हाथ आए थे न साथ कोई आया था अब खाली हाथ जाना है न साथ कोई जाएगा।*
   पता नही क्यों यह मानव तन मिला है❓मौत के बाद मेरा क्या होगा❓हे भगवान इतनी पूजा-पाठ की उसका क्या लाभ हुआ जीवन का❓कुछ समझ में नही आया। क्या पाया और क्या खोया।
 *जीवन की सत्यता हर बार हमारे दरवाजे पर दस्तक देती है कभी किसी के मौत दिखाकर तो कभी दुःख के द्वारा लेकिन हम् सभी संसार में इतने व्यस्त हो जाते है कि कभी जानने का मौका नही मिलता है। मानव जीवन बहुत भाग्य से मिलता है सभी को चाहे आपका परिवार हो या हमारा बस कुछ समय के लिए सभी मेहमान है। अगर अपने से ओर अपने परिवार से अपने समाज से प्रेम करते है तो उस सत्यता को स्वयं जाने और समाज को भी बताए क्योंकि न जाने कब वो घड़ी आ जाए जब अपने भी छूट जाएंगे और संसार भी छूट जाएगा। 
भक्ति किजिए हरि और गुरू का , जीवन का वास्तविक लक्ष्य मिल जाएगा , और हासिल भी हो जाएगा ।🙏🏻😞*
*🙏🏻श्री राधे🙏🏻*

Saturday, 28 November 2020

मृत्यु के प्रकार ।।

मृत्यु तीन प्रकार की होती है । 
दैहिक 
दैविक
भौतिक 
दैहिक मृत्यु  - स्वाभाविक , मृत्यु । नेचुरल डेथ । समय पुरा हो जाने पर शरीर छुटना दैहिक मृत्यु है  ।

दैविक मृत्यु - नामापराध या पाप कर्म की अधिक्ता , अनाचार , दुराचार कर्म के कारण उम्र का छय होना , उम्र का ह्रास‌ हो जाना,  पापाचार में लिप्त रहने के कारण रोग, शोक हो जाना , अनाचार में लिप्त रहने  के कारण प्राकृतिक दुर्घटनादि में , प्राकृतिक आपदा में मर जाना , दुसरे को सताना , चोरी , डकैती  आदि कर्मों  के कारण  । कुकर्म में लिप्त रहने कारण मृत्यु । दुसरे के सामान को छिन लेना , दूसरे के हक पर अनिति से कब्जा करने के कारणादि से काल का कोप भाजन बनना दैविक मृत्यु है।यह भी अकाल मृत्यु है , असामायिक मृत्यु है ।  एक बच्चा जन्म लेते हुए या गर्भ में मर जाना , यानि उसके पिछले जन्म में कर्म अच्छे नहीं थे । 

भौतिक मृत्यु - आत्महत्या कर लेना या दुर्घटना में मृत्यु जो खुद के गलती के कारण होना  , गलत खान पान , गलत रहन सहन के कारण मृत्यु को, काल को  खुद बुलाना  अकाल मृत्यु है , असामायिक मृत्यु है । 

दैविक मृत्यु और भौतिक मृत्यु वाले जीव को कुकर शुकर , कीट , पतंगादि योनि प्राप्त होती है । उसने मानव शरीर का दुरूप्योग किया है । 

मां से प्रश्नौत्तर में जानकारी के आधार पर  ।

Thursday, 26 November 2020

शिक्षा का प्रमुख चार उद्देश्य


मैकोले की रोमन शिक्षा पद्धति उखाड़ कर जबतक हमारे देश हमारी अपनी मूल शिक्षा निति जो की नालंदा , विक्रमशिला और तक्षशिला की शिक्षा निति लागु नहीं होगी तब तक हमारा देश विश्वगुरू नहीं बन सकता , हमारे देश के लोग गुलामी की मानसिकता जो पीढ़ी दर पीढ़ी अवचेन मन में समाई हुई है जो नहीं निकल सकती । इसलिए हम हिंदुओं को एक जुट होकर रोमन शिक्षा को देश से बाहर खदेड़ना होगा हीं । तभी नीचे लिखे शिक्षा का उद्देश्य पुरा होगा । हमारे देश के 80% मुसलमानों का ओरिजिन , मूल हिंदु हैं । इनका भी काया पलट नहीं हो सकता तब तक जबतक वो हिंदुस्तानी मूल शिक्षा और संस्कृति को नहीं अपनाऐंगें । दया क्षमा , परोपकार , राष्ट्रियता का असली भाव नहीं आ सकता , देश द्रोहीं ब्रेन हैकर भारतिए युवा को दिग्भ्रमित करने वाले एजेंट पाकिस्तान के इशारे पर काम कर रहें हैं देश में । उनका सफाया , तभी होगा जब हमारी अपनी मूल भारतीय शिक्षा लागु होगी देश में । और यह तमाम भारत के लोगों का कर्तव्य है इसके लिए आंदोलन करें ।       किसी भी व्यक्ति को कोई व्यक्ति , समाज , समुदाय से नफ़रत नहीं होता , वल्कि उसके गलत नितियों से होता है , । हमने देश से अंग्रेजों को तो भगा दिया पर अंग्रेजियत -उसकी शिक्षा पध्द्ति , उसकी डीभाइड एण्ड रूल , और उनकी शासन प्द्धति ,‌न्याय पद्धति , पीनल कोड , शासन और सोंचने का तरिका आदि आदि आज तक देश में लागु है । यही एक बड़ा रोग है जिससे देश ग्रसित हैं ।

शिक्षा का प्रमुख चार उद्देश्य है :-
१. पहला उद्देश्य - आध्यात्मिक विकास ।
२. दुसरा उद्देश्य -   शारीरिक व मानसिक विकास ।
३. तीसरा उद्देश्य -   बौद्धिक विकास ।
४. चौथा उद्देश्य - आर्थिक व भौतिक विकास।

१. आध्यात्मिक विकास क्या है :- मैं कौन हुं शरीर हुं या आत्मा ? आत्मा क्या है ? मेरा कौन है , परमात्मा कौन हैं ? धर्म , अर्थ , काम , मौक्ष क्या है ।  चरित्र का उत्थान कैसे हो ? मानव जीवन के उद्देश्य का ज्ञान , पुरूषार्थ किसे कहतें हैं नैतिकता का समावेश जीवन में कैसे हो , स्वार्थ से ऊपर उठकर प्रत्येक जीव और प्राणी के प्रति दया , क्षमा , त्याग कैसे करें , यहां तक की बृक्ष , पेड़ , पौधे और प्रकृति , राष्ट्र समाज के प्रति मानव जाति का कर्तव्य क्या है ? जाति , पांति, अमीर गरीब  भेद भाव और धर्म भेद से उपर उठकर सर्वधर्म समभाव कैसे हो ? हमारा नैतिक कर्तव्य और जीवन मूल्य एवं आदर्श क्या होना चाहिए ? समाज में सद्भावना कैसे बनी रहें , हम काम,  क्रोध , मद् , मोह, लोभ अहंकार , घृणा , द्वेष आदि का दमन कैसे करें ? मानविए गुणों का , दैविक गुणों का विकास , मानविए मूल्यों का विकास आध्यात्मिक शिक्षा से हीं संभव हैं ।
अत: सही शिक्षा का सबसे पहला उद्देश्य आध्यामिक विकाश है जो दो पैर वाले जन्में जीव को पशु से मानव बनाता है । आज के मैकोले शिक्षा में मौरल एजुकेशनल या तो समाप्त है या फोकस्ड नहीं हैं ।

श्री कृपालु जी महाराज महाप्रभु जी का पुस्तक 'प्रेम रस सिद्धांत' " वह " मैं कौन ,मेरा कौन "  और "गीता" देश के सभी शिक्षण संस्थानों में खास कर उच्च सभी प्रकार के शिक्षण संस्थानों में लागु कर देनें से शिक्षा के स्तर में सुधार और मौरल एजुकेशनल में बड़ी उन्नति अवश्य संभव है ।

२. दुसरा उद्देश्य है शारीरिक विकास :- शारीरिक विज्ञान शिक्षा का दुसरा महत्त्वपूर्ण उद्देश्य है । मनुष्य को क्या खाना चाहिए क्या नहीं , कब खाना चाहिए , कितना खाना चाहिए , कितना सोना चाहिए कितना व्यायाम करना चाहिए , कितना योगा करना चाहिए ?
यानि हम अपने शरीर को कैसे स्वस्थ रखें हमेशा ? यह कम से कम दसवें क्लास तक के स्टुडेंट को सही सही जरूर ज्ञान हो जाना चाहिए , एक स्वस्थ शरीर में हीं स्वस्थ मस्तिस्क का विकाश होता है वर्णा  एक मां वाप अस्वस्थ हैं तो उससे विकारयुक्त बच्चे का , कमजोड़ मन वाले बच्चे का जन्म होता है , शारीरिक ज्ञान के विकाश के क्रम में यह भी ज्ञान होना चाहिए की एक दम्पत्ति को कब साथ करना चाहिए कब नहीं जिससे मेधावी और संस्कारवाण बच्चे का जन्म हो , पर आज की शिक्षा में इन सब बातों का स्थान शुन्य सा है ।

३. तीसरा उद्देश्य है बौद्धिक विकास - बौद्धिक शिक्षा का विकास का मतलब , मेडिकल साइंस , लौ , इंजिनियरिंग, सीए , शिक्षक , विद्वान , ज्ञान , विज्ञान , वैज्ञानिक , राजनितिज्ञ ( राष्ट्र समाज देश के हित में निति बनाने बाला ना की लुटकर अपना घर भरने वाला ) यानि बौद्धिक विकास का मतलब हीं हैं ज्ञान विज्ञान ,‌न्याय शास्त्र , टेक्नौलौजी आदि में दक्षता हासिल करना ।

४. चौथा और अंतिम उद्देश्य है आर्थिक व भौतिक विकास -  जब उपर का सभी शिक्षा , ज्ञान का विकास सही सही हो जाएगा तो आर्थिक उन्नति उस व्यक्ति का हीं नहीं पुरे समाज का , देश का और राष्ट्र का अपने आप हो जाएगा , सारी बुराई समाज से समाप्त हो जाएगी ।

लोगों के हाथ में स्कूल कौलेज युनिवर्सिटी आदि कागज का टुकड़ा ( डिग्री ) धरा कर यह नहीं कहेगा की जाओ रोजगार के लिए वेरोजगारी के लाईन में खड़े होकर नौकड़ी की भीख मांगों , सारा बचपन और युवा वस्था और धन  गलत शिक्षा नीति के जाल में खर्च कर दिया , मैकोले कि दूषित , प्री प्लान , गंदे शिक्षा नीति में जो देश में , वैरोजगार नहीं वेकार लोगों की फौज बना रहा है यह रोमन शिक्षा नीति , जो अंग्रेजों की देन हैं ।

1828 ई में जब विलियम बैंटिक भारत का गवर्नर जेनरल था ,  मैकोले ने हमारे देश के प्रमुख शिक्षा संस्थान , नालंदा , तक्षशिला , विक्रमशीला विश्वविधालय को तबाह कर दिया जिससे वेकार लोग पैदा किया जा सके , हमारे देश की शिक्षा विश्व में अव्वल था , विदेशी यहां पढ़ने आतें थे । ह्वेनशांग , फाहीयान आदि ।

