Saturday, 30 December 2023

भगवान के कृपा के बिना कोई उनको जान नहीं सकता ।

राम अतर्क्य बुद्धि मन बानी। मत हमार अस सुनहि सयानी॥
तदपि संत मुनि बेद पुराना। जस कछु कहहिं स्वमति अनुमाना॥2॥

राम सरूप तुम्हार, वचन अगोचर बुद्धि पर। 
अविगत अकथ अपार, नेति-नेति नित निगम कह॥126।।

सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥
तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन॥2॥

भगवान शंकर कह रहे हैं :- हे राम आपको कोई भी अपनी मन, बुद्धि, ज्ञान बल से नही जान सकता , बड़े बड़े ऋषि मुनि आपको नहीं जान पाए , स्वयं मैं , ब्रह्मा और विष्णु भी अपने बल से आपको नहीं जान पाए ! केवल अनुमान लगाते हैं आपके स्वरूप के बारे में और अपने ही अनुमान के आधार पर बड़े बड़े ऋषि महर्षि यहां तक कि वेद पुराण आपका बखान करते हैं । 

हे राम ! आपका स्वरूप मन बुद्धि वाणी से परे है। इसलिए आपके स्वरूप को न कोई जान पाया है, न बखान कर सकता है, न उसका पार ही पा सकता है। इसलिए वेद सदा 'नेति-नेति' कहकर आपका वर्णन करते हैं। हे राम आपको कोई भी जीव किसी भी साधन से नहीं जान सकता है ।
हे राम लेकिन वो भाग्यशाली जीव आपको जान सकता है, जिसे आप स्वयं अपने अहेतु कि कृपा से जना देते हैं , फिर वो आपको जानते ही आपका ही बन जाता है सदा के लिए, आपके स्वरूप शक्ति से परिपूर्ण हो जाता है । हे रघुनंदन! हे भक्तों के हृदय को शीतल करने वाले चंदन! आपकी ही कृपा से जीव आपको जान पाते हैं॥ :- श्री महाराज जी ।।

Friday, 29 December 2023

प्रश्न :- भगवान श्री कृष्ण अपने भक्त का संसार क्यों छीन लेते हैं ? संसार छीन जाना भगवान का कृपा तथा संसार का मिलना भगवान का कोप क्यों कहा गया है ? अधिकतर लोग श्री कृष्ण की भक्ति नहीं करके अन्यान्य देवी देवता की भक्ति क्यों करते हैं ?

प्रश्न :- भगवान श्री कृष्ण अपने भक्त का संसार क्यों छीन लेते हैं ? संसार छीन जाना भगवान का कृपा तथा संसार का मिलना भगवान का कोप क्यों कहा गया है ? अधिकतर लोग श्री कृष्ण की भक्ति नहीं करके अन्यान्य देवी देवता की भक्ति क्यों करते हैं ? 

उत्तर - उत्तर श्री कृष्ण के द्वारा ही दिया गया है भगवद् पुराण में , प्रस्तुत है उनकी वाणी :- 
श्री कृष्ण उवाच:- 
यस्याहमनुगृह्णामि हरिष्ये तद्धनं शनैः । 
ततोऽधनं त्यजन्त्यस्य स्वजना दुःखदुःखितम् ॥ 
तं भ्रंशयामि सम्पद्भ्यो यस्य चेच्छाम्यनुग्रहम्।।
स यदा वितथोद्योगो निर्विण्णः स्याद्धनेहया । 
मत्परैः कृतमैत्रस्य करिष्ये मदनुग्रहम् ॥ 
तद्ब्रह्म परमं सूक्ष्मं चिन्मात्रं सदनन्तकम् ।
विज्ञायात्मतया धीरः संसारात्परिमुच्यते ॥ 
अतो मां सुदुराराध्यं हित्वान्यान् भजते जनः ।

 (श्रीमद्भागवतपुराण)

भावार्थ:- भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं जिस पर मैं कृपा करता हूँ, उसका संसारिक ऐश्वर्य, धन आदि धीरे-धीरे छीन लेता हूँ , सभी भौतिक संपत्तियों से बंचित कर देता हूं ,जब मैं मेरी भक्ति साधना करने वाले जीव के माया के ग्रंथि को काटता हुं तो शुरू शुरू में वो बेचैन होने लगता है, घबड़ाने लगता है  और संसार कि प्राप्ति के लिए फिर से प्रयास करने लगता है लेकिन मैं उसके हरेक प्रयास को विफल कर देता हुं , इस प्रकार अंत में वो निराश हो जाता है संसार से और फिर संसार से वो सदा के लिए विरक्त हो जाता है । जीव जब संसारिक ऐश्वर्य से तथा संसारिक भोग विलास में लिप्त अपने परिजन से आसक्ति रहित हो जाता है , तब संसार के लोग यहां तक कि उसके सगे-सम्बन्धी उसका पीछा छोड़ देते हैं ।
 इस प्रकार वो जीव मेरी भक्ति में और अधिक रस लेने लगता है , वो संसारिक धन तथा ऐश्वर्य की कामना को त्याग देता है मेरी प्रेरणा से । वो समझ जाता है कि संसार के प्रत्येक बिषय बस्तुओं तथा व्यक्ति से लगाव , आसक्ति , अटैचमेंट हीं समस्त दुखों का मूल कारण है , फिर उसे दुःख समझ कर वो उधर से अपना मुँह मोड़ लेता है और फिर मेरे प्रेमी भक्तों का, यानि भगवद् प्राप्त संतों का आश्रय लेकर उनका संग बढ़ा देता है , मेरे जनों का संग करना उसे अच्छा लगने लगता है , तब मैं उस पर अपनी अहेतु की कृपा करता हूं ।

 फिर मेरे कृपा से मेरे जन यानि मेरे संत उसको मेरा प्रेम दान कर देते हैं , प्रेम दान मिलते ही वो मुझे प्राप्त कर लेता है , मुझे प्राप्त करके सदा के लिए मेरे बनाए जेलखाना के चौरासी लाख योनियों के बंधन से मुक्त होकर मेरे लोक में सदा के लिए मेरे साथ निवास करता है और मेरे स्वरूप शक्ति से युक्त होकर मेरे हीं समान दिव्य शक्तियों का स्वामी बन जाता है एवं सदा के लिए आनंदमय हो जाता है । 

लेकिन जो जीव इस संसारिक धन से अटैचमेंट रखता है, संसारिक बिषय बस्तुओं की कामना लेकर मेरी भक्ति करता है वो मेरा भक्त नहीं है , वो मेरे दिव्य प्रेम का अधिकारी नहीं हो सकता । 

मेरे दिव्य प्रेम , दिव्य संपत्ति, दिव्य एश्वर्य, दिव्य ज्ञान कि प्राप्ति के लिए जीव का लगाव , अटैचमेंट संसार से समाप्त होना आवश्यक है । इसलिए मैं उसका संसार छीन लेता हुं , उसे योग भ्रष्ट कर देता हूं , उसे एश्वर्य रहित कर देता हूं , यह मेरी सबसे बड़ी कृपा है और संसार का मिलना मेरा सबसे बड़ा कोप है । 

 इस प्रकार मेरी प्रसन्नता, मेरी आराधना, मेरी भक्ति बहुत कठिन है, साहसी लोग, निडर लोग , बुद्धिमान लोग मेरी भक्ति करते हैं । साधारण लोग, भयभीत लोग , कायर लोग , संसार में हीं आसक्त होते हैं और संसारिक भोग बिलास की हीं कामना रखते हैं । संसारिक भोग बिलास में लिप्त लोग मुझे प्राप्त नहीं कर सकते, मेरी भक्ति नहीं कर सकते । वो संसार कि प्राप्ति के लिए लालायित रहते हैं और मायाजनित दुख भोगते रहते हैं ।

 अत: ऐसे भोगी बिलासी कामी लोग मुझे छोड़कर अन्यान्य मायाधिनस्वर्ग के मायाधिन देवी देवताओं की आराधना करते रहते हैं , और संसार पाकर दुख के दलदल में और भी फंसे रहते हैं तथा त्रिगुण , त्रिताप ( आध्यात्मिक ताप , भौतिक ताप तथा दैविक ताप) , त्रिकर्म , त्रिदोष , पंचक्लेश आदि से पीड़ित होकर मेरे ही बनाए चौरासी लाख योनियों में चक्कर लगाते रहते हैं मेरी दासी माया का झापड़ खाते रहते हैं । :- श्री कृष्ण का कथन श्री मद्भागवत महा पुराण के दशम स्कंध के श्लोक का भावार्थ । 
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जब संसार में भी प्रधान मंत्री बनने से पहले उसको चीफ मिनिस्टर के पद का त्याग करना पड़ता है , राष्ट्रपति बनने के लिए प्रधानमंत्री के पद का या अन्य पद एश्वर्य आदि को त्यागना पड़ता है । 
तो भगवान के लोक में दिव्य प्रेम , दिव्य पद् दिव्य एश्वर्य की प्राप्ति के लिए संसारिक पद् प्रतिष्ठा, मान सम्मान धन जन से छुटकारा तो आवश्यक है । 
कहां दिव्य लोक में दिव्य प्रेम और आनंद और कहां संसार का दुख युक्त इन्द्रियादिक सुख ? दोनों विरोधी बस्तुए है दोनों विरोधी बस्तुए एक साथ नहीं मिल सकती है । अत: भगवान के दिव्य प्रेम की प्राप्ति के लिय भगवान कि दासी माया की संपत्ति से त्याग पत्र तो देना ही होगा । जो लोग संसार नहीं छोड़ना चाहते हैं भगवान उसे और भी संसार देकर दु:ख में उलझा देते हैं ताकि वो दुख पाकर संसार अनासक्त होने लिए तैयार हो जाए । 
इसलिए भगवान जिस पर अपनी अहैतु कि कृपा करते हैं उसका संसार पहले छीन लेते हैं ताकि वो दुख से सदा के लिए मुक्त होकर आनंद मय हो जाए । 
अत: संसार का मिलना भगवान का कृपा नहीं कोप कहा गया है और भक्ति के दौरान जब संसार छीनने लगे , संसार से आसक्ति मिटने लगे, तो इसे हरि गुरू की कृपा समझना चाहिए। यह इंडिकेशन है कृपा का । श्री राधे । :- संजीव कुमार।

Thursday, 28 December 2023

मन माया का पुत्र है और जीवात्मा भगवान का नित्य दास, नित्य अंश है । लेकिन अनादि काल से जीवात्मा अपने अंशी भगवान का शरणागति नहीं करके भगवान की दासी माया के पुत्र मन का गुलाम है इसलिए अनादि काल से माया की हीं शरणागति कर रहा तथा संसारिक बस्तुओं कि प्राप्ति के लिए ही संघर्षरत है ।

मन माया का पुत्र है और जीवात्मा भगवान का नित्य दास, नित्य अंश है । लेकिन अनादि काल से जीवात्मा अपने अंशी भगवान का शरणागति नहीं करके भगवान की दासी माया के पुत्र मन का गुलाम है इसलिए अनादि काल से माया की हीं शरणागति कर रहा तथा संसारिक बस्तुओं कि प्राप्ति के लिए ही संघर्षरत है । 
अत: मन के गुलाम जीवात्मा को यानि मन की शरणागति करने वाले को , दुसरे शब्दों में भगवान कि दासता के जगह पर माया के पुत्र मन का गुलामी करने वाले को भगवान नहीं मिलते । 

