Sunday, 14 December 2025

ईष्ट और गुरू कि कृपा तथा गुरू द्वारा बतलाई साधना करने का परिणाम क्या है , लक्षण क्या हैं फल क्या है ?

ईष्ट और गुरू कि कृपा तथा गुरू द्वारा बतलाई साधना करने का परिणाम क्या है , लक्षण क्या हैं फल क्या है ? 

साधना और गुरू कृपा का परिणाम निम्नलिखित है :- 
1. पहला लक्षण या फल - शास्त्रों का सही सही ज्ञान तथा शास्त्र युक्ति में निपुणता । (यानि तत्वज्ञान पक्का होना तथा तत्वज्ञान का व्यवहारिक उपयोग ) .

2.दुसरा फल - साधक के मन में संसार से Detachment and attachment with GOD and GURU . संसार से वैराग्य तथा हरि गुरू से प्रेम कि उत्तरोत्तर बृद्धि। 
अंत:करण कि शुद्धि जिससे जीवन में संतोष , शांति,भगवद् आनंद का उत्तरोत्तर बृद्धि। 

3. तीसरा - साधक के अंदर सद्गुणों यानि दैविक गुणों का विकास । 

4.चौथा - निम्नलिखित पंचक्लेशों यानि पांचों प्रकार के विपत्तियों का क्रमिक शमन यानि लगातार नाश :- 

A) पहला पंचक्लेश - अविधा माया से मुक्ति यानि साधक के अंदर स्वाभाविक दिव्य ज्ञान कि उत्पत्ति तथा अज्ञानता रूपी अंधकार का नाश एवं विवेक का जागरण । 

B) दुसरा - अस्मिता यानि अहंकार तथा देहाभिमान का स्वाभाविक नाश , तृण से बढ़ कर दीनता तथा वृक्ष से बढ़ कर सहनशिलता यानि सहिष्णुता, नम्रता- विनम्रता आदि गुणों कि उत्पत्ति ।   

C) तीसरा - राग यानि किसी भी मायाबद्ध जीवों से अटैचमेंट यानि आसक्ति का नाश एवं केवल हरि गुरू से राग यानि केवल उनके प्रति ही हृदय में प्रेम कि उत्त्पति। 

D ) चौथा - द्वेष यानि दुसरे किसी भी मायाबद्ध व्यक्ति, विषय तथा वस्तु से घृणा के भाव का आभाव तथा संसार के प्रत्येक जीवों में हमारे ही ईंष्ट विद्यमान है इसका हर क्षण एहसास, अनुभूति। मन में अच्छे विचारों कि स्वाभाविक उत्पत्ति। मन के अंदर सर्वजन हिताय तथा सर्वजन सुखाए भाव कि उत्पत्ति बिना भेद भाव के । 

E) पांचवा- अभिनिवेश यानि मृत्यु के भय से मुक्ति। जीवन में निर्भयता , निश्चिंतता, निडरता का समावेश एवं उदंडता , उद्विग्नता, बेचैनी‌ आदि के भाव कि समाप्ति। संसार का कोई भी सामान मेरा नहीं है , यह नष्ट होने वाला है । समाप्त होने वाला है । यह देह भी अल्प समय के लिए मुझे भगवान के कृपा से मिला है ताकि मैं अपने भगवद् संबंधित लक्ष्य को हासिल कर सकूं । 

तथा इस भाव कि उत्पत्ति एवं अनुभूति कि हरि गुरू हर क्षण हमारे साथ है , मैं एक दिव्य आत्मा हूं , मैं देह नहीं हूं । मैं भी अनादि हूं , शाश्वत हूं , सनातन हूं , अविनाशी हूं , दिव्य हूं , क्योंकि मैं उस दिव्य , अनंत, अनादि , अविनाशी, सर्वसमर्थ, सर्वभूत , सर्वांतर्यामी , सर्वसुहृत, सर्वशक्तिमान, सर्वसुंदर, सर्वगुणों का खान, सत् चित् आनंदकंद भगवान श्री कृष्ण का सनातन अंश हूं । वो मेरे अंशी हैं , वो मेरे सर्वस्व हैं । मेरा सभी रिश्ता नाता केवल उन्हीं से है । हम उनके दास हैं , हम उनके पुत्र हैं , उनके दैविक संपत्ति पर मेरा अधिकार है जिसे देने के लिए वो मुझे अनुग्रहित करने लगे हैं । 

अत: मैं नश्वर , विनाशी , प्रतिक्षण घटने वाला , मिटने वाला , कम होने वाला , समाप्त होने वाले वस्तु , विषय तथा मायाबद्ध जीव से एवं इस संसार से आसक्ति क्यों रखूं ? 
मायाबद्ध विषय वस्तु तथा जीव से आसक्ति रखना ही मेरे दुख का एक मात्र कारण है । 

अत : साधना के फलस्वरूप जब ऐसे भावों का स्वाभाविक जागरण , उदय , उत्त्पति जीव के अंत:करण में होने लगे एवं हरि गुरू के लिए प्रेम का अनुभूति होने लगे तो समझना चाहिए कि हम ठीक ठीक रास्ते पर है, हमारी साधना ठीक चल रही है एवं मेरे उपर मेरे गुरू एवं मेरे एक मात्र ईष्ट श्री राधाकृष्ण कि अपार कृपा बरसने लगी है :- 
संजीव कुमार ।

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