उस वक्त की हमारी अपनी शिक्षा नीति उपर के चारों उद्देश्य को सौफी सदी पुरा करता था , देश के लोगों का चरित्र ऊंचा था , घरों में ताले नहीं लगते थे , हमारे देश की तत्कालिन टेक्नोलौजी विश्व में  ऊंचा था , चाणक्य , आर्यभट्ट , आदि पैदा हुए , अनेकों रियल देश भक्त पैदा हुए ।
शिक्षा का अगर उपर का प्रथम तीन उद्देश्य पुरा होगा तो लोग दक्ष होंगें , अंतर्पन्योर , लोभ-लालच रहित उधोगपति , व्यवसाई ज्यादा पैदा होंगें जो रोजगार देने वाले बनेंगें , पूंजी बाद समाप्त हो जाएगा , लोग चरित्रबाण बनेंगें , टीभी के स्टुडियो में बैठकर लंबी लंबी भाषण देश सेवक दिखाने का नाटक , समाज सेवी होने का प्रचार नहीं करेंगें वल्कि वास्तव में अपनें कर्तव्यों का निर्वाह बिना लोभ लालच , छल प्रपंच , के करेंगें । श्री राधे ।
आज देश में फिर से हमारा अपना वही स्वदेशी शिक्षा नीति की नितांत आवश्यकता है । मैकोले की शिक्षा नीति में पढ़ने वाले से स्वकल्याण असंभव है । - संजीव कुमार , रांची । 



बहकुं ना अब बहकाने से ।

" तुम मेरे थे, मेरे हो , मेरे रहोगे । बहकुं ना अब बहकाने से ।
जब समझ प्रेम में डुब गई तो अब,  क्या होगा समझाने से !"

हमारे जीवन में हरि-गुरू से बढ़ कर कोई नहीं । हरि-गुरू हमारी आत्मा है । जिसका उदेश्य हीं हरिगुरू से प्रेम और सेवा हो , जो हरि गुरू के निमित्त ही सांसें लेता हो , जो हरि गुरू के निमित्त जीवित हो , जिसका धन हरिगुरू हीं हो , जिसके जीवन में हरिगुरू के सीवा और कुछ नहीं । जो हरि गुरू के आगे किसी चीज की अहमियत नहीं देता हो , उसको भला ये माया क्या तड़पाएगी भला अब । लोग क्या तड़पाऐंगे भला ! 

"तुमको हीं तन मन धन अर्पण , तुम हीं एक मेरा जीवन धन ,
अब पीछे नहीं हटेगा पग पिय , विरह चोट उर खाने से 
दे दो ऐसी विरह वेदना , मिट जाए मम अहं चेतना ।
और अधिक चमकेगा सोना , पुनी पुनी अग्नी तपाने से "

आया ना‌ आ मुरली वाले , रो रो कर हम तुम्हें पुकारे ,
प्रेम बढ़ेगा छिन छिन मेरा , यूं तेरे तड़पाने से ।

पिय तुमसे हीं प्रीति लगाई , पर झोली भी संग नहीं लाई ,
एक बार लगा लो सीने से , बलिहार जाऊं अपनाने से ।

चाहे मम आलिंगन कर लो , चाहे मम प्राणन हीं हरलो ,
चाहे जी भरकर तड़पा लो, मोही काम श्याम गुण गाने से ।
एक दिन प्रेम रंग लाएगा , पिय तुमको भी तड़पाएगा ,
मैं हुं सखी किशोरी जू कि , नाता मम बरसाने से ।

 तुम मेरे थे, मेरे हो, मेरे रहोगे। बहकुं ना अब बहकाने से ।
जब समझ प्रेम में डुब गई तो अब,  क्या होगा समझाने से ।

तुम हार मान लो बनवारी , बदनाम ना हो जाए यारी ,
हारोगे हारे हो सब दिन,  पछताओगे इतराने से ।

तुम ही तो सबकुछ मेरा है , यह कहा हुआ भी तेरा है ,
जग में भी बढ़ता प्यार सदा , पिय के घर आने जाने से ।

जग छुट तो छुटे, संसार के सारे रिस्ते टुटे तो टुटे , सारे लोग नाराज हो जाए तो हो जाए , जग दुश्मन बन जाए तो बन जाए , समाज ना पुछे ना सही । हरि गुरू से हमारा रिस्ता अब कभी नहीं टुट सकता है । चाहे दु:खों का पहाड़ आन परे । शरीर भी ज़बाब दे दे चाहे । हरि गुरू हमारी आत्मा है , प्राण हैं । उनसे दुर नहीं रह सकता कभी , चाहे जो कीमत चुकानी पड़े , ।

ऐसे भी संसार छुटेगा हीं एक दिन , शरीर भी छुटेगा हीं । ए धन , दौलत , शोहरत , दोस्त , दुश्मन , सब दो दिन का हीं है । छुटना तय है । आज साथ छोड़ दें या कल , छुटेगा हीं । तो भला हम इन सबके खातिर अपने परम पुज्य श्री कृपालु महाप्रभु को क्यों भुलें ।
श्री कृपालु महाप्रभु हीं एक मात्र हमारे है , वही हमारे शास्वत माता पिता हैं । 
हम उनके काबिल नहीं पर वो तो हमारे है । वो तो दिव्य हैं । वही हमारे धन हैं । जीवन धन भी वहीं और आत्मा रमण भी वही हैं । 
मुझसे रिस्ता वहीं रख सकता है जिनको हरिगुरू से सच्चा प्रेम है । श्रीकृष्ण का वास्तविक भक्त ही मेरे संबंधी हैं । मां जगदम्बा जो राधारानी है का वास्तविक भक्त से हीं मेरा आत्मीयता का रिस्ता है । 
मैं किसी को धोखे में नहीं रखना चाहता हुँ । 
जो हरि गुरू से , भगवान श्री कृष्ण से , राधा रानी से वास्तविक  प्रेम करतें हैं वहीं मेरा दोस्त , रिस्तेदार , नातेदार हैं । वांकी लोग मेरा त्याग सदा के लिए कर सकतें हैं चाहें,।  मैं उनका आभारी रहुंँगा । मेरी उनसे ना राग होगा और ना हीं द्वेष । 
मेरी चिंता करने वाला मेरा गुरूदेव हैं । मेरी मां राधिका हैं और पिता श्री कृष्ण हैं । और पुज्यनियां मां रासेस्वरी देवी हैं । और उनका वास्तविक भक्त हैं । मां जगदंबा ( राधारानी ) के भक्त के चरणों में मेरा हर वक्त नमन है । 
मैं जैसा भी हुँ अपने गुरू का धन हुं । यहीं मेरी वास्तविकता  है । यहीं मेरी सच्चाई है । 
ना मैं भक्त हुँ । ना एक अच्छा साधक हुं । मैं अवगुणों की खान हुं । पर मेरा गुरू मेरे साथ हैं । कभी ना कभी तो कृपा होगी इसका विश्वास हैं । वो मेरे हैं बस और कुछ नहीं । 
श्री राधे ।

तुम बिनु जिया नाही लागे ,साँवरे .....अब तो तरस खाओ ,साँवरे तुम बिनु जिया नाही लागे ,साँवरे ......

तुम बिनु जिया नाही लागे ,साँवरे .....
अब तो तरस खाओ ,साँवरे 
तुम बिनु जिया नाही लागे ,साँवरे ......

जनम जनम मैं बिरथा गामायों 
कबहुँ न पायो चैन रे 
अब तो दरस दे दो , साँवरे .....
तुम बिनु जिया नाही लागे ,साँवरे .......

कित मैं जाँऊ , का से गांऊ ........
सुर ना सजे अब ,साँवरे .........
तुम बिनु जिया नाही लागे ,साँवरे ....

दिन रैन बित्यो युग युग बित्यो 
पलहुँ न पायो चैन रे 
तुम बिनु जिया नही लागे ,साँवरे .....

धन्य ' कृपालु ' पायो गुरु रुप सो 
लै के बतायो तेरो नाम रे 
तुम बिनु जिया नाही लागे , साँवरे ...

कलि-काल  का कौन भरोषो 
किस दिन निकसत प्राण रे 
अब तो तरस खाओ साँवरे 
तुम बिनु जिया नाही लागे , साँवरे ......
तुम बिनु जिया नाही लागे , साँवरे .......
( संजीव )


Monday, 23 November 2020

“What is the aim of human life?”

Everyone’s inner conscience, at some point of time, is beset by timeless questions like, “What is the aim of my life?” and “How can I attain it?” These cardinal questions assail every thoughtful person without any distinction of caste, creed, color or nationality. The answer of these queries is the sole gateway to the world of boundless bliss or perfect happiness.

It is true that our eternal scriptures unfold the mystery of the absolute and infinite happiness. But to comprehend the real essence of scriptures is impossible for an ordinary mortal, who has mere worldly intelligence. Only a God-realized saint who is graced by the divine wisdom can reveal the truth of spiritual mysteries and can clarify the shortest and simplest path to God-realization.

We are undoubtedly fortunate that to help the deserving souls, the divine power in its full magnificence, has descended on this earth planet. He is the supreme acharya of this age, the fifth original Jagadguru of world’s spiritual history- Jagadguru Swami Shree Kripalu Ji Maharaj (lovingly called Shree Maharaj Ji by His devotees.) He is the embodiment of Divine Love and Grace. He is the Param Guru Tattwa (Kripa Shakti of Radha Rani.). Poojniya Raseshwari Devi Ji is one of the foremost preachers of this divine personality. Blessed by the limitless grace of Shree Maharaj Ji, Poojniya Devi Ji is the personification of spiritual humbleness, sweetness and dedication and devotion at the lotus feet of the Divine.

Devi Ji was born on 12 January, 1968 in Bhilai. By what can be described only as Divine Providence, Shree Maharaj Ji had organized a public speech program in that city, a few days after Devi Ji’s birth. Shree Maharaj Ji’s extraordinary scriptural knowledge and loving divine personality made Devi Ji’s family firm devotees of Shree Maharaj Ji. When she was only of twenty days, at the time of the family’s first meeting with him, Shree Maharaj Ji lifted her from her mother’s lap and said, “Don’t think that this child is yours. She is mine and has been born to spread my message. She shall spread the divine love of Radha Krishn in all corners of the globe. Your work is to educate her and make highly qualified.”

 Thus, Devi Ji grew up under the constant guidance of Her Gurudev. In 1987, Devi Ji completed her M.A. in English and right after that, she was ordered by Shree Maharaj Ji to start studying the scriptures at Mangarh, our Gurudham. By the infinite grace of Shree Maharaj Ji, in a short span of only six months, Devi Ji acquired knowledge of all the Holy Scriptures. On 15 October 1988, Shree Maharaj Ji conferred on her the sacred robes of the preacher. Since that time she has been tirelessly spreading the message of God’s Love in all parts of the country and abroad.