हरि गुरू के शरणागत जीव को भगवान मिलते हैं । सजातीय होने के कारण माया के पुत्र मन को माया कि हीं गुलामी भाती है । इसलिए मन बार-बार संसार में हीं भागता है । मन का गुलाम जीवात्मा हरि और गुरू का शरणागत नहीं हो सकता । 

शास्त्रीय सिद्धांत कहता है कि हम जिसकी शरणागति करेंगे , स्वाभाविक है हमें उसी कि संपत्ति तथा गुण मिलेंगे । अत: माया के गुलाम जीवात्मा को , माया के भक्त जीव को माया कि हीं संपत्ति तथा गुण मिलता है । माया का गुण है संसार के बिषय बस्तुओं से राग-द्वेष, काम क्रोध घृणा आदि और परिणाम में अल्पकालिक क्षणभंगुर इन्द्रियादिक सुख तथा अंततः दुख एवं चौड़ासी लाख योनियों में भटकने का पीड़ा । 

भगवान कि संपत्ति है दैविक गुण और परिणाम में चौड़ासी लाख के चक्कर से सदा के लिए छुटकारा तथा अनंत काल एवं अनंत मात्रा का सुख और आनंद । 
भगवान की संपत्ति पाने के लिए , भगवान को पाना होगा ।
और भगवान को पाने के लिए हमे मन की गुलामी छोड़ कर मन से हरि और गुरू की पूर्ण शरणागती करनी होगी । दुसरा कोई उपाय नहीं है । :- श्री महाराज जी द्वारा दिया गया तत्वज्ञान पूज्यनीयां रासेश्वरी देवी जी के शब्दों में ।

Wednesday, 27 December 2023

मन का मालिक या मन का गुलाम है हम ?

संसार में लोग बड़े शान से कहते हैं - मैं अपने मन का मालिक हूं ! सुनो सबकी करो अपने मन की , मैं अपने मर्जी का मालिक हूं , मेरा मन जो कहता है वहीं मैं करता हूं आदि आदि । 
अरे आपको तो कहना चाहिए मैं अपने मन का बड़ा भारी गुलाम हूं , मर्जी का गुलाम हूं , संसारिक बिषय भोग और कामनाओं का गुलाम हूं, मेरा मन जैसे जैसे नचाता है वैसे वैसे मैं नाचता हूं । 

 यदि अपने मन का मालिक होते, तो हम महापुरूष होते! मन को अपने इशारों पर नचाते , नाचते नहीं मन के इशारों पर । 

यही मन तो अनंतानंत जन्म बर्बाद कर दिया और अभी भी हम अपने इसी मन का गुलामी कर रहे है ? 

शास्त्र कहता है :- 
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः|
बन्धाय विषयासंगो मुक्त्यै निर्विषयं मनः || :- ब्रह्मबिंदूउपनिषद ।

“मन ही मनुष्य के बन्धन और मोक्ष का कारण है | इन्द्रियादिक विषयों में रत्त मन चौरासी लाख योनियों में आवागमन का कारण है और विषयों से विरक्त मन मोक्ष का भी कारण है |” मन ही हमें महान बना सकता है , महापुरूष बना सकता है और यही मन हमें राक्षस भी बना देता है । 
:- पूज्यनीयां रासेश्वरी देवी जी ।

मानव देह का महत्व :- संसार का प्रत्येक जीव कर्मशील दिखाई देता है |

मानव देह का महत्व :- संसार का प्रत्येक जीव कर्मशील दिखाई देता है | पशु - पक्षी , कीट- पतंग सभी तो कर्म करते हैं | यहाँ तक कि स्वर्ग के देवता भी कर्म करते हैं | किंतु इनमें से किसी का भी कर्म स्वतंत्र नहीं है | या यूँ कह लीजिए की उनका कर्म परतंत्र है | वो पुरुषार्थ द्वारा ऐसा कर्म नही कर सकते , जिससे वे अपने अनंत जन्मों के संचित कर्म को भस्म कर दें और भविष्य के अनंत काल को बना लें | 
चूँकि यह कमाई नाम की चीज़ , पुरुषार्थ नाम का तत्व उनके साथ नहीं रह सकता , इसलिए ये सब भोग योनि के अंतर्गत आते हैं | 

आइए , अब हम मानव योनि पर विचार करें | मानव योनि ही एक ऐसी योनि है , जिसमें आकर हम वास्तव में कर्म कर सकते है | 
मानव देह बड़ा कमाल का है | एकमात्र मानव देहधारी जीव ही यह शक्ति रखता है कि वह जिस जीव से चाहे अपने अनुरुप कर्म करवा ले , उनको गुलाम बना ले | उनके द्वारा अपनी सेवा ले | 

पशु-पक्षी , कीट-पतंग , अथवा देवता सभी आनंद चाहते हैं , लेकिन चौरासी लाख योनियों मे यह शक्ति सिर्फ मानव को ही प्राप्त है कि वह अपने सुख के लिए अन्य चेतन जीवों को गुलाम बना ले , अपना दास बना ले | इन चेतन जीवों के नीचे आते हैं स्थावर , चर , अचर | 
अब बृक्ष को ही लीजिए, इनको भोग्य बनाते हैं ये चेतन जीव ! गाय-भैंस को हमने देखा है घास चरते या पेंड़ के पत्तों को खाते हुए | 
इधर मानव ने इन चेतन एवं स्थावर दोनों को ही अपना भोग्य बनाया है | 

इस प्रकार जड़-चेतन दोनों को मनुष्य ने दास बनाया है | अब आप सोच रहे होंगें कि देवता तो मनुष्य के दास नही हैं ! हाँ , देवता भी मनुष्य के दास बनते हैं | आप सिद्धि कर लें , तो देवता भी आपकी गुलामी करेंगें | आपने इतिहास - पुराण में पढ़ा होगा कि अनेकानेक लोगों ने देवताओं की सिद्धि की थी | रावणादिकों के यहाँ यमराज आदि देवतागण नौकर - चाकर थे |
यह सब सुनकर आप विस्मित हो रहे होंगें , किंतु विस्मय की कोई बात नहीं है क्योंकि इस मानव योनि का ऐसा कमाल ही है कि स्वयं भगवान इसके दास बन जाते हैं , फिर इन देवताओं की क्या गिनती ! 

अहं भक्तपराधीनो ह्मस्वतन्त्र इव द्विज | 

भगवान कहते हैं - मैं तो परतंत्र हूँ , भक्तो का दास हूँ | भक्तों ने मेरा ह्रदय खा लिया है | मुझको क्रीतदास बना लिया है , खरीदा हुआ गुलाम बना लिया है | 

हाँ यह बात अलग है कि यह कमाल तभी हो सकता है , जब हमारा पुरुषार्थ पूर्ण शरणागति का हो | हमारी शरणगति , हमारे प्रेम से बँधकर ऐसे सर्वतंत्र स्वतंत्र परात्पर सर्वशक्तिमान भगवान परतंत्र बन जाते हैं | सिर्फ परतंत्र ही नहीं नित्य परतंत्र बन जाते है |
अब तो भक्त ही ईश्वर से कहता है - 
ह्रदय ते जब जाओगे मर्द बदौंगो तोय | 

आपके मस्तिष्क में यह बात अवश्य आ रही होगी कि हमें तो यह सौभाग्य प्राप्त नही हुआ |
अब यह भी कोई बात है ! बिना उधम के भला कुछ प्राप्त होता है !! बिना प्रयास के कभी किसी को कुछ मिला है ? जब आपने भगवत्प्राप्ति के लिए उधम ही नही किया है , तो आपकी बात कैसे बन सकती है ? 
यह तो आपकी कमी है | अगर कोई कमर कस ले कि हम भगवत्प्राप्ति करके रहेंगें तो उसे भला उसे कौन रोक सकता है | भगवान तो भुजाएँ पसारे सदा ही तैयार है हमें अपनाने को | वो तो तैयार वैठे है अपने भक्तों के प्रेमाधीन हो जाने को , उनके हाथ बिक जाने को , उनकी दासता करने को | कर्म करने में स्वतंत्र मानव को कर्म करने की यह स्वतंत्रता उसे विशेषाधिकार के रुप में प्राप्त हुई है | 
:- श्री महाराज जी ( प्रवचन , वृन्दावन )

Monday, 25 December 2023

॥ वैराग्य शतकम् भर्तृहरिविरचितम् ॥बोद्धारो मत्सरग्रस्ताः प्रभवः स्मयदूषिताः। अबोधोपहताश्चान्ये जीर्णमंगे सुभाषितम्।। २ ।।

यह भीतर से वैरागी भक्त राजा भर्तृतिहरि जी का यह कथन मुझे बडा़ पसंद है :- 
वैराग्य शतकम् 
॥ वैराग्य शतकम् भर्तृहरिविरचितम् ॥

बोद्धारो मत्सरग्रस्ताः प्रभवः स्मयदूषिताः। 
अबोधोपहताश्चान्ये जीर्णमंगे सुभाषितम्।। २ ।।
अर्थ:
जो विद्वान् हैं, वे इर्षा से भरे हुए हैं; जो धनवान हैं, उनको उनके धन का गर्व है; इनके सिवा जो और लोग हैं, वे अज्ञानी हैं, वो अज्ञानता को ही ज्ञान समझ बैठे हैं और दुखी हैं । इसलिए विद्वत्तापूर्ण विचार, सुन्दर सुन्दर सारगर्भित निबन्ध या उत्तम काव्य शरीर में ही नाश हो जाते हैं ।

जो विद्वान् हैं, पण्डित हैं, जिन्हें अच्छे बुरे का ज्ञान या तमीज है, वे तो अपनी विद्वता के अभिमान से मतवाले हो रहे हैं, वे दूसरों के उत्तम से उत्तम कामों में छिद्रान्वेषण करने या नुक्ताचीनी करने में ही अपना पांडित्य समझते हैं; अतः ऐसो को कुछ कहने में लाभ की जरा भी सम्भावना नहीं ।
दुसरे प्रकार के लोग जो धनी हैं, वे अपने धन के गर्व से भूले हुए हैं भगवान को । उन्हें धन-मद के कारण कुछ सूझता ही नहीं, उन्हें किसी से बातें करना या किसी की सुनना ही पसन्द नहीं; अतः उनसे भी कुछ लाभ नहीं ।
अब रहे तीसरे प्रकार के लोग; वे नितान्त मूर्ख या अज्ञानी हैं; उन गँवारों में अच्छे बुरे की तमीज नहीं, अतः उनसे कुछ कहने या अपनी कृति दिखाने सुनाने को दिल नहीं चाहता; इसलिए हमारे मुंह से निकल सकने वाले उत्तमोत्तम विचार, निबन्ध, काव्य या सुभाषित, संसार के सामने न आकर, हमारे शरीर में ही नष्ट हुए जाते हैं । हमारा परिश्रम व्यर्थ जाता है और संसार हमारे कामों के देखने और लाभान्वित होने से वञ्चित रहता है ।

