मूल जगद्गुरू के रूप में वही भगवान श्री कृष्ण आए प्राकृत शरीर धारण करके जीव कल्याण हेतु , अपने अनुग्रहित श्रद्धावान मनुष्य का उद्धार करने हेतु । अनेकों जीवों का कल्याण हुआ , वो इस संसार के आवागमन से छुट गए । और आज भी श्रद्धालु जीवो का कल्याण लगातार हो रहा है अंदर ही अंदर । आज भी अपने गुरू के कृपा से अनन्य शिष्यों के आंतरिक स्वरूप में परिवर्तन हो रहा है , अनेकों का अंत:करण शुद्ध हो रहा है तथा लक्ष्य कि प्राप्ति भी गुप्त रूप से निरंतर हो रहा है अंदर ही अंदर , जिसको वो शिष्य हीं समझता है तथा गुरूदेव एवं ईष्ट जानते हैं किसका अंत:करण कितना शुद्ध हुआ है , कितना लाभ हुआ है ? बाहरी मनुष्य भला क्या समझेगा ? वो तो बेचारा स्वयं के हाल के जैसा हीं दुसरे को समझेगा । जैसा उसका चश्मा है, जैसा उसका अंत:करण है वैसा ही उसे दुसरा भी दिखाई देता है । क्या समझेगा बेचारा वो ? ऐसे लोग दया के पात्र हैं ।
इसलिए तुलसीदास ने लिखा है रामचरितमानस में :- " जाकी रही भावना जैसी , प्रभु मुरत देखी तिन तैसी "
अरे भगवान तथा वास्तविक महापुरूष को कोई जीव उनके कृपा के बिना कैसे समझ सकता है भला , बेचारे कृपा का पात्र ही नहीं है ?
राम कृपा बिनु सुनु खगराई। जानि न जाइ राम प्रभुताई।।
जानें बिनु न होइ परतीती। बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती।।
प्रीति बिना नहिं भगति दिढ़ाई। जिमि खगपति जल कै चिकनाई।।
जब भगवान गुरू बन कर आए तो उस समय भी बहुत श्रद्धालु भावुक जीव उनको भगवान माना , तत्वदर्शी उस परमतत्व को पहचाना , उनके प्राकृत शरीर के अंदर छुपे दिव्य स्वरूप को देखा , पहचाना और खुले दिल से घोषणा कि ए मनुष्यों ये साक्षात भगवान है धरती पर गुरू रूप में आएं हैं , जो जो जीव अपना कल्याण चाहते हो वो इनको अपना गुरू मानकर इनका दर्शन , सेवा तथा भक्ति कर सकते हैं तथा इनके बतलाए मार्ग का अनुसरण करके भगवान के लोक परम धाम प्राप्त करके इस संसार के आवागमन से मुक्त हो सकते हैं, अपना परम कल्याण कर सकते हो ।
लेकिन जो मनुष्य अपने क्षूद्र ज्ञान के पराकाष्ठा पर थे और आज भी है वो सभी उनको साधारण मनुष्य ही समझा । आज भी ऐसे क्षूद्र मनुष्यों कि कमी नहीं है इस संसार में , वल्कि ऐसे नीच लोगों कि संख्या अधिक है आजकल ।
तुलसीदास जी ने ऐसे लोगो के लिए कहा है :-
"जो न तरै भव सागर नर समाज अस पाइ।
सो कृतघ्न मंदमति आत्माहन गति जाइ॥"
तुलसीदास जी के इस चौपाई का भावार्थ इस प्रकार है :- वे कहते है कि ऐसे क्षूद्र लोगों को उसके हाल पर छोड़ देना हीं उत्तम है , ऐसे श्रद्धाहीन लोगों का मुंह कभी नहीं लगना चाहिए और न ऐसे जीवों के साथ बहस करना चाहिए कभी । ऐसे अधम दुराचारी आत्महंता जीव के किसी भी बात का कोई उत्तर कभी नहीं देना चाहिए। और सबसे विशेष बात कि ऐसे बेचारे लोगों के साथ न कोई दुर्भावना रखना चाहिए और न राग , न द्वेष। ऐसे लोगो से विल्कूल उदासीन रहना चाहिए ।
हमारे ईष्ट भगवान श्री कृष्ण ने गीता के चौथे अध्याय के चालिसवे श्लोक में स्पष्ट कहा :-
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः।।4.40।। गीता ।
इस श्लोक का भावार्थ इस प्रकार है :-
इस संसार में तीन प्रकार का मनुष्य है , एक वो जो अज्ञ है यानि महान मुर्ख है, चपाट है ,नास्तिक है जो भगवान उगवान नहीं मानता , वो स्वयं को ही भगवान मानता है ।
दुसरा वो जो किसी तत्वदर्शी के द्वारा बताए जाने पर भी , सब सुनने समझने के बाद भी श्रद्धाहीन है, अविश्वासी है ।उसका मन मानने के लिए तैयार नहीं ।
तीसरा वो जो तत्वज्ञान सुनने समझने के बाबजूद कभी तो मानता है पर कभी नहीं मानता , उपर के दो प्रकार के लोगों के बातों में आकर , प्रभाव में आकर उसका विश्वास डगमगाते रहता है , ऐसे लोगों का ढुलमुल रवैया होता है , विल्कूल शंकालु प्रवृति ।
तो इस तीनों प्रकार के मनुष्य के बारे में भगवान कहते हैं इसी श्लोक के दुसरे पंक्ति में कि ऐसे संशयात्मा को न तो इस लोक यानि इस संसार में कभी सुख और आनंद नसीब हो सकता है और न कभी परलोक में । यानि स्वर्ग के सुख कि तो ऐसा नीच मनुष्य , शंकालु मनुष्य कल्पना भी नहीं कर सकता है । तो ऐसे जीवों का क्या हर्ष होता है ? तो ऐसे मनुष्य का पतन हो जाता है करोड़ो कल्पों तक के लिए , और पतन भी ऐसा वैसा नहीं ! ऐसे मनुष्य को अगले अरबों जन्म तक तिर्यक योनियों यानि कुत्ता बिल्ली , नाली का कीड़ा मकोड़ा आदि योनियों में भगवान के द्वारा भेज दिया जाता है । यह भगवान श्री कृष्ण द्वारा गीता में इस श्लोक के माध्यम से खुल्लमखुल्ला उद्घोष है । श्री राधे :- संजीव कुमार।
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