 Poojniya Raseshwari Devi Ji is an exceptional preacher with a remarkable ability to present her understanding and experience of devotion in a thought provoking and lucid manner. Her speech guides aspirants and motivates them with much to think about, understand and thus come to a truthful decision. By the infinite Grace of her Spiritual Master Swami Shree Kripalu Ji Maharaj , Devi Ji points out the unique, simplest and shortest path to God’s realization in a sweet style of presentation; this she does in a manner that is interesting for an ordinary villager as well as to a great scholar of Vedas. She delights one and all when she sings the beautiful verses from our eternal scriptures, Upanishads, Puranas, and other devotional and divine writings. It can be said with surety all quest of true knowledge and divine wisdom are satisfied after one attentively listens her illuminating speeches. Devotional songs sung by Devi Ji let the hearts feel deep longing of Divine Love and real affinity to Lord Krishn.

Devi Ji is an excellent mentor. People find themselves fortunate to proceed forward to the unknown world of Divine Love in her affable and pleasing guidance. She is a mother, a friend, a teacher, a guide and much more. One feels easy, protected and tranquil in being in her company. To the youth she is dynamic, loving to children, pleasing to seniors and blissful to all seekers. She carries out the same divine mission of introducing the glory and love of The Supreme Godhead Radha Krishn to the people of world and follow the footstep of Shree Maharaj ji. She helps eager seekers to experience the bliss of true devotion. Her graciousness, generosity and simplicity attract every sincere devotee and thus she is lovingly called Maa.

Saturday, 21 November 2020

परामनोवैज्ञानिक शक्ति और घटना पर मेरा अपना अनुभव । :- संजीव

यह मेरा पोस्ट एक संसारिक पोस्ट है । परामनोवैज्ञानिक शक्ति और घटना पर अपना अनुभव है । 
इसमें मैं स्वप्नो के बारे में कुछ बात करूंगा न चाहते हुए भी मुझे करना पर रहा है,‌और अपना सैकड़ों ऐसे स्वप्नो में से कुछ का संक्षिप्त चर्चा भी करूंगा जिसका किसी भी चिंतन से कोई लेना देना न‌हीं , पर स्वप्न देखा और तुरंत सच भी हुआ और उसका प्रमाण भी मेरे घर परिवार , समाज और मित्र बन्धु भी है जो जानते हैं अच्छी तरह से  । क्योंकि घटना से पहले मैं बतला देता हुं ।‌
 मैं भी साईक्लोजी औनर्स का स्टुडेंट रहा हुं और यह मेरा भी बहुत फेवरेट सब्जेक्ट रहा है । 
तो विज्ञान भी कहता है साबित भी किया है  कि जब चेतन मन सो जाता है तब हमारा अचेतन मन काम करता रहता है और जब अचेतन मन काम करता रहता है तो हम स्वप्न देखतें हैं , सभी मनुष्य देखते हैं । और जब अचेतन मन भी सो जाता है तो स्वप्न दिखना भी बंद हो जाते हैं और इस हालात में शरीर का फंक्शन अवचेतन मन संभालता है ।
अब जिस व्यक्ति का ब्रेन सेंसेटिव होता है इस मामले में उसको स्वप्न याद भी रहता है । 
हां , मानसिक रूप से कुछ कमजोर व्यक्ति या बिमार हालत या भय के हालात  में भी, मनुष्य उलुल जूलूल सपने देखते हैं वेसिर पैर के । इसका कोई मतलव या संसार से लेना देना नहीं होता । और ना कभी भी होता है ।

पर इसका मतलव यह नहीं की सब स्वप्न् झूठे होते़ हैं । बहुत से स्वप्न पूर्णरूप से विल्कूल स्पष्ट होतें हैं और आगे के घटना का पुर्व स्पष्ट दर्शन तो कुछ स्वप्न सांकेतिक होते हैं । 
इस प्रकार  स्वस्थ अवस्था में शांत वातावरण में ,शुद्ध और साफ विस्तर पर सोया व्यक्ति जब कोई स्वप्न देखता है तो उसका मतलव और संबंध हमारे जीवन और भविष्य से , वर्तमान से अवश्य होता है दैनिक जीवन में भी  । धर्म शास्त्रों में भी अनेकों  प्रमाण है इस बात का  और बहुत से प्रसिद्ध लोगों ने भी अपने सपने में कई बार जो देखा है वो सही हुआ है।
स्वप्न का संबंध चिंतन पर भी निर्भर है पर सभी नहीं ।‌कुछ सपने व्यक्ति के संरक्षक उसका स्पिरिट गाईड  आकर पहले दे देता है घटना से पहले ।( स्पीरिट गाईड आपका गुरू भी हो सकता है  और दुसरा भी, जो उन्हीं के द्वारा नियुक्त कोई दिव्यात्मा होता है आपके जन्म से हीं , मैं प्रमाण दुंगा इस पर एक फेमस व्यक्ति का विडियो लिंक भी डालुंगा आगे )

जिस व्यक्ति का 6 th sance ज्यादा सक्रिए होता है जन्म से हीं‌ , उसको बहुत से घटना स्वप्न में , या जागते हुए पुर्वाभास के द्वारा या अपने स्पिरिट गाईड के सहयोग से हो जाता है ।
सभी का चर्चा तो नहीं कर सकता लेकिन अपने सैकड़ों अनुभवों में से कुछ सुनाता हुं संक्षिप्त में ।

साल 2002, 18 नवंबर, रात एक बजे मेरा स्पीरिट सपने ( मैं अपने स्पीरिट को जानता हुं, वो कौन है ! पर खुलासा नहीं कर सकता ) में आकर मुझे बता दिया कि कल के यात्रा के दौडान मेरे साथ भीषण दुर्घटना होगी , जिसमें मेरे शरीर का कोई हड्डी टुटेगा । 
प्रमाण - पहला प्रमाण मेरी पत्नी , जिसको उस स्वप्न के बाद निंद से  उठा कर मैंने बोला कि कल मेरे साथ ऐसा होने बाला है ।
फिर सुबह मैं छ: बजे का ट्रेन , जिसमें एसी में रिज़र्वेशन था मुजफ्फरपुर से बेगुसराय के लिए ड्युटी पर जाना था मुझे   , को छोड़ दिया । जबकि जौब के कारण ज्यादातर मुझे टुर में ही रहना परता है ।
दुसरा प्रमाण मेरे माता पिता‌ जिनको बतला दिया था मैं उसी सुबह , उनको मैंने बतलाय की आज मैं नहीं जाऊंगा टूर पर , मैंने ऐसा संकेत पाया है । 

तीसरा प्रमाण - मेरे पत्नी के मुह बोले और मेरे भी अति प्रिय भाई , मेरे बिनय भईया ,  मैनेजर -सेंट्रल बैंक , जो मां बगलामुखी का बहुत बड़ा भक्त हैं और दैवी शक्तियों से युक्त है , वो आ गय उसी समय‌ सुबह मेरे घर पर अचानक बिना किसी कारण , वो मुझे गले से लगा लिए वो‌‌ भी अनायास , उनको भी मैंने कहा की आज ऐसा हुआ है और मै नहीं जा रहा हुं  अपने एक खास मिटिंग में ।

चौथा प्रमाण मेरा बौस , पटना में । जिनको मैं फोन पर सुचना दिया कि मैं नहीं जा रहा हुं मिटिंग में बेगुसराय ,आज छुट्टी पर हुं क्यूंकि मुझे सपने में ऐसा संकेत मिला है  ।
 अब वो मेरा मजाक ऊड़ाने लगे की क्या आप इतना पढ़ें लिखे होकर इन बातों में आ गए । आप ट्रेन तो छोड़ दिया अबध आसाम पर आप बस पकड़िए और अभी भी चले जाइए बहुत जरुरी मिटिंग कंडक्ट करना आपको ।

अब जो होना रहता है वो काल तो घटना स्थल पर बुला ही लेता है । मैं दस बजे बस पकड़ा और चल दिया । 
अब बस तो मैं नहीं चला रहा था कि कोई कह दे कि मैं साईक्लोजिकली ऊस अवस्था में था और खुद के मानसिक स्थिति के कारण दुर्घटना हो गया ।
और ना गाड़ी का ड्राईबर जानता था कि  पैसेंजर के साथ यह होने वाला है या गाड़ी का दुर्घटना होने वाला है ? 

गाड़ी दो सौ किलोमिटर जाने के बाद बरौनी‌ से बेगुसराय जब 15 किलोमीटर बचा था , तब जबदस्त रूप से आमने सामने टकड़ा गया ट्रक से और 15 के लगभग लोग घटना स्थल पर मारे गए एवं मेरे बाएं जांघ की हड्डी टुट‌ गया  । चेहरा पर गहरा जख्म भी हो गया चोट के कारण ,  मुझे होश आया तो  होस्पीटल में पाया खुद को , यह घटना ठिक उसी तरह हुआ जैसे सपने में देखा था और जिसका जिक्र कर दिया था सबसे । 


अब दूसरी घटना । 
मेरे पिता जी जो बीस दिन पहले मुजफ्फरपुर में अस्पताल से घर लगभग स्वस्थ  होकर लौट चुके थे ।
मैं रांची आ गया था ।‌
कुछ दिन बाद मेरा वही स्प्रिटगाईड आकर सपने में रात दो बजे खड़ा होकर बोल दिया कि कल दो बजे तुम्हारे पिता इस दुनिया को छोड़ देंगे इसलिए लकड़ी और दाह संस्कार का व्यवस्था करो । मैं अपने पत्नी को बतलाया और मंदिर गया । वहां मेरे पत्नी के हांथ से मोबाईल छुट कर गिर गया निचे फर्श पर और सीसा टुट गया प्रार्थना के दरम्यान और ठीक 2 बजकर 15 मिनट दोपहर को घर‌ से खबर आ गया उनके डेथ का । आप सोचेंगे कि चिंतन हो रहा होगा । नहीं क्यूंकि जब अस्वस्थ थे तब चिंतन नहीं हुआ और जब ठीक हो गए थे बीस दिन बाद और ठीकएक दिन पहले उनके देहांत का सही सही समय और दिन का ही चिंतन क्यूं होगा भला???? 