जो तुम्हारी तरफ मुखातिब हों, तुम्हारी बातों पर कान दे, तुम्हारी बातों को ध्यान से सुने, उन्ही को अपनी बातें सुनाओ । जो तुम्हारी बातें सुनना न चाहें, उनके गले मत पड़ो । ऐसा करने से आपकी आत्म-प्रतिष्ठा में बट्टा लगेगा – आपका अपमान होगा , अशांति होगी ।

पण्डित मत्सरता भरे, भूप भरे अभिमान ।
और जीव या जगत के, मूरख महाअजान ।।
मूरख महाअजान, देख के संकट सहिये ।
छन्द प्रबन्ध कवित्त, काव्यरस कासों कहिये ।।
वृद्धा भई मनमांहि, मधुर बाणी मुखमण्डित ।
अपने मन को मार, मौन घर बैठत पण्डित ।।

न संसारोत्पन्नं चरितमनुपश्यामि कुशलं विपाकः पुण्यानां जनयति भयं मे विमृशतः । 
महद्भिः पुण्यौघैश्चिरपरिगृहीताश्च विषया महान्तो जायन्ते व्यसनमिव दातुं विषयिणाम् ।। ३ ।।
अर्थ:
मुझे संसारी कामों में जरा सुख नहीं दीखता । मेरी राय में तो पुण्यफल भी भयदायक ही हैं । इसके सिवा, बहुत से अच्छे अच्छे पुण्यकर्म करने से जो विषय-सुख के सामान प्राप्त किये और चिरकाल तक भोगे गए हैं, वे भी विषय सुख चाहनेवालो का, अन्त समय में दुखों के ही कारण होते हैं ।

इस जीवन में सुख का लेश भी नहीं है । जिनके पास अक्षय लक्ष्मी, धन-दौलत, गाडी-घोड़े, मोटर, नौकर-चाकर, रथ-पालकी प्रभृति सभी सुख के सामान मौजूद हैं, राजा भी जिनकी बात को टाल नहीं सकता, जिनके इशारों से ही लोगों का भला बुरा हो सकता है, ऐसे सर्वसुख संपन्न लोग भी, चाहे ऊपर से सुखी दीखते हों, पर वास्तव में सुखी नहीं हैं; भीतर ही भीतर उन्हें घुन खाये जाता है; किसी न किसी दुःख से वे जरजरित हुए जाते हैं । 

अगर मनुष्य दुखों से दूर रहना चाहे, सदा सुख भोगना चाहे, तो उसे अनित्य और नाशमान पदार्थों से अलग रहना चाहिए । उनमें मोह न रखना चाहिए । बुद्धिमान को लोक-परलोक की असारता और संयोग-वियोग का विचार करके अनित्य पदार्थो से प्रेम न करना चाहिए उसे सदा नित्य अविनाशी परमात्मा से प्रेम करना चाहिए ।

उत्खातं निधिशंकया क्षितितलं ध्माता गिरेर्धातवो 
निस्तीर्णः सरितां पतिर्नृपतयो यत्नेन संतोषिताः ।
मन्त्राराधनतत्परेण मनसा नीताः श्मशाने निशाः 
प्राप्तः काणवराटको‌ऽपि न मया तृष्णेऽधुना मुञ्चमाम् ।। ४ ।।

अर्थ:
धन मिलने की उम्मीद से मैंने जमीन के पैंदे तक खोद डाले; अनेक प्रकार की पर्वतीय धातुएं फूंक डाली; मोतियों के लिए समुद्र की भी थाह ले आया; राजाओं को भी राजी रखने में कोई बात उठा न राखी; मन्त्रसिद्धि के लिए रात रात भर श्मसान एकाग्रचित्त से बैठा हुआ जप करता रहा; पर अफ़सोस की बात है, कि इतनी आफ़ते उठाने पर भी एक कानि कौड़ी न मिली । इसलिए हे तृष्णे ! अब तो तू मेरा पीछा छोड़ ।

इसका यही मतलब है कि, भाग्य के विरुद्ध चेष्टा करना व्यर्थ है । जितना धन भाग्य में लिखा है, उतना तो बिना कोशिश किये, बिना किसी कि खुशामद किये, बिना देश-विदेश डोले, घर बैठे ही मिल जाएगा, सुअवसर स्वयं दरवाजा खटखटा के आपको व्यापार देगा , नौकरी देगा या किसी बहाने धन देगा हीं , पुर्व जन्मों के भगवान के निमित्त आपका दान किया हुआ कई गुणा आपको मिलेगा , । नहीं तो भाग्य के लिखे से अधिक हजारों चेष्टाएं करने पर भी न मिलेगा , अगर गलत करके कुछ कमा भी लिया तो वो छिन जाएगा , लुट जाएगा , रोग शोक में समाप्त हो जाएगा , घाटा लगेगा नुकसान हो जाएगा । 

सिकंदर अमृत के लिए अँधेरी दुनिया में गया; पर अमूर्त के कुण्ड के पास पहुँच जाने पर भी, वह अमृत को चख न सका; क्योंकि उसके भाग्य में अमृत न था । मूर्ख मनुष्य भाग्य पर सन्तोष नहीं करता; धन के लिए मारा मारा फिरता है । जब कुछ भी हाथ नहीं लगता, तब रोता और कलपता है । 

भ्रान्तं देशमनेकदुर्गविषम् प्राप्तं न किञ्चित्फलम् 
त्यक्त्वा जातिकुलाभिमानमुचितं सेवा कृता निष्फला ।
भुक्तं मानविवर्जितम परगृहेष्वाशङ्कया काकव- 
त्तृष्णे दुर्मतिपापकर्मनिरते नाद्यापि संतुष्यसि ।। ५ ।।

अर्थ:
मैं अनेक कठिन और दुर्गम स्थानों में डोलता फिरा, पर कुछ भी नतीजा न निकला । मैंने अपनी जाति और कुल का अभिमान त्यागकर, पराई चाकरी भी की; पर उससे भी कुछ न मिला । शेष में, मैं कव्वे की तरह डरता हुआ और अपमान सहता हुआ पराये घरों के टुकड़े भी खाता फिरा । हे पाप-कर्म करने वाली और कुमतिदायिनी तृष्णे ! क्या तुझे इतने पर भी सन्तोष नहीं हुआ ?

खलोल्लापाः सोढाः कथमपि तदाराधनपरै:
निगृह्यान्तर्वास्यं हसितमपिशून्येन मनसा ।
कृतश्चित्तस्तम्भः प्रहसितधियामञ्जलिरपि
त्वमाशे मोघाशे किमपरमतो नर्त्तयसि माम् ।। ६ ।।

अर्थ:
मैंने दुष्टों की सेवा करते हुए उनकी तानेजानि और ठट्ठेबाज़ी सही, भीतर से, दुःख से आये हुए आंसू रोके और उद्विग्न चित्त से उनके सामने हँसता रहा । उन हंसने वालों के सामने, चित्त को स्थिर करके, हाथ भी जोड़े । हे झूठी आशा ! क्या अभी और भी नाच नचाएगी ?

आदित्यस्य गतागतैरहरहः संक्षीयते जीवितम् 
व्यापारैर्बहुकार्यभारगुरुभिः कालो न विज्ञायते । 
दृष्ट्वा जन्मजराविपत्तिमरणं त्रासश्च नोत्पद्यते 
पीत्वा मोहमयीं प्रमादमदिरामुन्मत्तभूतं जगत् ।। ७ ।।

अर्थ:
सूर्य के उदय और अस्त के साथ मनुष्यों की ज़िन्दगी रोज़ घटती जाती है । समय भागा जाता है, पर कारोबार में मशगूल रहने के कारण वह भागता हुआ नहीं दीखता । लोगों को पैदा होते, बूढ़े होते, विपत्ति ग्रसित होते और मरते देखकर भी उनमें भय नहीं होता । इससे मालूम होता है कि मोहमाया, प्रमादरूपी मदिरा के नशे में संसार मतवाला हो रहा है ।

किसी ने खूब कहा है :
सुबह होती है शाम होती है ।
योंही उम्र तमाम होती है ।।

विचारकर देखने से बड़ा विस्मय होता है कि दिन और रात कैसे तेजी से चले जाते हैं । जिनको कोई काम नहीं है अथवा दुखिया है, उन्हें तो ये बड़े भारी मालूम होते हैं, काटे नहीं कटते, एक एक क्षण, एक एक वर्ष की तरह बीतता है; पर जो कारोबार या नौकरी में लगे हुए हैं, उनका समय हवा से भी अधिक तेजी से उड़ा चला जा रहा है, यानी कारोबार या धंधे में लगे रहने के कारण उन्हें मालूम नहीं होता । वे अपने कामों में भूले रहते हैं और मृत्युकाल तेजी से नजदीक आता जाता है ।

इसलिए भज् गोविंदम ,भज् गोविंदम ,भज् गोविंदम मूढ़मते ।

अभी से भजन करले भक्ति करले बन्दे । नहीं तो तब पछताए क्या होत है जब चिड़ियां चुग गई खेत् 

🙏❤️🙏

श्री राधे । 🙏❤️🙏

अभी से भजन करले भक्ति करले बन्दे । नहीं तो तब पछताए क्या होत है जब चिड़ियां चुग गई खेत्

अरे भक्ति तो बुढ़ापे का चीज है, अभी क्या है अभी तो हमारी उम्र हीं क्या है, न न ऐसे भ्रम में मत परो , मौत कब आ जाए किसको पता, दुसरा बुढ़ापे में परिवार और भी बड़ा होगा, आज तुम्हारा संसार छोटा है सिर्फ अपने बेटा, बेटी, पति, पत्नी, मां-बाप तक हीं मोह सिमित है, कल और नाती पोते होंगे उनके साथ अटैचमेंट बढ़ेगा फिर तुम उनमें आसक्त हो जाओगे, तुम्हारा पतन हो जाएगा । :- श्री महाराज जी ।🙏❤️🙏

वैराग्य शतकम से -
एक दुखित बूढ़ा सेठ
————————–
एक वैश्य ने उम्र भर मर-पचकर खूब धन जमा किया । बुढ़ापे में पुत्रों ने सारे धन पर अधिकार कर बूढ़े को पौली में एक टूटी सी खाट और फटी सी गुदड़ी पर डाल दिया और कुत्ता मारने के लिए हाथ में लकड़ी दे दी । सुबह शाम घर का कोई आदमी बचा-खुचा, बासी-कूसी उसे खाने को दे जाता । सेठ बड़े दुःख से अपना जीवन जीता था । पुत्र-वधुएं दिन भर कहा करती थी – “यह मर नहीं जाते, सबको मौत आती है पर इनको नहीं आती। दिन भर पौली में थूक-थूक कर मैला करते हैं ।” एक दिन एक पोता उन्हें पीट रहा था । इतने में नारद जी आ निकले उन्होंने सारा हाल देखकर कहा – “सेठजी ! आप बड़े दुखी हैं । स्वर्ग में कुछ आदमियों की आवश्यकता है । अगर तुम चलो तो हम ले चलें ।” सुनते ही सेठ ने कहा – “जा रे वैरागीड़ा ! मेरे बेटे पोते मुझे मारते हैं चाहे गाली देते हैं, तुझे क्या ? तू क्या हमारा पञ्च है ? मैं इन्हीं में सुखी हूँ । मुझे स्वर्ग की आवश्यकता नहीं ।” सेठ की बातें सुनकर नारद जी को बड़ा आश्चर्य हुआ । कहने लगे – “ओह ! संसार सचमुच ही मोह-पाश में फंसा है । मोह की मदिरा के मारे इसे होश नहीं । मनुष्य ने कब्र में पैर लटका रखे हैं; फिर भी विषयों में ही उसका मन लगा है ।

