ऐसे सजदों से भला कैसे कोई वास्तविक संत व खुदा राजी हो ? "
भारत में लगभग हम 90% लोग चोर है , भ्रष्ट है।
सौ में से नब्बे बेइमान फिर भी मेरा देश महान।
गमला चोरी करने वाला गरीब नहीं , अच्छा खासा मध्यम तथा उच्च वर्गीय परिवार के लोग है । चाहे वो जी 20 में मर्सिडीज कार में आकर गमला चोरी करता है या स्कूटी से आकर संभ्रांत परिवार कि महीला । चोर सब है और दोष देता है कि हमारे देश का नेता चोर है भ्रष्ट है , व्यवस्था चोर और भ्रष्ट है । अरे सबसे पहले हम तुम चोर हो , जहां मौका मिलता है चोरी करने से हम नहीं चुकते । और जिसको मौका नहीं मिलता वो कहता है हम इमानदार है । जिस देश का अधिकांश जनता चोर हो भ्रष्ट हो उसका नेता तो चोर तथा भ्रष्ट होगा ही ।
गलती नेता का नहीं गलती हमारी है । एक चोर , एक भ्रष्ट तो स्वाभाविक है चोर तथा भ्रष्ट को ही चुनेगा ।
एक लाख गदहा मिलके मैजूरिट से किसी गदहे को ही तो नेता चुनेगा जो स्वाभाविक है । और वो चुना गया नेता भी गदहा ही रहेगा , चुनने के बाद घोड़ा तो कभी नहीं बन सकता ।
इसलिए पहले स्वयं को ठीक करना होगा ।
इमानदारी, नैतिकता, संस्कार , दिव्य गुण किताबों में नहीं मिलता । शब्दों से नहीं होता ।
यह होता है वास्तविक गुरू के बतलाए मार्ग पर चल कर ।
इसलिए दुसरे को चोर तथा भ्रष्ट कहना बंद कर दो, जब तक हमारे तुम्हारे संस्कार में भ्रष्ट बेईमान तथा चोर मन बैठा है दुसरे को चोर मत कहो ।
स्वयं को ठीक करो । भगवान को समझो , वास्तविक संत को ठीक से समझो और खूद को बदलो, वर्णा नरक का द्वार तो खुला है हमारे तुम्हारे लिए । मानव जीवन समाप्त होने के बाद कुत्ते बिल्ली के यौनियो में हमें भेज दिया जाएगा ।
मंदीर में घंटा डोलाना काम नहीं आएगा । और न घंटा डोलाने से भाग्य अच्छा होगा । वल्कि और रसातल में जाओगे ।
भगवान को , संत को मानने कि जगह उनकी मानो , यानि उनके बातों को , उनकी शिक्षा को , उनके सिद्धांतों को अपने जीवन में उतारो , यही पुजा है , यही भक्ति है ।
वर्णा पीपल के पेड़ के निचे अगरबत्ती तथा दीपक जलाने से शनी देव प्रसन्न नहीं होंगे , वो बुरे कर्मों के फल के रूप में और कड़ा दंड देते हैं और न मंदीर में दीपक जलाने से कोई देवता प्रसन्न होंगे । भगवान तथा वास्तविक संत घुसखोर नहीं होते । वो बाहरी आडंबर तथा पाखंड से कभी खुश नहीं होते , वो मन तथा अंत:करण के गंदगी को देखते हैं , जब तक वो शूद्ध नहीं होगा , तब तक राम राम श्याम श्याम भजन किर्तन आदि से कोई लाभ नहीं होगा ।
अपने मन के गंदगी , अपने अंत:करण के गंदगी को , अपनी ग़लती , अपने द्वारा किए गए अनंत जन्मों के पापों को स्वीकार करके जब तक हम भगवान तथा अपने गुरू के प्रति अपने आंतरिक मन से निरंतर शरणागत होकर इसे शूद्ध करने के लिए व्याकुलता के साथ एकांत में इमानदारी की आंसुओ के साथ पुकारेंगे नहीं और आगे कोई भी गलती तथा पाप न करने का शपथ नहीं लेंगे तब तक न भगवान खुश होंगे और न वास्तविक संत , चाहे कितना भी भक्ति , पुजा पाठ , जप तप , उपवास, तिरथ विरथ करते रहो ,कोई फायदा नहीं होगा ।
इस पाखंड से भगवान और अधिक कुपित होते हैं , संत अंदर से दुखी होते हैं अपने अनुयायियों से ।
जब वास्तविक संत चले जाते हैं तो सभी संस्था का पतन देखा गया है इस संसार में , भाषण देने वाला , प्रवचन का व्यापार करने वाला स्वयं अंदर से कैसा है क्या है यह महत्वपूर्ण है । क्योंकि संस्था चलाने वाला मायाबद्ध जीव बचता है संत के जाने के बाद और वो धीरे धीरे जीव को आडंबर , भक्ति का दिखावा, नाटक नौटंकी को संस्था का नया सिद्धांत अपने मन से बना कर पेश करता है । ऐसे चालबाजों से बच कर रहना होगा ।
हम अपने गुरू के अनुयाई हैं , ऐसे चालबाजों के नहीं । अगर डूबना है भवसागर में तो ऐसे निति निर्धारक तथा चाल बाजों से दूर रहो । तथा केवल अपने गुरू के सिद्धांतों पर चलो ।
अगर ऐसा चालबाज हमको तुमको गुरू तथा भगवान के नाम पर डर दिखाने का कोशीश करता है , तो खिसक जाओ वहां से । डरो मत ।
हम अपने गुरू तथा ईष्ट के शरणागत है इनके नहीं ।
हमारे गुरूदेव ने स्वयं जिस शिक्षक यानि प्रचारकों को हमारे लिए नियुक्त किया है , हमें सही दिशा दिखाने के लिए हम उसी शिक्षक का बात मानेंगे । दुसरे किसी अन्य का कभी नहीं चाहे वो भगवान का पुत्र ही क्यों न हो ।
अगर कोई शिक्षक श्री महाराज जी के सिद्धांतों से भटकाता है तो हम उनका भी बात नहीं मानेंगे ।
भगवान तथा वास्तविक संत हमारे तुम्हारे मन के अंदर के दूषित सोच , अहंकार तथा भ्रष्ट बुद्धि के स्थिति को हमसे तुससे अधिक अच्छी तरह से जानते हैं कि हम तुम कितना शुद्ध है ।
जब तक चरित्र नहीं बदलेगा । जब तक संस्कार बढ़िया नहीं होगा , जब तक सोच तथा दृष्टिकोण नहीं अच्छा होगा तब तक दुख रहेगा , डिप्रेशन रहेगा, हर काम में बाधा आएगा । संसारिक सुख भी नसीब नहीं होगा , भगवदिए आनंद तथा सुख पाना तो असंभव ही रहेगा ।
श्री महाराज जी भी यही बातें कहे है संप्रदाय बना कर नाटक करने तथा व्यापार करने वालो के लिए । हमारे गुरू देव श्री महाराज जी भी यही बात कहे है अलग शब्दों में ।
व्यक्ति विशेष में न जाकर इनकी कहीं हुई कटु सच्चाई के एक एक लाईन को अगर ध्यान से सुनें और फिर श्री महाराज जी के बतलाई सिद्धांतों का पालन करें तो लाभ सुनिश्चित है । :- संजीव ।
https://youtu.be/leUj8BZ1kPM?si=6SV_dN2nYXdEx5VT
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