तीसरी घटना - मैं बचपन से अपने दादा दादी से बहुत प्यार करता था । 
1994 में मैं रात को स्वप्न देखा,  वही‌ मेरा  स्पिरिटगाईड मुझे संकेत दे दिया की कल रात को मेरे दादा जी का प्राण सोते समय हीं रात को चला जाएगा । न कोई विमारी न कुछ दुर्घटना फिर ऐसा संकेत ठीक एक दिन पहले ???
मैं उस दिन सितामढ़ी में ड्युटी करके अपने पत्नी को सब बतलाकर अस्थाई निवास से  अपने मुल घर आ गया और रात को दादा जी के साथ सोया ।‌ सुबह चार बजे उनका प्राण निकलते अपने आंखों से मैंने और सबने देखा ।

तीसरा ऐसा हीं घटना दादी के लिए देखा दोपहर को और मैं उनके पास आधे घंटे में पहुंच गया और उनका भी उसी तरह प्राण निकलते देखा हुं । और सब जानते हैं क्योंकि मैं यह बात पहले बतला देता था सबको की ऐसा होने वाला है ।

मैंने अपने कुछ मित्र के लिए भी स्वप्न देखा और उसको पहले हीं सचेत कर दिया की बार , अच्छा या बुरा होने से । या अच्छा , बहुत अच्छा होने बाला से भी इतने दिनों के बाद उसके साथ और वही हुआ जो बोला था मैने ।

लगभग पांच सौ‌ से अधिक घटना है , सबका जिक्र करना संभव नहीं ।  मैं अपने जान-पहचान बाले के माता पिता को बोल दिया कि इतने उम्र में यह करोड़ पति बनेगा , अभी आरर्थिक संकट से गुजर रहा है पर अपने छोटा सा बिजिनेस करके यह बड़ा बनेगा इस ऊम्र में, आप चिंता ना करें । फिर वही हुआ उसके साथ जो मेरी भविष्यवाणी थी  ।
एक व्यक्ति  को बहुत कर्ज था , उसके पिता मुझसे बोले की मैं जब इस दुनिया से जाऊंगा तो अपने इकलौते बेटे को कर्ज के बोझ तले दबा कर जाऊंगा संजीव जी ऐसा लगता है ।

ठीक उसी समय उनका बेटा मेरे सामने आया और मेरा स्पिरिट गाईड उसी समय मुझे बोल गया कि इसको बोल दो इनका बेटा इतने उम्र में बिजिनेस संभालेगा और इन इन सालों में आपके रहते आपका सारा कर्ज हीं नहीं उतारेगा वल्कि बहुत प्रोपर्टी भी खडिदेगा । और वहीं हुआ जो मैंने बोला था ।

इस‌ प्रकार यह सब मेरे चाहने से नहीं होता है कि मैं जब चाहुं अपने स्प्रिट को बुला लुं और वो बतला दे किसी के बारे में और अपने खुद के बारे में भी मुझे । वो अपने आप होता है । कब हो जाए पता नहीं । कब बता दें मुझे किसके बारे में पता नहीं ।
यह सब मैं छोड़ दिया सात साल पहले लोगों को बतलाना । लोग परेशान करते थे मुझे । मैं जौब में डिस्टर्भ हो जाता था ।
मानसिक दबाव परता था बहुत । यहां तक की मेरे कंपनी के लोग भी लाभ लिए है और अच्छी तरह जानतें हैं  । मेरे सहकर्मी के रिस्तेदार जो अनजान थे मेरे लिए उनके लिए उनके अपने रिस्तेदार के लिए भी, जिनको मैं देखा तक नहीं कभी उनके लिए भी मेरा स्पिरिट मुझे बतला देता था । और मैं जो कहता,  वो 100% सही हुआ उनके लिए । 
पर मैं अब यह बंद कर दिया । अब जानने के बाद भी दूसरे को नहीं बतलाता । । और जब कोई पुछे और मैं बतला हीं दुं यह भी संभव नहीं है । यह एक स्वभाविक क्रिया है । 
मैं अब किसी को नहीं बतलाता पिछले सात साल से ।

तो हर स्वप्न झूठे नहीं होते । और चिंतन पर डिपेंड नहीं होता । यह एक परामनौवैज्ञानिक घटना और वल है । जिसको और विकसित किया जा सकता है । किसी किसी में यह गुण जन्मजात होता है जैसे कुछ मुझमें हैं पर इसको मैं अपने जीवन का आधार नहीं बनाया कभी । पर यह शक्ति और मेरा स्प्रिटगाईड अब भी है मेरे साथ। वो समाप्त नहीं होता कभी ।

मानव का प्रकार :- संजीव कुमार

मेरा यह पोस्ट आध्यात्मिक्ता से तटस्थ लेख है जिसमें भौतिक , अभौतिक दोनों का समावेश है  । है तो यह श्री महाराज जी द्वारा दिया दृष्टि के प्रभाव का हीं फल । पर उनके अनुयायियों से एक प्रार्थना है कि इस लेख को केवल एक लेख और बिचार के समझ से पढ़े और देखें। 
और अपना स्वतंत्र बिचार बिना किसी पुर्वाग्रह के रख सकतें बिना भेद भाव‌ राग और द्वेष के  , इसमें किसी से राग और द्वेष की भावना नहीं है । बस एक चिंतन है ।

मानव योनि एक विकसित योनि है । मैं इसे सात प्रकार में बांटता हुंँ सबसे पहले , तब समझेगें।
1. परमात्म केंद्रित ( GOD Centric ) Suprime soul.
2. आत्म  केन्द्रित ( Soul Centric )
3. मन केंद्रित       ( Self Centric )
4. परिवार केंद्रित ( Family Centric)
5. समाज केंद्रित ( Society Centric )
6. संप्रदाय केंद्रित ( community centric )
7. विश्व केंद्रित।    ( Universe centric ) 

१. God centric - इसमें वो महान जीव है जो भगवान को पुर्ण निष्काम भाव से प्रेम करतें हैं । ऐसे जीव पराकाष्ठा का भगवद् प्रेमी होतें हैं । यहां तक की वो भगवान या अपने गुरु से इतना प्यार करतें हैं कि भगवान या गुरू की इच्छा हीं उनकी इच्छा हैं । वो दर्शन दें नहीं दें , बदले में प्यार करें या न करें , कोई अपनी कामना नहीं इनको । आध्यात्मिक कामना भी नहीं , भौतिक की तो बात हीं नहीं । ए पुर्ण निष्काम मनुष्य अति दुर्लभ भगवद् अवस्था का प्रतिरूप होतें हैं । परमात्म प्रेम भाव में लीन भीतर से । दुनियां से या किसी से कोई लेना देना नहीं , विल्कूल स्थित प्रज्ञ । भौतिक शरीर , भौतिक संसार में होते हुए भी निर्विकल्प , ना शरीर का भान न ‌संसार का ना अपने आत्मा का । पुर्णपरमहंसावस्था। अद्वैत अवस्था में हरि स्वरूप होते हैं । और जन हित हेतु द्वैत भाव से अपने भगवद् स्वरूप में स्थित होते हुए विश्व के सभी जीवों के आत्मिक कल्याण हेतु शरीर धारण करतें हैं । 

२. Soul centric - ऐसे मनुष्य आत्म केन्द्रित वाले सकाम भक्त होतें हैं । इनको अपने आत्मा का प्रैक्टिकल अनुभूति , आत्म साक्षात्कार  या आत्मा का ज्ञान हो  गया होता है । आत्माराम होतें हैं पर ए पूर्ण निष्काम नहीं होतें हैं । हां भौतिक बस्तुओं की कामना इनको नहीं होती , ये भौतिक शरीर और संसार को एक साधन समझ कर इसका ख्याल रखतें हैं । अपने संसार का सदुपयोग भर बस ।  ए भगवद्‌प्रेम चाहतें हैं यही लक्ष्य होता है । आत्मा से परमात्मा के प्रेम को महसुस करना , उनको देखने , सुनने , बातें करने , आलिंगन करने , रस रूप का स्वाद और सुगंध की कामना होती है । ये भक्त होतें हैं । अपने ईष्ट व गुरू से अटूट और अनन्य प्रेम करतें हैं । 

३. Mind centric ( self centric ) ऐसे जीव भगवान और गुरू से अपने आध्यात्मिक प्यास के साथ साथ भौतिक प्यास के पूर्ति की भी  कामना रखतें हैं । यानि केवल मैं और मेरा तु । लेकिन पहले मैं तब तु। इनका ध्येय वाक्य है - पहले आत्मा यानि मन तब परमात्मा, ऐसा सोचते हैं   । ए मन को हीं आत्मा समझते हैं ।
भौतिक कामना की पूर्ति में व्यवधान आया तो प्यार खत्म , जिस मात्रा में भौतिक कामना की पूर्ति हुई उतना प्यार छलक गया । प्यार का उतार चढ़ाव अपने संसारिक इच्छा के पूर्ति के हिसाब से । तो ऐसे लोग आध्यात्म से और भौतिक संसार दोनों से तटस्थ होतें हैं लेकिन खुद के लिए केवल । खुद को खुद से प्यार है और भगवान से भी प्यार है पर स्व हित के लिए । पुर्ण स्वार्थी , ए भगवान, महापुरूष ,संसार , संसारिक रिस्तों  का यानि परिवार , दोस्त , मां बाप , भाई बहन  ,‌बेटा वेटी यानि सभी resources का इस्तेमाल खुद के संतुष्टी के लिए करतें हैं । यह खुद का भक्त होतें हैं । 
भगवान का कभी नहीं । हां भ्रम है इनको की हम भगवान का भक्ति करतें हैं , भक्त हैं पर यह सिर्फ भ्रम है ।
इनके लिए मन हीं देवता , मन हीं ईश्वर , इससे बड़ा ना‌ कोई । इनको बहुत अहंकार होता है। जरा सा बात बर्दास्त नहीं अपने मन के खिलाप । 

४. Family centric - परिवार केंद्रित , ऐसे जीवों के लिए खुद के priority के साथ परिवार का भी priority है । तो ऐसे लोग खुद और अपने परिवार तक सिमित होतें हैं । और इसी हित के लिए भगवान को पुजते है ( इनको भी भक्त नहीं कह सकते हैं ) ए पुर्णत: स:स्वार्थी होतें हैं । समाज रहे या नहीं, मैं और मेरा परिवार, जिसमें बहुत अगर है तो मां वाप को भी शामिल कर लिया नहीं तो‌ केवल मैं मेरा पति हैं मेरी पत्नी और मेरा बच्चा है  बस इससे आगे कुछ नहीं । वांकी सब नाते , रिस्तेदार साधन है इनके लिए । जरूरत परे मां बाप को भगवान , भाई को भगवान , बहन को देवी स्वार्थ बस और गद्हा को भी बाप बना लेतें हैं ।  कोई कोई अपवाद स्वरूप मां वाप भाई से , बहन से प्रेम पर १००% निष्काम नहीं और अपने अहंकार का चरम और उसकी तूष्टि से मतलव है । आप सही वोले तो विरोध गलत बोले तो विरोध । इनका आरती उतारिए , ऐ खुश । कल भुल गए आपका विरोध । ऐसे को समझना और संतुष्ट करना असंभव है । कब किस बात पर नाराज़ हो जाए आपको बताऐंगें भी नहीं । बस खफा । 

५. Society centric - ऐ समाज सेवी होतें हैं । मानव‌मात्र , जीव मात्र के लिय दयालु  ,‌ लेकिन  अपने समाज तक केंद्रित होतें हैं । समाज सेवा के बदले यश , सम्मान आदर चाहिए होता है । नाम भी चाहिए होता है । ऐसे लोगों से समाज चलता है । देश सेवी भी इसी में है। 