गतं तत्तारुण्यं तरुणिहृदयानन्दजनकं 
विशीर्णा दन्तालिर्निजगतिरहो यैष्टिशरणां । 
जड़ी भूता दृष्टिः श्रवणरहितं कर्णयुगलं 
मनोमे निर्लज्जं तदपि विषयेभ्यः स्पृहयति ।।

तरुणियों के ह्रदय में आनन्द पैदा करने वाली जवानी चली गयी है, दन्तपंक्ति गिर गयी है, लकड़ी का सहारा लेकर चलता हूँ, नेत्र ज्योति मारी गयी है, दोनों कानों से सुनाई नहीं देता, तो भी मेरा निर्लज्ज मन विषयों को चाहता है ।

जिस सर का है यह बाल, उसी सर में जोड़ दे।।
पर ज़ौक़ न छोड़ेगा इस पीरा जाल को।
यह पीरा जाल, गर तुझे चाहे तो छोड़ दे।।

मतलब या कि लोग दुनिया को नहीं छोड़ते, दुनिया ही उन्हें निकम्मा करके छोड़ देती है ।

वैराग्य शतकं – तृष्णादूषणं – 14 

वलीभिर्मुखमाक्रान्तं पलितैरङ्कितं शिरः।
गात्राणि शिथिलायन्ते तृष्णैका तरुणायते।। १४ ।।

अर्थ:
चेहरे पर झुर्रियां पड़ गयी, सर के बाल पककर सफ़ेद हो गए, सारे अंग ढीले हो गए – पर तृष्णा तो तरुण होती जाती है ।

नैननकी पलही में पल के, क्षण आधि घरी घरी घटिका जो गई है ।
जाम गयो जुग जाम गयो, पुनि सांझ गयी तब रात भई है ।
आज गयी अरु काल गई, परसों तरसों कुछ और ठई है ।
सुन्दर ऐसे ही आयु गई, तृष्णा दिन ही दिन होत नई है ।

आज सारा संसार तृष्णा के फेरे में पड़ा हुआ है । अमीर और गरीब, सभी इसके बन्धन में बन्धे हैं । गरीब की अपेक्षा धनियों को तृष्णा बहुत है । धनी हमेशा निन्यानवे के फेरे में लगे रहते हैं । ९९ होने पर १०० करने की फ़िक्र लगी रहती है । १००० होने पर १०,००० की, १० हज़ार होने पर लाख की, लाख होने पर करोड़ की और करोड़ होने पर अरब-ख़रब की तृष्णा लगी रहती है । इसी फेर में मनुष्य रोगी और बूढा हो जाता है पर तृष्णा न रोगिणी होती है और न बूढी ।

अङ्गम् गलितं पलितं मुण्डम दशनविहीनं जातं तुण्डं ।
वृद्धो याति गृहीत्वा दण्डं तदपि न मुञ्चत्याशापिण्डम ।।

अंग शिथिल हो रहे हैं, सर गंजा हो गया है, मुँह से दांत गिर चुके हैं, चलने के लिए लाठी का सहारा लेना पड़ता है, फिर भी कामना पीछा नहीं छोड़ रहीं ।

अवश्यं यातारश्चिरतरमुषित्वाऽपि विषया
वियोगे को भेदस्त्यजति न जनो यत्स्वयममून् ।
व्रजन्तः स्वातन्त्र्यादतुलपरितापाय मनसः
स्वयं त्यक्त्वा ह्येते शमसुखमनन्तं विदधति ।। १६ ।।

अर्थ:
विषयों को हम चाहें कितने दिन तक क्यों न भोगें, एक दिन वे निश्चय ही हम से अलग हो जायेंगे; तब मनुष्य उन्हें स्वयं अपनी इच्छा से ही क्यों न छोड़ दे? इस जुदाई में क्या फर्क है ? अगर वह न छोड़ेगा तो, वे छोड़ देंगे । जब वे स्वयं मनुष्य को छोड़ेंगे, तब उसे बड़ा दुःख और मनःक्लेश होगा । अगर मनुष्य उन्हें स्वयं छोड़ देगा, तो उसे अनन्त सुख और शान्ति प्राप्त होगी ।

जो लोग विषयों को पहले ही त्याग देते हैं, उन्हें उनके न होने पर दुःख नहीं होता; किन्तु जो उन्हें नहीं छोड़ते, उन्हें उनके न होने पर महाकष्ट होता है । जो बुद्धिमान पहले से ही धन दौलत स्त्री-पुरुष आदि से मोह हटा लेते हैं, उन्हें मरते समय कष्ट नहीं होता । जो उनमें अपना मन लगाए रहते हैं, वे मरते समय रोते हैं, पर ज़बान बंद हो जाने से अपने मन की बात बता नहीं सकते । इसलिए जो सुख से मरना चाहें, उन्हें पहले से ही विषयों से मुख मोड़ लेना चाहिए । इसी तरह, जो आज नाना प्रकार के सुख भोग रहा है, यदि कल उसे वे सुख न मिलें, तो वह बड़ा दुखी होता है; किन्तु जो विषयों को भोगते तो हैं, किन्तु उनमें आसक्ति नहीं रखते, उन्हें विषय सुखों के न मिलने या उनसे बिछुड़ने पर ज़रा भी कष्ट नहीं होता ।

सांसारिक सुख-भोग असार, अनित्य और नाशवान हैं । ये सदा स्थिर रहनेवाले नहीं; आज जो लक्ष्मी का लाल है, वह कल दर दर का भिखारी देखा जाता है; जो आज जवान पट्ठा है, मिर्जा अकड़बेग की तरह अकड़ता हुआ चलता है, वही कल बुढ़ापे के मारे लकड़ी टेक टेक कर चलता है । जिसे पहले सब लोग खूबसूरत कहते थे और मुहब्बत से पास बिठाते थे, अब उसके पास खड़ा होना भी नहीं चाहते । मतलब यह कि यौवन, जीवन, मन-धन, शरीर-छाया और प्रभुता, यह सब अनित्य और चञ्चल हैं; अतः दुःख के कारण हैं । काय में मरण, लाभ में हानि , जीत में हार, सुन्दरता में असुन्दरता, भोग में रोग, संयोग में वियोग और सुख में दुःख – ये सब दुःख के कारण हैं । अगर बिना मृत्यु का जीवन, बिना रंज कि ख़ुशी, बिना बुढ़ापे कि जवानी, बिना दुःख का सुख, बिना वियोग का संयोग और सदा-सर्वदा रहने वाला धन होता, तो मनुष्य को इस जीवन में अवश्य सुख होता ।
विषय भोगों में सुख नहीं है । ये असार हैं; केले के पत्ते या प्याज के छिलको की तरह सारहीन हैं । फिर भी, मोहवश मनुष्य विषयों में फंसा रहता है । पर एक न एक दिन मनुष्य को इन विषय-भोगों से अलग होना ही पड़ता है । अलग होने के समय विषय भोगी को बड़ा दुःख होता है इससे विषय परिणाम में दुःखदायी ही हैं ।

इसलिए भज् गोविंदम ,भज् गोविंदम ,भज् गोविंदम मूढ़मते ।

अभी से भजन करले भक्ति करले बन्दे । नहीं तो तब पछताए क्या होत है जब चिड़ियां चुग गई खेत् 
🙏❤️🙏

'अबुद्ध' यानि आलसी प्रारब्ध यानि भाग्य के अधीन है , 'बुद्ध' नहीं, कर्मयोगी नहीं ,क्योंकि कर्मयोगी प्रारब्ध बदलना जानता है!जो अजाग्रत है, जो पुरुषार्थहीन है वह अवश्य प्रारब्ध के अधीन है, जन्म जन्मांतर तक ।इसलिए 'अबुद्ध' प्रारब्ध के अधीन, 'बुद्ध' नहीं ।

'अबुद्ध' यानि आलसी प्रारब्ध यानि भाग्य के अधीन है , 'बुद्ध' नहीं, कर्मयोगी नहीं ,क्योंकि कर्मयोगी प्रारब्ध बदलना जानता है!
जो अजाग्रत है, जो पुरुषार्थहीन है वह अवश्य प्रारब्ध के अधीन है, जन्म जन्मांतर तक ।
इसलिए 'अबुद्ध' प्रारब्ध के अधीन, 'बुद्ध' नहीं ।

एक बार एक भिक्षुक भेषधारी निरंजना नदी के पास से गुजर रहे थे । रेत गीली थी और उस पर उनके पद चिन्ह बनते जा रहे थे । संयोगवश उसी मार्ग से एक ज्योतिष भी ज्योतिष विद्या ग्रहण कर काशी से लौट रहा था । अभी-अभी ज्योतिष ज्ञान में निष्णात हुआ वह , अति उत्साहित अपने विचारों में खोया बढ़ा चला आ रहा था । रेत पर पड़े असाधारण पद चिन्हों ने उसका ध्यान आकर्षित किया । उसने गौर से नज़र डाली । उसका ज्योतिष ज्ञान कह रहा था कि यह चक्रवर्ती सम्राट के पद चिन्ह हैं ।

ज्योतिष गहण चिन्तन में खो गया । वह सोचने लगा - 'किन्तु ....किन्तु ! यदि यह चक्रवर्ती सम्राट के चरण चिन्ह हैं, तो एक चक्रवर्ती सम्राट भला जन साधारण की भाँति इस भरी दुपहरी में पैदल क्यों चलेगा ? और वह भी इस भाँति नंगे पैर ! बड़ी उलझन में पड़ गया वह ! एक पल के लिए सारा ज्योतिष शास्त्र पहले कदम में ही थोथा मालूम पड़ा । अभी अभी तो लौटा था निष्णात होकर ज्योतिष विज्ञान में वह ! जो पोथी उसे अबतक प्राणों से प्यारी थी , वही अब उसे थोथी जान पड़ने लगी । 
निराश - हताश उसने सोंचा - 'अहो! चलो, इसको नदी में डुबाकर अपने घर चला जाऊँ ? ज्योतिष तो कहता है कि चक्रवर्ती सम्राट होने के इतने स्पष्ट लक्षण तो कभी कभी युगों में किसी व्यक्ति में दृष्टिगोचर होता है । अगर ऐसे पद चिन्ह का आदमी रेत पर भरी दुपहरी में नंगे पैर चल रहा है तो आज मेरा सब परिश्रम व्यर्थ हो गया ! अब किसी को ज्योतिष के आधार पर कुछ कहना उचित नहीं है ।

लेकिन इससे पहले कि वह अपने शास्त्र को उठाकर नदी में फेकता , उसने सोंचा - 'जरा चलकर देख भी तो लूँ, इस विरले व्यक्ति को । यह चक्रवर्ती आखिर है कौन , जो पैदल चल रहा है !

