आज हम सब देख रहे हैं जो देश उन्नत है जो देश तकनिकी रूप से सबसे अधिक विकसित है, जिस देश में सबसे अधिक पढ़ें लिखे लोग हैं, हर तरह से तकनिकी विकास, आर्थिक विकास आदि से लैश है वहां उतनी ही अधिक अशांति है, व्यभिचार है , लड़ाई झगड़ा है , भ्रष्टाचार है, युद्ध है , क्राईम है । आज विकसित देश के काफी पढ़ें लिखे नेतागण तथा लोग असुरों कि भांति व्यवहार कर रहे हैं, आसुरी बात करते पाए जा रहे हैं , तर्क कुतर्क , अतितर्क एवं अतिश्योक्ति का भरमार है उनके बातों में सोंच में , एक दुसरे देश पर बम बरसा रहे हैं, राकेट दाग रहे हैं । निर्दोष लोगों कि हत्या कि जा रही हैं, दुनिया को नर्क बनाने में अथाह धन खर्च किए जा रहे हैं ।
चारों तरफ युद्ध के बादल मंडरा रहे हैं, युद्ध पर युद्ध हो रहे हैं बरसों से , लोग उन्मादी तथा पागलपन के हद को पार कर चुके हैं , परमाणु बम, हाईड्रोजन बम , तरह तरह के आयुध सामग्री विकसित किए जा रहे हैं , हथियारों कि होड़ लगी हुई है । एक दिन यह दुनिया अवश्य ही अपने ही भौतिक उन्नति, उच्च भौतिक शिक्षा तथा तकनिकी विकास रूपी काल का ग्रास बनने कि दिशा में अग्रसर है । धरती रहने लायक नहीं बचेगी । हमारी पृथ्वी दुसरा मंगल ग्रह बनने वाला है , यह दिन दुर नहीं है ।
अत: ऐसे समय में इस घोर कलयुग में जो मनुष्य समझदार हैं वो पंचम मूल जगद्गुरूतमई श्री कृपालुजी महाराज जैसे उच्चतम कोटि के श्रोत्रिए एवं ब्रह्मनिष्ठ वास्तविक संत , भगवद् अवतार महापुरूष को अपना गुरू मान कर , उनके द्वारा दिए गए शिक्षा को आत्मसात करके , उनका शरणागति करते हुए अपने खाली समय का एक एक सेकेंड का भरपुर सदुपयोग करके उनके बतलाए मार्ग का अनुसरण करके अपने परम कल्याण के मार्ग पर अग्रसर है।
और जो जो ना समझदार है वो अपने समय को लोक रंजन , सोसल मीडिया में , इधर उधर गप करने में अपने समय को बर्बाद करने में लगे हैं । इन सबसे कुछ भी हासिल नहीं होने वाला है , अरे जिसको भगवान के अनेकों अवतार नहीं समझा सके , जिसको बड़े से बड़ा वास्तविक मूल जगद्गुरू नहीं समझा सके इस दुनियां में उसको भला हम आप कैसे समझा लेगें ?
हमें स्वयं के निर्माण पर फोकस करना चाहिए। हमें अपने समय को स्वयं के आध्यात्मिक उत्थान उपलब्धि तथा आध्यात्मिक कल्याण में खर्च करना चाहिए । हमें अधिक से अधिक एकांत साधना करके अपना बिगड़ी बनाने में अधिक से अधिक समय तथा उर्जा खर्च करना चाहिए।
हम साधक लोग साधना करने के बजाए अपना किमती समय तथा इनर्जी यूं हीं फजूल के काम में तथा दुसरो को समझाने में लगा रहें हैं । हम स्वयं का निर्माण न करके दुसरे को समझाने में लगे हैं ।
दुसरा तो कभी नहीं समझेगा, लोग लिखित पोस्ट भी नहीं पढ़ते ठीक से, आत्मसात करने कि बात तो काफी दूर कि कौड़ी है । दुसरा हमको काम नहीं देने वाला यह तय है , हमारा अपना भी लूट रहा है दुसरो को समझाने के चक्कर में और दुसरे पर भी कोई असर नहीं ।
अरे जब हम पर ही असर नहीं श्री महाराज जी के तत्वज्ञान का तो दुसरे को हम क्या खाक समझा लेंगे ? यह तो हास्यास्पद बाला बात तथा व्यवहार के सीवा कुछ भी नहीं । यह सब लोक रंजन है ।
लोक रंजन को हीं हम साधना , सेवा तथा भक्ति समझ बैठे हैं । हम भ्रम में जी रहे हैं । इस तरह हम आत्मघाती है , हमारी बर्बादी सुनिश्चित है ।
दुसरो के जगह खुद के निर्माण पर हमें ध्यान देना चाहिए , अब अधिक समय नहीं है हमारे पास , जीवन ऊर्जा छीन हो रही है , उम्र बिता जा रहा है , काल घात लगाए बैठा है , यमदूत घसीटने के लिए तैयार बैठा है । इससे पहले कि हम यमदूत द्वारा घसीटे जाए , चौरासी लाख के चक्कर में फिर से भेज दिए जाएं , हमें अपना समय नष्ट न करके आत्मकेंद्रित होकर हमें आत्मनिर्माण कर लेना चाहिए ताकि कम से कम दुसरा जीवन मानव शरीर में हीं मिले और हम आगे कि साधना करके गोलोक में अपना स्थान सुनिश्चित कर लें । इसलिए हमें खुद कि जय करने में समय खर्च करना चाहिए।
"दुसरो कि जय से पहले खुद कि जय करें "
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