६. Community centric ( संप्रदाय विशेष केंद्रित ) ऐ लोग कट्टर होतें हैं , अपने संप्रदाय विशेष को मानने वाले और उसके लिए ही काम करने और लड़ने बोलने बाले। ए लोग सभी चीजों का इस्तेमाल अपने संप्रदाय के अहंकार को तुष्ट करने के लिए करतें हैं । चाहे धर्म ग्रंथ हो या भगवान , जय श्री राम हो या जय शंकर या जय हनुमान या अल्लाह हो या अकबर‌ खुदा हो या कुरान  , ईश्वर जीसस हो या खुदा , भौतिक रिसोर्स हो या आध्यात्मिक । पर सब अपने संप्रदाईक अहंकार की पूर्ति के लिए । एक दूसरे को निचा दिखाना और खुद को ऊंचा साबित करने का प्रयास करना ,  यह विशेषता होती है इन लोंगों की । इनको लगता है कि दुनिया में 12 आना अक्ल सिर्फ मेरे पास है और 4 आने में पुरी दुनियां है । 

७. Universe centric ( विश्व केंद्रित ) ऐसे लोग संसार में महान होतें हैं यह जाति पांति , धर्म , संप्रदाय , चर अचर से उपर उठकर सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय कि चिंता और प्रयास करने वाले होतें हैं । "बसुधैव कुटूंबकं"
ऐसे जीव महात्मा भी होतें हैं और समग्र जीवों के भौतिक कल्याण की भावना वाले होतें हैं , इनका मुख्य ध्यये होता है अपने भौतिक आवश्यकता को कम करो और प्रकृति से तटस्थ होकर जियो । जो आजकल बहुत कम है इस भोगवादी युग में । भगवान ऐसे लोगों को अपना माध्यम बना कर जग कल्याण का काम करतें हैं । ए संत की भांति संसार के जीवों के प्रति निष्काम भाव से समर्पित होते हैं , इनको नाम और बदनामी की कोई चिंता नहीं । बस इनमें सेवा का लक्ष्य सर्वोपरि होता है । 

तो पहला तो अति उत्तम पर्सनैलिटी है । दुसरा उत्तमतर है और सातवां उत्तम पर्सनैलिटी है, पांचवां  ठीक हीं है । 
अत: हमको इन चार प्रकार से हीं मतलव रखना चाहिए ।‌ :- संजीव कुमार ।। 

( मेरा यह लेख एक भुमिका है आगे के संसारिक लेख के लिए , उस लेख में इनका इस्तेमाल  होगा आगे  ) 
श्री राधे ।

मेरे जीवन कि दिशा का बदलना गुरूदेव के कृपा से ।।

किस प्रकार सदगुरू जीव को उसके जन्म से पहले और फिर उसके बाद अपने शिष्य को संभालते हैं प्रेरणा देते हैं और दिलवाते भी हैं संसार के महान जीवों के द्वारा भी  !
किस प्रकार गुरू अपने लीला संवरण के बाद सर्वव्यापक होकर सबका कल्याण करतें हैं !

युवाओं को और हमारे भाई बहनों  को मैं वहीं कहना चाहता हुं जो मुझे 1988 में बाबा आमटे ने विवेकानन्द पुरम कन्याकुमारी में कहा था ।

 उस दिन से मेरी उच्श्रृखंलता, चंचलता  समाप्त हो गई और मैं अपने कोर्स के अलावा अच्छी अच्छी पुस्तकों को पढ़ने का आदत शामिल कर  लिया अपने जीवन में । और करीब लगभग  दो हजार से उपर पतली व मोटी पुस्तके/पत्रिकाएं पढ़ी है आज तक , इसमें मेरे गुरूदेव की चालिस से अधिक पुस्तकें और लगभग साठ से उपर पत्रिकाएं भी शामिल है ।
यह कैसे हुआ तो बाबा आमटे और डॉ सुब्बाराव साहब ( भाई जी कहतें है सभी इनको ) के प्रेरणा से । और इनकी प्रेरणा ने संसार में मेरे जीवन की दिशा बदल दी थी । मैं जीवन को एक गंभीर अध्ययन बना लिया , दुसरे को सिखाने के लिए नहीं वल्कि खुद को पहले संवारने के लिए । वर्णा मेरा भी जीवन आम हो जाता , मजाक हो जाता , फुहर हो जाता ।
दुसरा सबसे बड़ा आत्मिक और मानसिक , बैचारिक या आध्यात्मिक परिवर्तन श्री कृपालु जी महाप्रभु एवं पूज्यनियां मां रासेश्वरी देवी जी  से मिलने के बाद हुआ । 
ऐसा लगता है कि मेरा जीवन भी जन्म से पहले ही विल्कूल प्रोग्राम्ड था श्री कृपालु जी  महराज जी द्वारा ।

श्री कृपालु महाप्रभु श्री  गुरूदेव हीं मेरे जीवन का पुरा रोड मैप पहले से तैयार कर रखा था और अपने मिलाने से पहले मुझे अध्ययन के मामले में एकाकी बनाया , हर तरह के अच्छी से अच्छी शिक्षा , पुस्तकों द्वारा हीं नहीं वल्की  संसार में भी महान लोगों के सानिध्य के द्वारा  और फिर बाद अपने तत्वज्ञान से ओतप्रोत कर दिया ।
इसलिए यह महसूस करता हुं कि गुरू का संबंध एक जन्म का नहीं होता , यह रिस्ता जन्म जन्मांतर का होता है । 
 मैं विवेकानन्द पुरम में कुछ दिन  प्रत्येक शाम समुद्र के किनारे बाबा आम्टे के  साथ टहलता था ।
एक शाम टहलते हुए उन्होंने मुझसे कहा था उस समय मै छात्र  था कौलेज में , एन एस एस में था  । " अच्छी अच्छी पुस्तकें पढ़ने की आदत डालो  , इससे सोंच अच्छी और उदार होगी , चरित्र और संस्कार का निर्माण होगा, जीवन को सही दिशा मिलेगा, सही दृष्टिकोण बनेगा , वृत्ति शुद्ध होगी जिससे प्रवृत्ति उदार और संयमित होगा । भोगवादी संस्कृति से उपर उठोगे और अपने जीवन को शांती मय बना पाओगे "
" इससे आचरण बदलेगी, और खुद बदल जाओगे ,आचरण बदलेगा तो तुम्हारे कथनी और करनी में फर्क नहीं दिखेगा । इससे परिवार अच्छा होगा , परिवार अच्छा होगा तो समाज भी अच्छा होगा  और समाज अच्छा होगा तो राष्ट्र बदलेगा, और फिर दुसरे युवा को भी प्रेरित करो  " 

उन्होंने कहा था कि  जीवन के अंतिम समय तक स्वध्याय करते रहना चाहिए अच्छी अच्छी पुस्तकों  का  । लोग सोचते हैं क्या होगा उम्र गुजर गई । अब तो मरना है !

नहीं ऐसा नहीं सोचना चाहिए । जीवन के अंतिम समय में अच्छी अच्छी पुस्तकों का अध्ययन , ध्यान और साधना और बढ़ा देना चाहिए । जिससे अंत गति अच्छी होती है और एक नया बढ़िया शरीर मिलता है एक अच्छे संस्कारों के साथ नया जीवन मिलता है । आत्मा दुसरा शरीर धारण कर लेता है और यह एक युग पुरूष के निर्माण की प्रक्रिया है इसमें कई जन्म लेने परतें हैं अध्ययन शील साधक को  । 

अब तो श्री कृपालु महाप्रभु के पुस्तकों के अध्ययन बार बार और साधना में हीं मन लगता है संसार के काम के बाद और संसार के काम के दौड़ाने भी गुरूदेव हीं हमेशा साथ रहतें हैं । लेकिन इसके लिए जीवन की चंचलता उच्श्रृखंलता को समाप्त करना होता है । नहीं तो ध्यान साधना में ऐसे लोगों को मन नहीं लगता चाहे कितना भी प्रयास कर लें । अंदर से शांत होना होता है गंभीर होना होता है तब सहज ज्ञान उतारा जाता है गुरूदेव के द्वारा अंत:करण में , फिर रूपध्यान सहज बनता है ।

 व्यक्ति केवल हाड़ मांस का पुतला नहीं है वल्कि विचारो का भंडार है । अच्छे विचारों का भंडार होने के लिए, बहुत अच्छे अच्छे विचारकों और महापुरूषों के पुस्तकों का अध्ययन लगातार करना होता है , साधना एवं उनका संग करना परता है । फिजिकल संग ना हो कोई बात नहीं । 
महापुरुषों का पुस्तक हीं उनका विचार होता है उनका निज स्वरूप होता है । उनकी पुस्तकें हीं उनका साकार रूप होता है उनके जाने के बाद ।
 इसलिए उनके पुस्तकों का संग हीं , अध्ययन हीं और उनके बतलाए सिद्धांतों का अनुसरण हीं उनका  वास्तविक संग है । वर्णा तो लोग उनके भौतिक स्वरूप के संग होते हुए भी संग नहीं होते वास्तव में , लाभ नहीं ले पाते हैं  । 
इसलिए महापुरुष अपने  लीला संवरण के बाद और भी व्यापक हो जातें हैं  कडोरों को वास्तविक संग देने के लिए अपना विस्तार कर लेतें हैं । जिससे बहुतों का कल्याण होता है । 
आज हमारा सौभाग्य है कि श्री महाराज जी की दो सौ से अधिक पुस्तकें साधकों के लिए उपलब्ध है । और फिर वार्षिक पत्रिकाएं भी है । हम साधकों के लिए बहुत है । और बांकी लोगों के लिए , बहुत से महापुरुषों के पुस्तके हैं ।‌ पढना चाहिए ।
यह मेरा निजी अनुभव है जो चल रहा है लगातार ।
श्री राधे 
 मैंने अपना अनुभव शेयर किया । धन्यवाद ।

Friday, 20 November 2020

सूक्ष्म संवेदिता

"संवाद के दृष्टिकोण से गुरु और शिष्य के बीच दो प्रकार के संबंध होते हैं- एक मौखिक तत्त्वज्ञान संप्रेषन का और दूसरा आन्तरिक भाव संप्रेषन का । 
तत्त्वज्ञान प्रदान करने हेतु गुरु सदैव शिष्य को मौखिक उपदेश-निर्देश देते रहते हैं,
परन्तु सूक्ष्म संप्रेषन में शिष्य को उसी ज्ञान का अनुभवात्मक बोध होता है । संप्रेषन पूर्णरुपेण चेतना पर आधारित होता है । गुरु जो हमारी सर्वोच्च चेतना में स्थापित है, वे कोई स्थूल व्यक्तित्व नहीं , सनातन तत्त्वज्ञान हैं । वे साधक से कभी भी संपर्क स्थापित कर सकते हैं, किन्तु शर्त यह है कि साधक भी अच्छा रिसीवर पर बना रहे । अर्थात् अपनी चेतना को गुरु से जोड़े रखे और पूर्ण शरणागति की पात्रता विकसित करे । 