 वह निशान का अनुसरण करता आगे बढ़ता गया । एक वृक्ष की छाया में वह पद चिन्ह समाप्त हो गया । उसने पाया कि वहाँ एक भिक्षुक विश्राम कर रहा था । अब तो वह और मुश्किल में पड़ गया क्योंकि उसका चेहरा भी उसके चक्रवर्ती होने का संकेत दे रहा था । और तो और उससे ललाट पर निशान भी चक्रवर्ती सम्राट होने के थे । उसकी आँखें बंद थीं और उनके दोनो हाथ पालथी में रखे थे । हाथ पर नज़र डाली , हाथ भी चक्रवर्ती के थे । महान अचरज में वह ज्योतिष पड़ गया । समस्त चिन्ह चक्रवर्ती के थे, किन्तु आदमी भिक्षुक था । वह भिक्षा का पात्र लेकर एक वृक्ष के नीचे बैठा था । भरी दुपहरी में नितांत अकेला था वह ! 

हिलाकर उसने उस भिक्षुक से कहा - ' महानुभाव , मेरी वर्षो की मेहनत व्यर्थ किए दे रहे हो, सब शास्त्र नदी में फेक दूँ या क्या करुँ ? मैं काशी से वर्षो की मेहनत करके लौट रहा हूँ । तुममें जैसे पूरे लक्षण प्रकट हुए हैं , ऐसे सिर्फ उदाहरण मिलते हैं ज्योतिष शास्त्रों में , प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं ! ऐसा आदमी तो कभी- कभी लाखों वर्षों में मिलता है । पहले ही कदम में तुमने मुझे मुश्किल में डाल दिया । तुम्हे होना चाहिए चक्रवर्ती सम्राट ! और... तुम यह भिक्षापात्र लिए इस वृक्ष के नीचे ? 

उस भिक्षुक ने कहा -' तुम्हे संयोगवश ऐसा व्यक्ति मिल गया, जो अब प्रारब्ध को दोष दे कर अकर्मण्य नहीं है । लक्षण बिल्कुल ठीक कहते हैं । जब मैं पैदा हुआ था तो यही होने की सभी संभावनाएँ थी । अगर मैं बंधा हुआ चलता , पुरुषार्थ न करता तो वही घटित होता । पुरुषार्थ ने मुझे समझा दिया है कि 'अबुद्ध' प्रारब्ध के अधीन है , 'बुद्ध' नहीं, क्योंकि बुद्ध प्रारब्ध बदलना जानता है!
जो अजाग्रत है, जो पुरुषार्थहीन है वह अवश्य प्रारब्ध के अधीन है, जन्म जन्मांतर तक ।

परन्तु , जो जाग्रत है, वह हरिगुरु की अहैतुकी कृपा का लाभ उठा प्रारब्ध बनाता है, बिगड़ी बनाता है | भाग्य उसे नहीं बनाता ,वरन वह भाग्य को बनाता है | बुद्ध काल, कर्म, ईश्वर, गुण पर दोष नहीं लगाता, बल्कि पुरुषार्थ पर ध्यान देता है |

Monday, 18 December 2023

उगना रे मोर कतय गेलाह।कतए गेलाह शिब किदहुँ भेलाह।।भांग नहिं बटुआ रुसि बैसलाह।जो हरि आनि देल विहँसि उठलाह।।जे मोरा कहता उगना उदेस।नन्दन वन में झटल महेस।गौरि मोन हरखित मेटल कलेस।।विद्यापति भन उगनासे काज।नहि हितकर मोरा त्रिभुवन राज।।

यह कहानी पुरी अवश्य पढ़े की किस प्रकार 
भगवान् भक्त के अधिन हो जाते है| वो भक्त के पीछे पीछे चलते है | भगवान् तो भाव विह्वल होकर चाकर वन कर अपने भक्त की सेवा करने लग जाते हैं :- 
ऐसा ही हुआ था भक्त बिद्यापति के साथ :- अवश्य पढ़े 
साल १४२१ की वास्तविक घटना है | 

मिथिला के लोकमानस में यह बात समस्त विख्यात है कि विद्यापति जैसा शिवभक्त न इतिहास में हुआ न ही भविष्य में हो सकता है। लोकमान्यता के अनुसार महाकवि की रचनाधर्मिता एवं अपने प्रति भक्ति का असीम स्नेह को देखकर भगवान शंकर द्रवित हो गए। उन्हें ऐसा लगा कि अपने इस आश्चर्यजनक भक्त एवं कवि विद्यापति के बिना वे रह ही नहीं सकते।

फिर क्या था। एक दिन भगवान आसुतोष शिव ने अपना रुप बदल लिया और गाँव के एक गंवार एवं अनपढ़ रुप धारण कर महाकवि के समक्ष उपस्थित हो गए। उस अनपढ़ ग्रामीण को देखकर महाकवि ने पूछा: "तुम्हारा नाम क्या है? तुम मेरे पास क्यों आए हो।" इस पर उसने जवाब दिया, "मेरा नाम उगना है। मैं सूदूर गाँव का रहने वाला एक गरीब और बेरोजगार तथा अशिक्षित युवक हूँ। काम की तलाश में मैं आपके पास आया हूँ।"

इस पर महाकवि ने जवाब दिया,"मैं तो एक साधारण कवि हूँ। मेरे पास किसी भी तरह का रोजगार तुम्हारे लायक नहीं है।" अब उगना बोला, "हे कवि, आप मुझे अपने पास चाकर बना कर क्यों नहीं रख लेते?"

महाकवि कहने लगे,"भई, मैं ठहरा सामान्य आदमी। न तो मुझे सेवक की जरुरत है, और न ही मैं आर्थिक रुप से इतना सबल हूँ कि सेवक का लालन-पालन कर सकूँ। इसीलिए तुम यहाँ से चले जाओ।" लेकिन, उगना जाने के लिए तैयार नहीं था। महाकवि के कथ्य को समाप्त होते ही चंचल भाव से भयमुक्त होकर एकाएक बोल उठा:

"ठाकुर जी, मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए। सिर्फ दो वक्त का रुखा-सूखा भोजन खाने के लिए दे दीजिएगा।"

महाकवि चुप थे परन्तु घर के भीतर बैठी उनकी पत्नी सुशीला वार्तालाप को ध्यानपूर्वक सुन रही थी। जब उन्होने उगना को यह कहते सुना कि वह केवल भोजन लेकर महाकवि की चाकरी करने को इच्छुक है तो एकाएक बाहर आयी। महाकवि के मौन को भंग करते हुए बोली:

"आप भी किसी बात पर अकारण ही अड़ जाते हैं। बेचारा अपने आपको अनाथ बतला रहा है। आप इसको रख लीजिए। खाना ही तो खाएगा बेचारा। फिर इतने बड़े घर में बाहर-भीतर के लिए एक विश्वसनीय आदमी की जरुरत तो है ही। आप कभी-कभार बाहर अकेले जाते हैं, उस समय मैं केवल आपकी चिन्ता में मग्न रहती हूँ। यह देखने से सहज और ईमानदार लगता है। मैं तो आपसे यही कहुँगी कि आप इसे रख लीजिए। हम लोगों के साथ उगना परिवार के सदस्यों की भांति रह लेगा।"

महाकवि अपनी पत्नी सुशीला की बात पर गंभीरता से मौन होकर सोचने लगे। उधर उगना मन ही मन प्रसन्न हो रहा था। होता भी क्यों नहीं, सुशीला ने तो उसके मन की बात महाकवि से समक्ष रख दिया था। कुछ देर सोचने के बाद विद्यापति उगना को सम्बोधित करते हूए बोले:

"देखो उगना, मैं तुम्हें अपने यहाँ रख रहा हूँ। तुम थोड़ी-बहुत मेरी सेवा कर दिया करना। तुम यहाँ भयमुक्त होकर मेरे परिवार के सदस्य की भांति रहो। कभी भी अपने-आपको चाकर नहीं समझना। हाँ मेरी धर्मपत्नी सुशीला तुम्हें जो भी कार्य दे उसे सही समय पर करना। मैं यो तो तुम्हें भोजन-वस्र दूँगा, परन्तु यह भी प्रयास कर्रूँगा कि तुम्हारे अंदर सही संस्कार पनपे। जाओ अब हमारे घर में ईमानदारीपूर्वक कार्य करो। अगर संभव हो पाया तो मैं तुम्हें कुछ राशि प्रतिमाह मैहनताना के तौर पर भी दे दिया कर्रूँगा। अब इस बीच मेरी पत्नी तुम्हारे लिए भोजन परोस देंगी।"

इतना कहकर महाकवि ने अपने कथ्य को विराम दिया। उगना की प्रसन्नता का वर्णन तो शब्द में किया ही नहीं जा सकता। प्रसन्न मन से वह महाकवि एवं सुशीला की ओर कृतज्ञ नैनों से देखते हुए महाकवि की आज्ञा का पालन करने के लिए बगल के तालाब में स्नान-ध्यान के लिए चल दिया। उसकी आँखे मानो बार-बार यह कहना चाहती थी कि धन्य हो महाकवि कोकिल, रससिद्ध, अभिनव जयदेव विद्यापति। आपने तो मुझे अपने घर में स्थान देकर कृत-कृत कर दिया।"

अब उगना महाकवि के यहाँ एक विनम्र और स्वामीभक्त चाकर के रुप में रहने लगा। प्रयास यह करता कि किसी को उसके कार्य में नुक्स ढूँढ़ने का अवसर ही न मिले। महाकवि विद्यापति ठाकुर और उनकी पत्नी सुशीला दोनों ही उगना के कार्य, ईमानदारी और स्वामीभक्ति से बेहद प्रसन्न थे। विद्यापति को तो उगना पर इतना विश्वास हो गया था कि वे जहाँ भी जाते अपने साथ उगना को भी ले जाते। जीवन अब बहुत ही आनन्द से चल रहा था।

एक बार की बात है। एक दिन महाकवि अपने गाँव विसपी से राजदरबार जा रहे थे । सेवक उगना भी साथ था। जेठ महीना था। गरमी अपने चरमोत्कर्ष पर थी। लोग परेशान हो रहे थे। दोनों भरी दुपहरिया में पैदल चले जा रहे थे, आगे-आगे महाकवि विद्यापति और पीछे-पीछे उगना। चलते-चलते वे एक ऐसे स्थना में पहुँचे जो बिल्कुल विरान लग रहा था। चारों तरफ न वृक्ष, न पानी का स्रोत, केवल खेत-ही-खेत। वह भी फसलविहिन केवल श्रोता हुआ और बड़ेबड़े मिट्टी के टुकड़ों से उबर-खाबर खेत। एकाएक महाकवि को प्यास लगी। परन्तु पानी नहीं था। देखते हैं तो चायें और पानी का कोई स्रोत-कुँआ, तालाब, नदी आदि तो है ही नहीं। एक आम के पेड़ के नीचे रुककर महाकवि ने उगना को सम्बोधित करते हुए कहा:

