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Friday, 20 November 2020

सूक्ष्म संवेदिता

"संवाद के दृष्टिकोण से गुरु और शिष्य के बीच दो प्रकार के संबंध होते हैं- एक मौखिक तत्त्वज्ञान संप्रेषन का और दूसरा आन्तरिक भाव संप्रेषन का । 
तत्त्वज्ञान प्रदान करने हेतु गुरु सदैव शिष्य को मौखिक उपदेश-निर्देश देते रहते हैं,
परन्तु सूक्ष्म संप्रेषन में शिष्य को उसी ज्ञान का अनुभवात्मक बोध होता है । संप्रेषन पूर्णरुपेण चेतना पर आधारित होता है । गुरु जो हमारी सर्वोच्च चेतना में स्थापित है, वे कोई स्थूल व्यक्तित्व नहीं , सनातन तत्त्वज्ञान हैं । वे साधक से कभी भी संपर्क स्थापित कर सकते हैं, किन्तु शर्त यह है कि साधक भी अच्छा रिसीवर पर बना रहे । अर्थात् अपनी चेतना को गुरु से जोड़े रखे और पूर्ण शरणागति की पात्रता विकसित करे । 

"संप्रेषण के माध्यम से गुरु के द्वारा दिय गय तत्त्वज्ञान का अच्छा रिसीवर बनने के लिय हम साधकों को अपने अवरोध का त्याग करना पड़ेगा । हमें बाँसुरी बननी पडे़गी । अन्त:करण की शुद्धिकरण की ओर बढ़ना पड़ेगा । उस सम्प्रेषण को रिसीव करने के लिए एकाग्रचित होना पड़ेगा । पूर्ण आस्थावान बनना पड़ेगा । 
साधक को अपने मन-व्यक्तित्व को बस एक पहचान देनी पड़ेगी - 'गुरु जो चाहें वही मेरा मन और जैसा वे गढ़ें वही मेरा व्यक्तित्व ।' तभी उसमें भक्ति-प्रेम रुपी संगीत का प्रवाह संभव है । गुरु से समस्वरित होते ही उनकी कृपा का प्रवाह साधक में होने लगेगा । यदि साधक अपने गुरु से आन्तरिक रुप से जुड़ा है तो वे एक-दूसरे से संपर्क स्थापित कर सकते हैं । इसे ही अध्यात्म में समर्पण कहते हैं । जिस साधक का अपने गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण हो जाता है, उसका मन गुरु से एकाकार हो जाता हैं ।

यही गुरु और शिष्य का वास्तविक संबंध है । यही वह अवस्था है जब आप भी गुरु तक अपने भाव संप्रेषित कर सकते हैं और उनका मार्गदर्शन, उनके निर्देश, प्रत्यक्ष दर्शन सब प्राप्त कर सकते हैं ।

 :- मां रासेश्वरी देवी ।