"संप्रेषण के माध्यम से गुरु के द्वारा दिय गय तत्त्वज्ञान का अच्छा रिसीवर बनने के लिय हम साधकों को अपने अवरोध का त्याग करना पड़ेगा । हमें बाँसुरी बननी पडे़गी । अन्त:करण की शुद्धिकरण की ओर बढ़ना पड़ेगा । उस सम्प्रेषण को रिसीव करने के लिए एकाग्रचित होना पड़ेगा । पूर्ण आस्थावान बनना पड़ेगा । 
साधक को अपने मन-व्यक्तित्व को बस एक पहचान देनी पड़ेगी - 'गुरु जो चाहें वही मेरा मन और जैसा वे गढ़ें वही मेरा व्यक्तित्व ।' तभी उसमें भक्ति-प्रेम रुपी संगीत का प्रवाह संभव है । गुरु से समस्वरित होते ही उनकी कृपा का प्रवाह साधक में होने लगेगा । यदि साधक अपने गुरु से आन्तरिक रुप से जुड़ा है तो वे एक-दूसरे से संपर्क स्थापित कर सकते हैं । इसे ही अध्यात्म में समर्पण कहते हैं । जिस साधक का अपने गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण हो जाता है, उसका मन गुरु से एकाकार हो जाता हैं ।

यही गुरु और शिष्य का वास्तविक संबंध है । यही वह अवस्था है जब आप भी गुरु तक अपने भाव संप्रेषित कर सकते हैं और उनका मार्गदर्शन, उनके निर्देश, प्रत्यक्ष दर्शन सब प्राप्त कर सकते हैं ।

 :- मां रासेश्वरी देवी ।

सूक्ष्म संवेदिता एक रहस्य , एक सच्चाई । निज अनुभव ।

पुज्यनिया मां रासेस्वरी देवी जी के श्री मुख से  - 
सूक्ष्म संवेदिता एक रहस्य , एक सच्चाई  । निज अनुभव । 
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विचारों का संचार बिना किसी स्थूल माध्यम के करने की प्रक्रिया को दूर संवेदिता या सूक्ष्म संप्रेषण कहा जाता है । एक सामान्य मस्तिष्क दूर संवेदों को न तो पूरी तरह भेजने और न ही उसे प्राप्त करने में सक्षम होता है । हाँ , इसे अवश्य ही विकसित किया जा सकता है समुचित अभ्यास द्वारा । सूक्ष्म संवेदना में समय,  दूरी और भाषा बाधक बनकर खड़ी नही होती । क्योंकि विचार शब्द के रुप में संप्रेषित नहीं होता वरण् जो वास्तविक विचार किसी के मस्तिष्क में चलता है, वह भाव रुप में दूसरे मस्तिष्क तक पहूँचकर पुन: विचार रुप में रुपांतरित होकर उस तक संप्रेषित होता है । यहां मस्तिष्क की सचेतना ही कार्य करती है । 
आध्यात्मिक जगत में इस प्रकार के संप्रेषण का बड़ा महत्व है । अनेकों प्रमाण , आख्याण भारतीय परंपरा में भरे परे हैं जब गुरु अपना मार्गदर्शन सूक्ष्म संप्रेषण रुपी आन्तरिक पथ द्वारा अपने शिष्यों को प्रदान किया करते थे और आज भी कर रहें हैं ।

यानि मार्गदर्शन सीधे मन-से-मन, ह्रदय-से-ह्रदय और आत्मा-से-आत्मा तक ।
एक समय आता है जब शिष्यत्व की परिपक्वता पर शिष्य वह सबकुछ भी बिना किसी माध्यम के दूर से  सबकुछ सुनने लगता है, जो गुरुवर मूक संप्रेषण के द्वारा उस तक पहूँचाना चाहते हैं या शिष्य के किसी भी प्रश्न , जिज्ञांसा का समाधान या मार्गदर्शन मूक संप्रेषण के द्वारा करने लगते हैं । अब वह अपने गुरुवर की कही-अनकही बातों, उनके मनोभावों को ही नही समझता, वल्कि उनके बीच संवादो का आदान प्रदान के लिए किसी माध्यम की जरुरत ही नही रह जाती है ।
इसे आज के वैज्ञानिक युग मे विज्ञान ने भी माना है और नाम दिया है मूक संप्रेषण, इस पर शोध भी चल रहे हैं ।
ऐसे मे जहां तक हमारे श्री महाराज जी की बात है ! जिस प्रकार वे प्रवचन और सत्संग के माध्यम से अपनी अहैतुकी कृपा आम लोगों के मध्य वितरित करते हैं उसी प्रकार वे अपनी विशेष कृपा सूक्ष्म संप्रेषण द्वारा अपने कृपा पात्रो को बाँटते हैं ।

श्री महाराज जी अकसर ही कहा करते थे कि जो साधक मेरी स्थूल उपस्थिति तक ही सीमित रहते हैं, मुझसे आन्तरिक तार नहीं जोड़े रखते, उनका संबन्ध मेरे स्थूल अस्तित्व तक हीं सीमित रह जाता है और मैं भी उससे उसी स्तर पर संबंध रख पाता हूँ । , किन्तु जो दूर रहकर भी आन्तरिक स्तर पर मेरी उपस्थिति का सदैव अनुभव करते हैं, वे सदा मेरे करीब हैं । तभी तो अनेकानेक साधकों का यह दावा है कि उन्हे दूर रहकर भी अपने गुरुवर के दर्शन , उनका मार्ग दर्शन प्राप्त होता था और आज भी प्राप्त हो रहें हैं ।
जब कोई आध्यात्मिक क्षेत्र में कदम रखता है तो उसे अपने गुुरु से आन्तरिक संबंध अवश्य ही स्थापित करना चाहिए क्योंकि तभी आन्तरिक सम्प्रेषण संभव है ।
साधक के लिए अपने गुुरु से संबंध बनाए रखने की यही एक सबसे कारगर विधि है । और इसी विधि द्वारा गुरु अपने शरणागतों से जुड़े रहते हैं । 

एक रहस्य की बात आपको बतलाऊँ ! जो साधक सुदूर क्षेत्रों में रहते थे, वे कई बार उन साधकों की तुलना में अधिक गहरा संबंध जोड़ पाए जो श्री महाराज जी के सन्निकट रहे ।
साधकों द्वारा श्री महाराज जी से आन्तरिक संबंध स्थापित करते ही उन्हे संदेश ठीक उसी प्रकार प्राप्त होने लगते हैं जैसे तार को सर्किट हाऊस से जोड़ते ही उसमें विद्युत का प्रवाह स्वयं: ही होने लगता है । अर्थात् गुरु की ऊर्जा उस शिष्य की ओर बहने लगती है । 

तन-मन-धन की सेवा के माध्यम से  श्री महाराज जी अपने अनुयायियों को उनके आन्तरिक परिवर्तन में सहायता करते हैं ताकि वे अपनी ऊर्जा और अपने ज्ञान को प्रवाहित करने का उपयुक्त संवाहक उन्हे बना सकें । 
गुुरु और साधक के बीच संप्रेषण की स्थिति उसकी शरणागति विशेष पर निर्भर करती है ।

:- मां रासेश्वरी देवी । अगस्त २०१५ ।

धनवान कौन ?

यह पोस्ट जरूर पढ़िए एक बार :- 
धनवान ऐसे लोगों को कहा जाता है , उनको नहीं जो सौ से ऊपर महंगी महंगी गाड़ी । अरबों अरब का मकान , सौ करोड़ से ऊपर अपनी बीबी के बर्थडे पर उड़ाना, हजारों जोड़ी महंगे जूते,  बेटी बेटा के शादी में एक एक लाख का एक निमंत्रण पत्र , अरबों रूपया एक शादी में उड़ाने वाले और करोड़ो की साड़ी पहनने वाले सो कौल्ड हमारे देश भारत के बिजनेस मैन , हिरो , हिरोईन , नेता , अभिनेता आदि हैं । 

इनलोगों को  " मि. सादियो माने सेनेगल"  विश्व प्रसिद्ध फुटबौल खिलाड़ी, प. अफ्रिका  से  सिखना चाहिए की धनवान कैसा होता है और किसको कहते हैं । पढ़िए इस आदरणीय असली धनवान को :- 

 विश्वप्रसिद्ध फुटबॉल खिलाड़ी 27 वर्षीय "सादिओ माने सेनेगल" (पश्चिम अफ्रीका), की कमाई भारतीय रुपयों में गिनें तो प्रति सप्ताह 1 करोड़ 40 लाख रुपये है,इन्हें कई जगह पर टूटे हुए फोन के साथ देखा गया हैं।।
एक इंटरव्यू में जब उनसे उसके बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा मैं उसे ठीक करवा लूंगा,जब उनसे पूछा गया कि आप नया क्यों नही ले लेते,तब उन्होंने कहा मैं ऐसे हजार खरीद सकता हूँ, 10 फरारी , 2 जेट प्लेन , डायमंड घड़ियां खरीद सकता हूँ।। लेकिन मुझे ये सब क्यों चाहिए ?

मैंने गरीबी देखी है मैं पढ़ नही पाया उस वजह से,मैंने स्कूल्स बनवाये हैं ताकि लोग पढ़ पाए,मेरे पास जूते नही थे, मैं बिना जूतों के खेलता था,अच्छे कपड़े नही थे,खाने को नही था।। आज मुझे इतना कुछ मिला है तो मैं उसका दिखावा करने के बजाए मैं उसे अपने लोगों के साथ बांटना चाहता हूं । 

इस पोस्ट को हमारे देश के सभी ऐसे धनी को भेज दिजिए जो अपने धन पर अहंकार करते हैं। और सेवा किसे कहते हैं सीखे इनसे । 
"मत भूलिए, भगवान ने आपको शक्ति दिया है निर्बलों की रक्षा के लिए , ज्ञान दिया है अशिक्षितों को शिक्षा देने के लिए और धन दिया है सही पात्र को दान देने के लिए , अईयासियों के लिए नहीं, नहीं तो अगला जन्म..?"