"उगना, प्रचण्ड गर्मी है।"

"हाँ ठाकुरजी।" उगना ने उनके कथ्य का समर्थन किया। महाकवि फिर बोले:

"उगना, मैं पानी पीना चाहता हूँ। यह लोटा लो और कहीं से पानी की व्यवस्था करो।"

उगना लाचार भाव से इधर-उधर देखते हुए बोला- "ठाकुरजी, परन्तु जल का स्रोत कहीं भी न नहीं आता। आप ही बताइये मैं क्या कर्रूँ। चलिये कुथ और आगे बढ़कर किसी गाँव के आस-पास चलते हैं। वहाँ पानी मिल सकता है।"

परन्तु विद्यापति का गला प्यास से सुखने लगा। बोल पड़े, "उगना, कहीं से भी पानी की व्यवस्था करो, वरना मैं प्यास से मर जाऊँगा।"

इतना कहकर कवि बेहोश होकर वहीं सो गये। उगना तो मामूली चाकर था नहीं। वह तो साक्षात् देवाधिदेव महादेव था। कोई उपाय न पाकर कुछ दूर गया और अपने जटा से एक लोटा गंगा जल लेकर महाकवि के पास आ गया। फिर विद्यापति को उठाते हुए बोला-

"ठाकुरजी, ठाकुरजी, उठिये आपके लिए किसी तरह मैंने एक लोटा जल का प्रबन्ध किया है। उठिये जल पीकर अपनी प्यास बुझाईये।"

उगना के इस कथ्य से जैसे महाकवि को जीवनदान मिल गया। वे फुर्ती के साथ उठे और लोटा के जल को एक ही साँस में पी गए। गटागट-गटागट। जल पीते ही उन्हें अनुभव हुआ कि यह जल सामान्य न होकर विशिष्ट था। जल-जल न होकर गंगाजल था। फिर क्या था, महाकवि ने उगना से पूछा-

"उगना, सच-सच बताओ तुम यह जल कहाँ से लाए। उगना, तुम मामूली चाकर नहीं हो। यह जल साधारण जल नहीं बल्कि गंगाजल है।"

उगना बात को टालते हुए बोला-

"नहीं ठाकुरजी, मैं तो थोड़ी दूर जाकर एक कुँए से आपके लिये यह जल बड़ी सुश्किल से लाया हूँ। आप बेवजह इसे गंगाजल कह रहे हैं। मैं भला इस विरान जगह में गंगाजल कहाँ से ला सकता हूँ। आप शंका न करें। जल्दी उठिये अब हम लोग आगे का सफर प्रारंभ करते हैं।"

हालांकि उगना थोड़ा घबराया लग रहा था। लेकिन महाकवि विद्यापति थे गजब के पारखी। उन्होंने फिर अपना प्रश्न दुहराया:

"उगना, मुझे पूरा विश्वास है, कि तुम मामूली चाकर नहीं हो। तुम मुझसे कुछ रहस्य छिपाना चाहते हो। सच-सच बताओ नहीं तो मैं यहाँ से नहीं उठने वाला। तुम कौन हो, और यह जल जो तुम मेरे पीने के लिए लाए हो उसका रहस्य क्या है। उगना, तुम अपना रहस्य मुझे बता दो।"

उगना फिर बोला-

"ठाकुर जी, आप बोवजह मेरे जैसे जाहिल चाकर में रहस्य देखने का प्रयास कर रहे हैं। आपकी प्यास बुझाने के लिए मैं एक कुँए से जल लाकर आपको दिया हूँ। इसके अलावा मैं कुछ नहीं जानता। अगर जल लाना रहस्य है तो मेरा रहस्य यही है।"

विद्यापति भला उगना के झांसा में कब आने वाले थे फिर बोले:

"उगना, अब देर मत करो। चुपचाप सच का बखान कर दो। मैंने जिस जल का पान अपने लोटा से किया है वह गंगाजल के अतिरिक्त कुछ नहीं हो सकता। अब या तो तुम सच-सच बता दो अन्यथा मैं यहाँ से आगे नहीं बढूँगा।"

अब उगना असंसजस में आ गया। विद्यापति फिर बोल उठे-

"उगना कहीं तुम शिव तो नहीं हो।" इस पर उगना मुस्करा दिया। विद्यापति को अब पूर्ण विश्वास हो गया कि उगना कोई और नहीं बल्कि भगवान महादेव है, और उसने अपने जटा से गंगाजल निकालकर उन्हें पीने के लिए दिया है। फिर क्या था वे उगना के पैर पर गिर कर त्राहिमाम् प्रभो-त्राहिमाम् कहने लगे।

अब उगना शिव के असली रुप में उपस्थित होकर कवि को धन्य कर दिया। महाकवि ने विस्फोटित नेत्रों से महादेव का दर्शन किया। फिर भगवान महादेव महाकवि को ईंगित करते हुए कहना प्रारंभ किया:

"देखो विद्यापति, मैं तुम्हारी भक्ति और कवित्त शैली से इतना प्रभावित हूँ कि हमेशा तुम्हारे साथ रहना चाहता हूँ। इसीलिए मैं उगना नामक जटिल चाकर का वेश बदलकर तुम्हारे पास गया। मैं अब भी तुम्हारे पास रहना चाहता हूँ, परन्तु एक शर्त है। जिस दिन तुमने किसी से यह कह दिया कि मैं उगना न होकर महादेव हूँ, मैं उसी पल अन्तध्र्यान हो जाऊँगा। इसे तुम अच्छी तरह गांठ बांध लो।"

महादेव के दर्शन पाकर महाकवि विद्यापति गदगद हो गए। उन्हें लगा कि मानो उनका जीवन धन्य हो गया। जो चीज लोग दस जन्मों में नहीं कर पाता, उसे कवि से सहज ही प्राप्त कर लिया। महाकवि ने भगवान शंकर से कहा- हे नाथ, मुझे संसार की किसी भी वस्तु का लोभ नहीं है। आप ही हमारे इष्ट देव, आराध्य देव, आदर्श-देव और पूज्यदेव हैं। आपका सानिध्य मिल गया। अब क्या चाहिए। परन्तु, प्रभो! आपका मेरे जैसे तुच्छ भक्त के यहाँ चाकर के रुप में रहना क्या ठीक है? क्या आप मेरे मित्र के रुप में या किसी अन्य वेश में नहीं रह सकते?"

भगवान शंकर ने इस पर जवाब दिया:

"नहीं पुत्र! मैं केवल उगना बनकर तुम्हारे साथ रहूँगा। तुमसे केवल एक निवेदन है कि तुम इस रहस्य को अपने तक रखोगे। और तो और किसी भी परिस्थिति में अपनी पत्नी सुशीला से भी इस रहस्य को उजागर नहीं करोगे।"

इस पर महाकवि ने गर्दन हिलाकर अपनी स्वीकृति दे दी। भगवान महादेव पुन: उगना के वेश में आ गए। हालांकि इस घटना के बाद महाकवि प्रयास करते कि उगना से जितना कम कार्य करवायाजा सके उतना अच्छा है। लेकिन उनकी पत्नी तो इस सच से बिल्कुल अन्जान थी।

एक दिन सुशीला ने उगना को कोई कार्य करने के लिए कहा। उगना कार्य को अच्छी तरह समझ नहीं पाया। करना कुछ और कर कुछ और दिया। इस पर सुशीला सुस्से से लाल हो गई। अपना क्रोध नहीं बर्दाश्त कर पाई। आवेग में आकर जमीन में पड़े झाड़ू उठाकर तरातर उगना पर बेतहाशा प्रहार करने लगी। उगना झाड़ू खाता रहा। इसी बीच महाकवि वहाँ पहुँच गए। उन्होंने सुशीला को मना किया। परन्तु सुशीला ने मारना बन्द नहीं किया। अब कवि के सब्र का बांध टूट गया। एकाएक भावातिरेक में चिल्लाते हुए बोले-

"अरी, ना समझ नारी! तुम्हे पता है तुम क्या कर रही हो? उगना सामान्य चाकर नहीं बल्कि भगवान शंकर है। तुम भगवान शंकर को झाड़ू मार रही हो।"

कवि का इतना कहना था कि उगना अन्तध्र्यान हो गया। अब विद्यापति को अपनी गलती का अहसास हुआ। लेकिन तब तक उगना विलीन हो चुका था। कवि घोर पश्चाताप में खो गये। खाना-पीना सभी छोड़कर उगना, उगना, उगना रट लगाने लगे। बावरे की तरह जगह-जगह उगना को खोजने लगे। उस समय भी महाकवि ने एक अविस्मरनीय गीत का उगना के लिए निर्माण किया। गीत नीचे दिया जा रहा है:

उगना रे मोर कतय गेलाह।
कतए गेलाह शिब किदहुँ भेलाह।।
भांग नहिं बटुआ रुसि बैसलाह।
जो हरि आनि देल विहँसि उठलाह।।
जे मोरा कहता उगना उदेस।
नन्दन वन में झटल महेस।
गौरि मोन हरखित मेटल कलेस।।
विद्यापति भन उगनासे काज।
नहि हितकर मोरा त्रिभुवन राज।।

महाकवि विद्यापति अधीर हो उठे। उनकी अधिरता ही पद का रुप ग्रहण करने लगी- अरे, मेरा उगना। तुम कहाँ चले गए? मेरे शिव, तुम कहाँ खो गए! तुम्हें क्या हो गया? आह! अगर तुम्हारी झोली में भागं नहीं रहता था तुम कैसे रुठ जाते थे! और जैसे ही मैं खोज-खाज कर ला देता था, तो तुम प्रसनान हो जाते थे। आज तुम एकाएक कहाँ चले गए? जो के ई भी मुझे मेरा उगना के सम्बन्ध में जानकारी देगा, मैं वास्तव में उसे उपहार स्वरुप कंगना दूँगा। अरे! भगवान महेश तो मिल गए! भाई, उसी नन्दन कानन में। अरे देखो, गौरी भी प्रसन्न हो उठी। अब मेरा भी क्लेश खत्म हो गया। मुझे तो केवल उगना से कार्य है। तीनों-लोक का यह राज-पाट मेरे लिए हितकारी नहीं है।

" हरिगुरु का चिन्तन करो , चिन्ता मत करो , तुम्हारी हरि चिन्तन तुम्हे देती है हमेशा , पर चिन्ता तुमसे लेती है हर पल ,

" हरिगुरु का चिन्तन करो , चिन्ता मत करो , तुम्हारी हरि चिन्तन तुम्हे देती है हमेशा , पर चिन्ता तुमसे लेती है हर पल , हमेशा याद करो हरि गुरु को , वो शक्तिमान हैं , तुम उनके शक्ति से चेतन हो , चिन्तन तुमको शक्ति देगी , तुम्हारे आत्मवल को बढाएगी , और चिन्ता तो तुम्हे शक्ति हीन हीं करेगी | 
तुम अनु हो , वो विभु हैं | तुम्हारे पास लिमिटेड पावर है , उनके पास अनलिमिटेड. 
तुम केवल सुकर्म करो और वो भी अर्पित कर दो उनको | फिर देखो कमाल ! क्यों तुम व्यर्थ चिन्ता करके अपने समय को , अपने आत्म वल को समाप्त करते हो | तुम्हारे चाहने से चिन्ता करने से कुछ भी नही होने वाला | जो उनको मंजूर है तुम्हारे लिय वही होगा | जो तुम्हारे प्रारब्ध में है वही मिलेगा | जो मिलना है मिलेगा , तुम हरिगुरु के समर्पित होकर उनके वताए हुए मार्ग पर चलो केवल | 
कोई विमार हो गया तुम्हारे घर में , ईलाज कराओं , डॉ . के पास ले जाओ , पर चिन्ता मत करो , आयु होगी ठीक हो जाएगा | नही तो जाना होगा | तुम कुछ नही कर सकते , विल गेट्स भी कुछ नही कर सकता , बड़े से बड़े डॉ. के घर से भी लोग मरते है | वो कुछ नही कर सकता | फिर चिन्ता क्युँ ? चिन्ता चिता पर पहूँचा देती है शरीर को , आत्मा तो अमर है | 
 फिर दुसरा देह मिल जाता हैं उसके कर्मो के हिसाब से | 
पर हरि चिन्तन , स्मरण , मनन् , हरिगुण गाण तुमको अनलिमिटेड पावर से जोड़ देती हैं | 

तुम्हारा मन , बुद्धि , ज्ञान , दृष्टि , सोचने समझने की शक्ति सब लिमिटेड है | 
अज्ञानता बस कुऐं के मेडक के समान तुम इस दुनिया को अपने नज़रिये से देखते हो और तुम इस संसार को सब कुछ मान लेते हो | ऐसे रमे हो संसार में की संसार का एडिक्टेड होकर घोर संसारी बन कर अपना मानव जीवन व्यर्थ गमा देते हों | गुरु में पूर्ण समर्पण , पूर्ण विस्वास , पूर्ण श्रद्धा युक्त होकर चिन्तन करो , संसार से माया से एडिक्सन समाप्त हो जाऐगा | 
मेरी मानो चिन्ता छोड़ो हरि चिन्तन करो | लोगों कि मत सुनो , सुनो तो सिर्फ गुरु को , जानो , मानो , और गुरु के बताये मार्ग पर पूर्ण दृढ़ता से चलो , फिर देखो कमाल | 
:- मां के प्रवचन से

भगवान की उपासना-अराधना हेतु भला गुरु की क्या आवश्यकता है ? भगवान तो सर्वज्ञ, सार्वभौम और सर्वसमर्थ है । ऐसे में गुरु की क्या जरुरत है ? क्यों लोग गुुरु के चक्कर में पड़ते है ?

अकसर ही यह सुनने को मिलता है कि भगवान की उपासना-अराधना हेतु भला गुरु की क्या आवश्यकता है ? भगवान तो सर्वज्ञ, सार्वभौम और सर्वसमर्थ है । ऐसे में गुरु की क्या जरुरत है ? क्यों लोग गुुरु के चक्कर में पड़ते है ? हम ह्रदय से प्रभु को पुकारें , तो हमारा काम बन जाएगा । पर धारणा विल्कुल गलत है । भगवत्मार्ग की ओर यदि कोई उन्मुख होना चाहता है, तो उसे मार्गदर्शन की परम आवश्यकता है। संसार में भी जन्म से लेकर मृत्यु तक हमारे प्रत्येक कर्म-ज्ञान का स्त्रोत कहीं और विद्यमान है । जब संसार में हम बिना मार्गदर्शन के आज तक कुछ न कर सके तो अज्ञेय भगवान को अपने बल पर बिना मार्गदर्शन के प्राप्त करने की बात कहना क्या अपने आपको धोखा देना नहीं है ? 
अत: भगवत्पिपासुजन गुरु के महात्म को अपने ह्रदय में धारण करें, वरना इसके बिना आपका सारा प्रयत्न पानी को हाथ की लकीर से विभक्त करने जैसा ही होगा ।
जैसे भगवान् सनातन है, जीव की भगवत्पिपासा सनातन है, उसी प्रकार भगवत्प्राप्ति के एकमात्र आधार गुरु और उनका महत्त्व सनातन है । ध्रुव सत्य है ।

तमिद् गुरुं प्रपद्येत जिज्ञासु: श्रेय उत्तमम् ।
शाब्दे परे च निष्णातं ब्रह्मण्युपशमाश्रयम् ।।
 (भाग. ११-३-२१)

अर्थात् शाश्वत कल्याण को जानने के इच्छुक व्यक्ति को भक्ति शास्त्र में अर्थात् भगवद् विषयक श्रावणकीर्त्तनादि विषयों में पारदर्शी भगवत्-निष्ठ श्रीगुरु की शरण लेनी चाहिए । उन श्रीगुरुदेव को अपना हितकारी, परम बांधव तथा परमाराध्य श्रीहरि रुप जानना चाहिए । और निरंतर निष्कपट भाव से उनकी सेवा करनी चाहिए । उनके अनुगत होकर साधन विधान करना चाहिए , जिससे आत्मप्रद अर्थात् अपने तक को प्रद करने वाले भक्तवत्सल श्रीभगवान् संतुष्ट होते हैं । :- मां

बड़े-बड़े सरस्वती-वृहस्पति से भी आगे जो बुद्धि रखते है, वे भी किसी महापुरुष के वाक्य, क्रिया, मुद्रा, का अर्थ नहीं समझते ।

बड़े-बड़े सरस्वती-वृहस्पति से भी आगे जो बुद्धि रखते है, वे भी किसी महापुरुष के वाक्य, क्रिया, मुद्रा, का अर्थ नहीं समझते ।

"योगेश्वराणां गतिमन्धाबुद्धि: कथं विचक्षीत गृहानुबन्ध: ।"
                                              (भाग. ५-१०-२०)
फिर मायाबद्ध जीव बेचारा कैसे जानेगा, वह तो मंद बुद्धि है, 
उसकी बुद्धि त्रिगुण के अंतर्गत है । वह किस पैमाने से नापेगा ? 
श्रोत्रिय-ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष के अनुगत हुए बिना भक्ति कदापि नहीं मिल सकती ।
यानी गुरु कृपा हुई, तो भक्ति मिली। शास्त्र वेद यहाँ तक कहते है कि तुम भगवान् का नाम तक न लो, लेकिन केवल श्रोत्रिय-ब्रह्मनिष्ठ गुरु की भक्ति करो, सब कुछ मिल जाएगा ।

गुरुर्यस्य भवेत् तुष्टस्तस्य तुष्टो हरि: स्वयं ।

गुरु के तुष्ट होते ही भगवान विभोर हो जाते हैं । वह भगवान का प्राण प्रिय हो जाता है क्योंकि वह उनके प्राण प्रिय से प्यार करता है । इसलिए तो भगवान उद्धव जी से कहते है -

   न यथा में प्रियतम आत्मयोनिर्न शंकर: ।
न च संकर्षणो न श्रीर्नैवात्मा च यथा भवान् ।।
                           (भाग. ११-१४-१५)
उद्धव जी जब गोपियों के पास से लौटे तो श्रीकृष्ण ने उनसे कहा- 'उद्धव! मुझे तुम्हारे जैसे प्रेमी भक्त जितने प्रियतम हैं, उतने प्रिय मेरे पुत्र ब्रह्मा, आत्मा शंकर, सगे भाई बलराम जी, स्वयं अर्धाङ्गिनी लक्ष्मी जी और मेरी अपनी आत्मा भी नहीं है ' ।
:- मां

Wednesday, 13 December 2023

अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः। - गीता , भगवान श्रीकृष्ण ।।

अनन्यता भक्ति मार्ग के पथिकों का सबसे बड़ा आधार है अस्त्र है , साधन है । मेरा स्व अनुभव है अनन्यता तथा सततं यानि निरंतर स्मरण से व्यक्ति का उत्थान बहुत जल्दी जल्दी होता है ,
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः। - गीता , भगवान श्रीकृष्ण ।। 

 अनन्यता भंग हुआ कि जो कमाया वो सब गया दो मिनट में । 
संसार में भी आज उस डौक्टर के पास , कल दुसरे डाक्टर के पास जाने से रोगी कहीं का नहीं रहता । 
और एक साथ अनेक डाक्टर का दवा खाने से भी रियेक्सन होना स्वाभाविक है। ठीक इसी प्रकार आध्यात्मिक मार्ग में जब एक बार यह निश्चय हो गया की हमारा कल्याण इन्हीं से होने वाला है तो उनको मन के द्वारा कस कर , यानि दृढ़ होकर पकड़ लेना परमावश्यक है । और केवल उन्हीं पर भरोसा करके उन्हीं के बतलाए मार्ग का सेवन करना चाहिए, अनुसरण करना चाहिए। 

कभी कभी शुरू में महापुरुष तथा भगवान श्री कृष्ण जीव के अनन्यता का बड़ी बड़ी परीक्षाऐं लेते है , कठीन कठीन एवं अनुकुल तथा प्रतिकूल परिस्थितियों को देकर , अलग अलग संत को लाकर खड़ा कर देते हैं कन्फ्यूज करने के लिए ताकि परीक्षा ठीक से हो, कभी कभी भौतिक जगत संबंधित कष्ट भी मिल जाता है परीक्षा के लिए , यानि हर तरह से परीक्षा होती है , बहुत ठोका बजाया तथा परखा जाता है अनन्यता के लिए , विश्वास में दृढ़ता का परीक्षा के लिए , श्रद्धा भाव में दृढ़ता के लिए परीक्षा , यानि हर तरह से परीक्षा , अनुकूल तथा विपरित दोनों परिस्थितियों द्वारा ।  

उस समय अगर हमारी अनन्यता भंग नहीं हुई तो बस रस मिलने लगता है , हर प्रकार से लाभ मिलने लगता है , क्योंकि वो समझ जाते हैं कि यह समझ गया है अनन्यता का रहस्य । अब कुछ भी हो जाए ये कहीं और नहीं जाने वाला । अब ये जियेगा और मरेगा सिर्फ मेरे पास । इसको अपना भक्ति और प्रेम देना ही पड़ेगा । 
फिर झट से उसको अपना लेते हैं । 
लेकिन जो भटका वो गया । वो कहीं का नहीं , न तीन में ओर न तेरह में , ऐसे को कोई नहीं पुछता । इसलिए शास्त्रों में कहा गया है कि -
"एक ही साधे सब सधे , सब साधे सब जाए "
हरेक महापुरूषों द्वारा मार्ग अलग अलग है , भाव अलग अलग है कोई साख्य भाव के मार्ग का पथिक हैं वो साख्य भाव का मार्ग पर अपने अनुयायियों को चलाते हैं , कोई सखा भाव मार्ग का संत हैं , कोई वात्सल्य भाव का हैं तो कोई दास भाव का तो कोई माधुर्य भाव का । 
कोई माधुर्य भाव में भी साधारणी रति के संत हैं गुरू हैं , कोई सामंजसा रति के है तो कोई समर्था रति की उपासना बतलाते है , 
समर्था रति के बहुत कम महापुरूष हुऐ हैं , अवतार लेकर आए हैं धरा धाम पर , न के बराबर , ये हज़ारों सालों में केवल एक आध बार अवतार लेकर आते हैं पृथ्वी पर उच्च कोटि के जीवों का कल्याण करने । उच्च कोटी के जीव इसलिए कि ऐसे महापुरुषों कि प्राप्ति तथा उन पर अटुट श्रद्धा और विश्वास की उत्पत्ति एक जन्म के साधना का फल तो नहीं है । 