और हां  मुकेश अंबानी , अदानी , सभी खान अभिनेता ,  अनील कपूर जी, कपूर खानदान, ह्रितीक रौशन जी , करण जौहर जी , क्रिकेट के भगवान कहलाने वाले सचीन जी , और धोनी आदि लोगों को तो जरूर भेजिए मेल से । क्या हमारे देश में एक भी ऐसा धनवान है जो मिशाल बने ?
कुछ लोग हमारे देश में अपने सालों के कमाई का मात्र एक दो प्रतिशत दान करके अपना फर्ज पुरा समझते हैं । और हल्ला ऐसे करते हैं जो बहुत एहसान कर दिया हो देश के गरीबों पर । इनको यह आइना दिखाना जरूरी है।

आज के शहरिकरण , बाजारवाद , भौतिक भोगवाद के युग में शादी विवाह में बहुत सावधानी की जरूरत है :-

मेरी सलाह :- आज के शहरिकरण , बाजारवाद , भौतिक भोगवाद के युग में शादी विवाह में बहुत सावधानी की जरूरत है :- 

 जो परिवार परोपकारी नहीं है । जो मां बाप परोपकार का काम कभी नहीं किया जीवन में या नाम मात्र का किया है  , उसका लड़का भी परोपकारी नहीं होगा कभी ज्यादातर केस में । और जो परोपकारी नहीं होगा तो उसके सीने में दया नहीं होगा । और दया नहीं होगा तो ऐसा लोग कुछ भी ग़लत कर सकता है किसी के साथ । 

संस्कार सबसे पहले मां बाप , दादा दादी से परिवार में मिलता है । तो जो परिवार सामाजिक कामों में , गरीबों के लिए , समाज में धन दान नहीं किया, सेवा भाव नहीं उसमें  । सामान दान ( जैसे अन्न , धन आदि ) नहीं किया या किया तो बस नाम मात्र का औपचारिकता के लिए दिखाने के लिए केवल  । 
बस एक दो दस रूपया किसी भिखाड़ी  के कटोरे में कभी कभी डाल दिया । और मंदिर मंदिर , तिरथ विरथ, पुजा पाठ , कर्मकांड जैसे सत्यानारायण भगवान आदि का पुजा आदि  केवल करता है उनमें से सभी लोग आध्यात्मिक नहीं होता  , यानि परोपकारी नहीं होता ।

दरअसल  ऐसे लोग भगवान को , रिस्तों को , अपनी इच्छा पूर्ती का साधन समझते हैं केवल  , इसलिए कर्म कांड यानि सत्यनारायण का पुजा , हवन आदि करते रहते  है लोग अपनी इच्छा पूर्ति के लिए ।

 ऐसे लौंग जो self centred  होते हैं चाहे धन कितना भी हो , नौकड़ी कितनी भी अच्छी हो । बंगला कितना भी बड़ा हो , गाड़ी कितनी भी बड़ी हो , घर में सोफासेट हो , बढीया फरनिचर हो , झाड़फानुष हो , शरीर पर चमकता दमाकता लिवास हो , मंहगे जुते हो , हाई स्टेटस हो पर जरूरी नहीं कि ऐसे सभी परिवार में बढीया  माइंड सेट हो , चरित्र वरित्र बढीया हो , तो ऐसे घर में आप लड़की देंगे तो एक दिन आपके लड़की को तड़पाऐगे ही ।

तो जिसमें दैविक गुण नहीं है जैसे ईमानदारी , जीवों के लिए दया , प्रेम,  करूणा , त्याग , वलिदान , क्षमा , नैतिकता आदि  मानवता का गुण नहीं है तो वो मनुष्य के रूप में भेड़िया होता है । वो समाज , देश के ऊपर बोझ होता है । ऐसे लोग अयीयास होते हैं । 
तो  ऐसे लोगों के घर में अपनी वे
बेटी का व्याह कभी नहीं करना चाहिए । और बेटी वाले को भी चाहिए की वो अपने बेटी को अच्छा संस्कार दे और बेटी के व्याह के बाद उसको प्रत्येक दिन फ़ोन करके उसके किचन में क्या बन रहा है का खोज खबर ना ले । इससे बेटी का घर बसता नहीं तबाह होता है । अपनी बेटी को संस्कार का शिक्षा दे पहले ।
और अगर बेटा बाला संस्कारी हैं और परोपकारी है तो उसको अपने घर में बहु लाने से पहले वो भी यह चेक करें की जीस घर का वो बहु ला रहा है वो कितना परोपकारी है , कैसा संस्कार दिया है अपने बेटी को ? और दोनों लड़का पक्ष और लड़की पक्ष एक दुसरे के बारे में यह पता लगाएं की दोनों का परिवार परोपकार के लिए कितना काम किया है , कितना धन अपने उपर खर्च किया और अपने आमदनी का कितना प्रतिसत सही सही दान किया । अगर नहीं तो वो परोपकारी नहीं , नैतिक चरित्र का स्वामीं नहीं । दुसरे जीवों के लिए उसमें  दया का भाव , करूणा का भाव , प्रेम का भाव नहीं है ।

 तो ऐसे परिवार में शादी करने के बाद लोग पछताते हैं । और पछताऐगे हीं । 
आज कल लोग शादी तय करते हैं इस आधार पर कि लडका लडकी कितना पढ़ा लिखा है , कितना धन है , कितना बढ़िया नौकड़ी व्यापार है । कैसा बंगला मकान है , कैसा समाजिक स्टेटस है आदि ।
पढ़ाई लिखाई , बंगला गाड़ी , नौकर चाकर , स्टेटस यह कभी गारंटी नहीं देता की परिवार कितना  परोपकारी है । धन का लोलुप , मानवता के दुश्मन , धन के रेस का  स्वामी  जरूरी नहीं चरित्रबान हो । आजकल लोग शादी को ऊंचे घर , पावर , दौलत , पैरवी , ऊंचा स्थान , आदि के लोभ में करते हैं । स्टेटस सिंबल मानते हैं रिस्ते को जिस कारण लड़का लड़की के वैबाहिक जीवन के सफलता का ध्यान कहीं से नहीं रखा जाता । शादी विवाह आदी  में खुब खर्च , पैसों का दुरूप्योग स्टेटस सिंबल से जोड़ दिया जाता है । तो ऐसी घटना शादी के बाद घटना स्वाभाविक है कि संबंध में दरार पैदा हो जाए और दोनों घर तबाह हो जाए ।  
अत: दोनों परिवार परोपकारी है या नहीं , लड़का लड़की परोपकारी है या नहीं । अगर है तो लड़के के स्टुडेंट लाइफ में लड़का के पास कितना ऐसा सर्टिफिकेट्स है जो उसको सोसल वर्क , समाजिक काम में भाग लेने पर मिला है ? फिर जब से वो नौकड़ी या व्यापार कर रहा है तो उसने कितना दान पुण्य अपने कमाई से किया है ? चेक करें पहले । उसके मां बाप का भी समाजिक काम , परोपकार के काम को चेक करें । नहीं तो वो केवल मुख से अपना बड़ा बड़ा बड़ाई कर देगा पर अंदर कोई काम ऐसा नहीं किया है पता चलेगा बाद में । 

अत: यहां आध्यात्मिक परिवार से मतलव यह है कि उसमें त्याग , दान पुण्य , परोपकार , दया का काम कितना किया है । नहीं तो आपको बोल देगा की हम बहुत पुजा पाठ करते हैं , एक एक घंटा घंटी डोलाते है घर में , खुब धार्मिक यात्रा करते हैं । और समझ लेंगे वो आध्यात्मिक है फिर आप ठगा जाएंगे ।  कारण ऐसा लोग भगवान को , समाज को , देश को ,  रिस्तो को केवल अपने ईच्छा पूर्ति का साधन समझते हैं और किसी के जीवन का इस्तेमाल अपने हित के लिए करतें हैं , यही कारण है कि इन दैविक गुणों और कर्मो के अभाव में लोग लड़का लड़की का जीवन बर्बाद करने में भी नहीं चुकते । 
अत: जो वास्तविक परोपकारी होगा वो अनैतिक काम कभी नहीं करेगा । 
आज ऐसा अच्छा बहुत लोग हैं , बहुत परिवार अच्छा है नहीं तो धरती समाप्त हो गया होता । अभी साठ सत्तर  प्रतिशत से ऊपर अच्छे लोग हैं इसलिए समाज रहने लायक बचा है । पर हम खोजना नहीं चाहते , हम बाहरी चकाचौंध के तरफ,  स्टेटस के तरफ जाते हैं और परेशानी खुद मोल लेते हैं । 
- संजीव कुमार , रांची , मुजफ्फरपुर।।

तेरा हर फैसला‌ मंजूर है , कबुल है ।।

किस्मत है वो हमारी जो तेरा फैंसला है,
राजी हैं हम उसी में जिस में तेरी रजा है,

होता वही है जो तुम चाहते हो , 
तो जो तुम चाहते हो उसी को मैं भला क्यूं न चाहुँ ?
 तुम तो हो भगवन , मां बाप एक हमारे ,  
तुम अपने बच्चे का भला हीं चाहते हो
 करते हो भला हमेशा ,अपनी बुद्धि क्यों लगाऊं ?
तुमसे अलग ऐ हमदम चाहत मैं क्यों सजाऊँ ? 
खुद की चाह और चिंता दोनो को बंद करके,
भजता हुं सिर्फ तुमको , मैं औरों को कैसे चाहुं ?

हाथो को दुआ की खातिर मैं उठाऊंँ कैसे ,
सजदे में तेरे आकर सर को झुकाएं कैसे,
मजबूरियांँ हमारी बस तू ही जानता है ,
राजी हैं हम उसी में जिस में तेरी रजा है,

रो कर कटे या हंस कर, कटती है जिंदगानी,
तू गम दे, या ख़ुशी दे सब तेरी मेहेरबानी,
तेरी ख़ुशी समझ कर सब गम भुला दिया है,
राजी हैं हम उसी में जिस में तेरी रजा है 
किस्मत है वो हमारी जो तेरा फैंसला है, 
करो हर फैसले तुम , वो मेरे लिए सही है,
राजी है हम उसी में जिसमें तेरी रजा है ।।

what is real meaning of freedom ?

 Freedom is not to be free for all. Freedom is a high discipline to be maintained by the people in favour of society, nation, family and self development by the way of constructive approach and practice. :- Sanjeev Kumar , Ranchi . 

सफ़र-ए- जिंदगी का तू अकेला ही मुसाफिर है,

सफ़र-ए- जिंदगी का तू अकेला ही मुसाफिर है,
बेगाने हैं ये सब जो अपनापन जताते हैं,
छोड़ जाएँगे ये साथ इक दिन तेरा राहों में
वो जो आज खुद को तेरा हमसफ़र बताते हैं।
तेरा साथी बस मात्र हरि गुरू हीं होगा ।
वही तेरा रक्षक और वही तेरा रह-गुज़र होगा । ।

तेरी जिंदगी की असलियत का
जब तुझ पर असर होगा,
असल में उस समय ही
शुरू तेरे जीने का सफ़र होगा।

मत कर गुरूर खुद के वजूद पर
इक दिन न इसका नाम-ओ-निशां होगा,
कितना भी भाग लो मौत से लेकिन
सफ़र-ए-जिंदगी का यही आखिरी मुकाम होगा।।

( मेरी कविता ।)

Thursday, 19 November 2020

दर्द कागज़ पर, मेरा बिकता रहा,

दर्द कागज़ पर,

          मेरा बिकता रहा,

 

मैं बैचैन था,

          रातभर लिखता रहा..

 

छू रहे थे सब,

          बुलंदियाँ आसमान की,

 

मैं सितारों के बीच,

          चाँद की तरह छिपता रहा..

 

दरख़्त होता तो,

          कब का टूट गया होता,

 

मैं था नाज़ुक डाली,

          जो सबके आगे झुकता रहा..

 

बदले यहाँ लोगों ने,

         रंग अपने-अपने ढंग से,

 

रंग मेरा भी निखरा पर,

         मैं मेहँदी की तरह पीसता रहा..

 

जिनको जल्दी थी,

         वो बढ़ चले मंज़िल की ओर,

 

मैं समन्दर से राज,

         गहराई के सीखता रहा..!!

 

"ज़िन्दगी कभी भी ले सकती है करवट...

तू गुमान न कर...

 

बुलंदियाँ छू हज़ारमगर...

उसके लिए कोई 'गुनाहन कर.

 

कुछ बेतुके झगड़े,

कुछ इस तरह खत्म कर दिए मैंने 

जहाँ गलती नही भी थी मेरी,

फिर भी हाथ जोड़ लिए मैंने ।।


 

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ईश्वर की मर्जी हमारे लिए शुभदायक है ।।

ईश्वर कि मर्जी पर रहे खुश –

एक बच्चा अपनी माँ के साथ खरिदारी करने एक दुकान पर गया तो दुकानदार ने उसका मासूम चेहरा देख कर टौफियो का डब्बा खोला और उसके आगे करके कहा , लो जितनी चाहे टौफियाँ ले लो |’

लेकिन उस बच्चे ने उसे बेहद शालीनता से मना कर दिया | दुकानदार ने दुबारा कहा लेकिन बच्चे ने खुद टौफिया नहीं ली | बच्चे कि माँ ने बच्चे को टौफियाँ ले लेने के लिए कहा | लेकिन बच्चे ने खुद टौफिया लेने के बजाए दुकानदार के आगे हाथ फैला दिया और कहा,’आप खुद ही देदो अंकल|’ दुकानदार ने टफिया निकलकर उसे देदी तो बच्चे ने दोनों जेंबो में डाल ली | वापस आते वक्त उसकी माँ ने पुछा की ‘जब दुकानदार ने डब्बा आगे किया तब टॉफी क्यों नहीं ली और उन्होंने खुद निकलकर दी तब ले ली ? इसका क्या मतलब ?’ बच्चे ने बड़े मासूमियत से जवाब दिया कि ‘माँ मेरे हाथ छोटे हैं खुद निकलता तो एक या दो टौफियाँ आती |

अंकल के हाथ बड़े थे, उन्होंने खुद निकाल कर दी तो देखो कितनी सारी मिल गई’ |

ठीक इसी तरह हमें उस ईश्वर कि मर्जी में खुश रहना चाहिए | कुछ नही मांगना चाहिए ,

क्या पता वह किसी दिन हमें पूरा आनन्द का सागर - परमानन्द देना चाहता हो और हम अज्ञानतावश बस एक चम्मच लिए वो भी मायिक वस्तु के लिए ही खड़े हो |

:- Sanjeev kumar ( My blog story )

 

जीवन की बहुत बड़ी सीख

जीवन की बहुत बड़ी सीख इस सत्य कहानी से :- बहुत महत्त्वपूर्ण घटना है सीख के लिए ।

धनवान होना गलत नहीं है ,

बल्कि.......

"सिर्फ धनवान होना गलत है"

 

माइकल जैक्सन 150 साल जीना चाहता था!

 किसी सेे साथ हाथ मिलाने से पहले दस्ताने

पहनता था!

 लोगों के बीच में जाने से पहले मुंह पर मास्क

लगाता था !

अपनी देखरेख करने के लिए उसने

अपने घर पर 12 डॉक्टर्स नियुक्त किए हुए थे !

जो उसके सर के बाल से लेकर पांव के नाखून तक की

जांच प्रतिदिन किया करते थे!

 उसका खाना लैबोरेट्री में चेक होने के बाद उसे

 खिलाया जाता था!

 स्वयं को व्यायाम करवाने के लिए उसने

15 लोगों को रखा हुआ था!

माइकल जैकसन अश्वेत था,

उसने 1987 में प्लास्टिक सर्जरी करवाकर

अपनी त्वचा को गोरा बनवा लिया था!

अपने काले मां-बाप और काले दोस्तों को भी

छोड़ दिया

 गोरा होने के बाद उसने गोरे मां-बाप को

किराए पर लिया! और

 अपने दोस्त भी गोरे बनाए

शादी भी गोरी औरतों के साथ की!

नवम्बर 15 को माइकल ने अपनी नर्स डेबी रो

 से विवाह किया,

 जिसने प्रिंस माइकल जैक्सन जूनियर (1997)

 तथा

 पेरिस माइकल केथरीन (3 अपैल 1998) को

 जन्म दिया।

वो डेढ़ सौ साल तक जीने के लक्ष्य को लेकर

चल रहा था!

 हमेशा ऑक्सीजन वाले बेड पर सोता था

उसने अपने लिए अंगदान करने वाले

 डोनर भी तैयार कर रखे थे!

 जिन्हें वह खर्चा देता था,

ताकि समय आने पर उसे किडनीफेफड़ेआंखें

 या किसी भी शरीर के अन्य अंग की जरूरत

पड़ने पर वह आकर दे दें,

 उसको लगता था वह पैसे और अपने रसूख की

बदौलत मौत को भी चकमा दे सकता है,

लेकिन वह गलत साबित हुआ

 25 जून 2009 को उसके दिल की धड़कन

रुकने लगी,

उसके घर पर 12 डॉक्टर की मौजूदगी में

हालत काबू में नहीं आए,

 सारे शहर के डाक्टर उसके घर पर जमा हो गए

 वह भी उसे नहीं बचा पाए।

 

उसने 25 साल तक डॉक्टर की सलाह के

विपरीतकुछ नहीं खाया!

 अंत समय में उसकी हालत बहुत खराब हो गई थी

 50 साल तक आते-आते वह पतन के करीब ही पहुंच गया था

और 25 जून 2009 को

वह इस दुनिया से चला गया !

जिसने अपने लिए डेढ़ सौ साल जीने का

इंतजाम कर रखा था!

उसका इंतजाम धरा का धरा रह गया!

जब उसकी बॉडी का पोस्टमार्टम हुआ तो

डॉक्टर ने बताया कि,

उसका शरीर हड्डियों का ढांचा बन चुका था!

उसका सिर गंजा था,

उसकी पसलियां कंधे हड्डियां टूट चुके थे,

उसके शरीर पर अनगिनत सुई के निशान थे,

प्लास्टिक सर्जरी के कारण होने वाले दर्द से

छुटकारा पाने के लिए एंटीबायोटिक वाले

दर्जनों इंजेक्शन उसे दिन में लेने पड़ते थे!

 

माइकल जैक्सन की अंतिम यात्रा को

 2.5 अरब लोगो ने लाइव देखा था।

 यह अब तक की सबसे ज़्यादा

 देखे जाने वाली लाइव ब्रॉडकास्ट हैं।

 

माइकल जैक्सन की मृत्यु के दिन यानी

 25 जून 2009 को 3:15 PM पर,

Wikipedia,Twitter और AOL’s

instant messenger

यह सभी क्रैश हो गए थे।

उसकी मौत की खबर का पता चलता ही

गूगल पर 8 लाख लोगों ने

 माइकल जैकसन को सर्च किया!

 ज्यादा सर्च होने के कारण गूगल पर

 सबसे बड़ा ट्रैफिक जाम हुआ था! और

 गूगल क्रैश हो गया,

ढाई घंटे तक गूगल काम नहीं कर पाया!

मौत को चकमा देने की सोचने वाले

 हमेशा मौत से चकमा खा ही जाते हैं!

 

सार यही है,

बनावटी दुनिया के बनावटी लोग

कुदरती मौत की बजाय

बनावटी मौत ही मरते हैं!

 

"क्यों करते हो गुरुर अपने चार दिन के ठाठ पर ,

मुठ्ठी भी खाली रहेंगी जब पहुँचोगे घाट पर"...

 

कुछ गंभीर प्रश्न--

चिन्तन अवश्य कीजियेगा.......

 

क्या हम बिल्डर्सइंटीरियर डिजाइनर्स,

केटरर्स और डेकोरेटर्स के लिए कमा रहे हैं ?

 

हम बड़े-बड़े क़ीमती मकानों और

 बेहद खर्चीली शादियों सेजन्म दिन पर करोंड़ों उड़ा कर

 किसे इम्प्रेस करना चाहते हैं ?

 

क्या आपको याद है कि,

 दो दिन पहले किसी की शादी पर आपने

 क्या खाया था ?

 

जीवन के प्रारंभिक वर्षों में,

क्यों हम पशुओं की तरह काम में जुते रहते हैं ?

 

कितनी पीढ़ियों के,खान पान और

लालन पालन की व्यवस्था करनी है हमें ?

 

हम में से अधिकाँश लोगों के दो बच्चे हैं। बहुतों का तो सिर्फ एक ही बच्चा है। बहुतों को एक भी नहीं ।

 

        "हमारी जरूरत कितनी हैं ?और

          हम पाना कितना चाहते हैं"?

 

इस बारे में सोचिए।

 

क्या हमारी अगली पीढ़ी

 कमाने में सक्षम नहीं है जो,

 हम उनके लिए ज्यादा से ज्यादा

 सेविंग कर देना चाहते हैं ?

 

क्या हम प्रत्येक दिन आधा घंटा एकांत रूपध्यान साधना ( मेडिटेशन)  में खर्च नहीं कर सकते ?

 

क्या हम गरीबों को अपने से कमजोर व नीचें बाले की छोटी छोटी सहायता नहीं कर सकते ?

क्या हम अपने मित्रों के लिए दुआ नहीं कर सकते क्या हम सबके लिए दुआ नहीं कर सकते ?

 

 

क्या आप अपनी मासिक आय का

 5% से 10% दान सही जगह पर नहीं कर सकतें ?

 

सामान्यतः जवाब नहीं में ही होता है। बहुत कम लोग हैं सात अरब में से शायद एक प्रतिशत भी नहीं ।

 

इससे पहले कि हम आप

 स्लिप डिस्क्स का शिकार हो जाएँ,

 इससे पहले कि,

 कोलस्ट्रोल आपके हार्ट को ब्लॉक कर दे,

परमानंद प्राप्ति के लिए समय निकालिए !!

 

हम किसी प्रॉपर्टी के मालिक नहीं होते,

 सिर्फ कुछ कागजातोंकुछ दस्तावेजों पर

अस्थाई रूप से हमारा नाम लिखा होता है।

 

ईश्वर भी व्यंग्यात्मक रूप से हँसते हैं

 जब कोई उनसे कहेगा कि,

 

"मैं जमीन के इस टुकड़े का मालिक हूँ "

 

किसी के बारे में,

 उसके शानदार कपड़े और

 बढ़िया कार देखकर,

 राय कायम मत कीजिए।

 

हमारे महान गणित और विज्ञान के शिक्षक

स्कूटर पर ही आया जाया करते थे !!*

 

धनवान होना गलत नहीं है ,

बल्कि.......

"सिर्फ धनवान होना गलत है"

 

आइए ज़िंदगी को पकड़ें,

इससे पहले कि,

जिंदगी हमें पकड़ ले...

 

एक दिन हम सब जुदा हो जाएँगे,

तब अपनी बातें,

अपने सपने हम बहुत मिस करेंगे।

 

दिनमहीनेसाल गुजर जाएँगे,

 शायद कभी कोई संपर्क भी नहीं रहेगा।

 एक रोज हमारी बहुत पुरानी तस्वीर देखकर 

 हमारे बच्चे हमी से पूछेंगे कि,

"तस्वीर में ये दुसरे लोग कौन हैं" ?

 

तब हम मुस्कुराकर

 अपने अदृश्य आँसुओं के साथ

 बड़े फख्र से कहेंगे---

"ये वो लोग हैंजिनके साथ मैंने

अपने जीवन के बेहतरीन दिन गुजारे हैं। "

 

श्री राधे ।।

:- संजीव कुमार रांची झारखंड ।

16 जुलाई 2016 समय 11.45 AM