हमारे गुरूदेव उनमें से एक है, इनके पहले पांच सौ साल पहले ये गौरांग बन कर आए थे । 
हमारे श्री महाराज जी समर्था रति में भी महाभाव भक्ति वाले रसिक संत हैं , गोलोक के वृंदावन के निभृत निकुंज रस वाले संत है , ये और भी दुर्लभ होते हैं, बड़ा दुर्लभ , दुर्लभतम होते हैं ये । भगवान श्री कृष्ण इनको अपने आंखों का पुतली बना कर पलकों में छुपा कर रखते हैं । इनसे भगवान श्री कृष्ण एक क्षण के लिए भी दुर नहीं रहते। और न रह सकते , ये कहीं जाते हैं तो श्री कृष्ण सब कुछ भूल भाल कर अपना लोक तथा श्रीमति जी को भी त्याग कर इनके पीछु पीछु चलते हैं दौड़ने लगते हैं । इनके बिना वो रह ही नहीं सकते कभी । 

'हरि के जो वल्लभ हैं दुर्लभ भुवन माझ 
तिनही के पद् रेणु आसा जिय करिहें 
योगी जपि तपि जासो मौकों कछु काम नाही
प्रीति प्रतीति रिति मेरी मति हरिहें " 

बड़ा दुर्लभ होते हैं ऐसे संत , ऐसे संत को भगवान श्री कृष्ण भी अपना वल्लभ मानते हैं । 
अत: ऐसे महापुरुष जिनको मिल गया उससे बड़ा सौभाग्यशाली जीव कोई नहीं तीनों लोकों में । 
अब इनको पाकर कोई अन्य जगह क्यों जाए । कामधेनु को छोड़ कर छेड़ी कौन दुहावे । रस मलाई छोड़ कर रसगुल्ला कौन चाहे भला । गोलोक रस वाले के रस का चस्का जिसको लग गया , वो वैकुंठ लोक के रस को क्यों चाहे , वैकुंठ भी फीका है गोलोक के रस के आगे तो भला अन्य लोक कि कामना करना वेकूफी है । यह समझने की बात है , जो समझ गया वो पा लिया । बस । :- संजीव । 
श्री राधे ।

Sunday, 10 December 2023

सुत जी ने कलयुग में होने वाले घटनाओं का जो जिक्र किया उसका भावार्थ

सुत जी ने कलयुग में होने वाले घटनाओं का जो जिक्र किया उसका भावार्थ :- 
कलयुग जैसे जैसे बीतेगी अपना प्रभाव इस प्रकार दिखलाएगी :- 

हां एक बात अवश्य होगी सभी वास्तविक तथा सच्चे धर्मनिष्ठ तथा भगवद् भक्त , वास्तविक संतों में आस्था रखने वाले जीवात्मा अपने ईष्ट और गुरू के लोक में निवास करने चले जाएंगे , उनको कलयुग के ताप से मुक्ति पहले ही मिल जाएगी । जो हमारे गुरूदेव श्री कृपालु जी महाराज या कुछ वर्तमान वास्तविक संतों के प्रति पूर्ण रूप से आस्थावान होंगे, श्रद्धावान होंगे , वे सभी मनुष्य इन घोर कलयुग के लक्षण के प्रकट होने से पहले दिव्य लोक , अपने गुरू के लोक चले जाएंगे, लेकिन जो दुष्ट प्रकृति के होंगे, उनको कलयूग का प्रभाव झेलने के लिए कलयुग में कई कई बार जन्म लेना होगा और इन कठीन पीड़ा से बार बार मरना होगा, गुजड़ना होगा यह एक अटूट सत्य है । 

1. कलयुग में मनुष्य का आत्मबल गिरने लगेगा । लोग आलसी , भोगी तथा अति विलाशी होंगे । 

2. मनुष्य झूठ पर भरोसा करेंगे और सच को स्वीकार करने से परहेज़ करेंगे । सच पर ऊंगली उठाएंगे और झूठ को गले लगायेंगे । सही रास्ता दिखाने सत्य बोलने वाला , सन्मार्ग का बात करने वाला कटु प्रतित होगा , दुश्मन कि तरह नजर आएगा और गलत मार्ग पर ले जाने वाले का लोग संगति करेंगे । गलत लोगों को लोग अपना आदर्श मानेगें , नेता मानेंगे । जो जितना चिल्लाएगा , चीख चीख कर बातें करेगा वो उतना पसंद किया जाएगा । 

3. मानव समाज , परिवार में आपसी सहयोग तथा संबंध का आभाव होगा । परिवारिक रिस्तों का कोई अहमियत नहीं होगा , झूठ , बनावट , छल , प्रपंच , इर्ष्या द्वेष से लोगों का मन भरा परा होगा । वाणी में सौम्यता के जगह जहरीले व्यंग होंगे । 

4. मनुष्य का कद काठी बौना होता जाएगा । स्त्री स्त्री से और पुरूष पुरूष से अप्राकृतिक तथा अमर्यादित व्यवहार तथा यौनाचार करेंगे । पुरूष से पुरूषत्व एवं नारी से नारित्व समाप्त हो जाएंगे । वेश्याएं पुजी जाएगीं , उनका मंदिर बनेगा । अंग प्रदर्शन स्टेटस सिंबल बन जाएगा । असली देवी देवताओं का मंदिर खंडित होंगे । जुआ शराब सम्मान का बिषय होगा । मानवीय अंगों का तस्करी तथा व्यापार होगा । 

5. मानवों में आसुरी वृत्ति का लक्षण उत्तरोत्तर दृष्टिगोचर होंगें , जो जितना झूठ बोलेगा , जितना कुकर्म करेगा , अमर्यादित तथा अमानवीय व्यवहार करेगा उसका उतना बड़ा नाम होगा । समाज में पद होगा । 

6. धन के लिए पिता पुत्र का तथा पुत्र पिता का , भाई बहन का तथा बहन भाई का , पति पत्नी का तथा पत्नी पति को धोखा देगा, मर्डर करेगा । एक स्त्री का अनेकों से संबंध होगा उसी प्रकार एक पुरूष का अनेकों से शारीरिक संबंध होगा , यहां तक कि जानवर तक से ।

7. फर्जी साधुओं का लोग चरण चुमेंगे और हाथ कि सफाई बाले बाबाओं के द्वारा दिखलाए गए चमत्कार को नमस्कार करेगे । उनके यहां कड़ोरो कि भीड़ होगी और वास्तविक संतों को शंका के दृष्टि से लोग देखेंगे । वास्तविक संतों का अपमान होगा । शास्त्रों का अपमान होगा और फर्जी तथा बात बनाने बाले साधुओं के यहां , चमत्कार दिखाकर लोगों को ठगने बाले बाबाओं के यहां लोग जाकर खूद को आध्यात्मिक दिखने तथा होने का दावा करेंगे । 

8. हर खाने कि बस्तू दूषित तथा मिलावटी होगा । खान पान जहरीली लेकिन आकर्षक दिखेंगी । नए नए लेकिन जहरीले पकवानों का अविष्कार होगा । अधिकांश लोग मांसाहारी होंगे , मानव का भी मांस पका कर खाएंगे । घरों में रसोई घर तथा स्नान घर नहीं होंगे , भोजन तथा जल के लिए एजेंसी होगी । स्नान के लिए वाशिंग मशीन के तरह वाथ मशीन होगा । 

9. मानव शरीर एक से अधिक रोगो का घर होगा , दवा के नाम पर जहर और बैद् के नाम पर डकैत डाक्टर होगा । 

10. लोगों की याद्दाश्त शक्ति अति अल्प होगी , मनुष्य मनुष्य से दूर तथा जानवरों के साथ एक ही विस्तर पर सोयेगे । 

11. कलयुग में इंसान से इंसानियत गायब होती चली जाएगी , मनुष्य से मानवता समाप्त होती जाएगी लोग वहशी होंगें । साधुओं में साधुता नहीं होगी या दिखावटी होगी । देश धर्म , राष्ट्र धर्म निभाने वालों का आभाव होगा । धर्म , न्याय नीति , नैतिकता पर धन हावी होगा । अधिकतर धार्मिक संस्थानों में धन वाले का सम्मान होगा और निर्धनों का प्रवेश वर्जित होगा । इन्हें भंगी समझा जाएगा । 

12. कलयुग में धर्म कर्म के नाम पर कुकर्म होगा । तीर्थ में व्यभिचार होंगे , यौनाचार होंगे । 

13. निति, नैतिकता न्याय का कोई जगह नहीं होगी । 

14. फुलों से खुशबू , मसालों से उसका स्वाद , औषधी से उसका औषधीय गुण , यानि रोग निरोधक प्रभाव समाप्त होते चला जाएगा । 

15. अनेक नए नए रोग उत्पन्न होगा जो लोगों को काल के मुख में भेजेगा । 

16. खेत से उपजाऊपन , अन्न से अन्नरस , वृक्षों से फल देने कि क्षमता , गाए से दुध, उत्पादन कि क्षमता समाप्त होने लगेगी । 

17. तरह तरह के विध्वंशक विनाशकारी हथियार का निर्माण होगा जो स्वयं के विनाश का कारण होगा । 

18. अति वृष्टि, अनावृष्टि, जलजला , भयानक से भयानक तुफान , भयानक बाढ़ तथा सुनामी जल्द जल्द उत्पन्न होगा । पहाड़ दड़कने लगेगा , वर्फ का पहाड़ तेजी से पिघलने लगेगा । रेगिस्तान का क्षेत्रफल बढ़ने लगेगा । दिन का समय छोटा होगा , रातें बड़ी होंगी । 

19. मशीन में बच्चे पैदा होंगे , गर्भ धारण करना एक इतिहास बन जाएगा । 
विचार विवेक बुद्धि हीन बच्चे पैदा होंगे , उनका दिमाग मशीनी होगा जो भावनात्मक शून्य होंगे , संस्कार , चरित्र आदि शब्द लुप्त हो जाएंगे । बच्चा जो अपने पैर पर खड़े होते ही मां वाप को पशुओं के तरह छोड़ कर अलग हो जाएंगे हमेशा के लिए । 

20. वाइलोजिकल जरूरत जैसे सेक्स , नींद , सांसें तथा भोजन आदि को मशीन से पुरा करेंगे , लोग संवेदनहीन होंगे ।

21. मनोरंजन के विशुद्ध साधन के जगह लोग अमार्यादित नृत्य संगीत , तथा नाटक से अपना रंजन करेंगे । 

22. असली नकली का पहचान लोगों को नहीं होगा । कलयूग का दस हजार सात सौ साल वितने के साथ हीं मानव सभ्यता लुप्त हो जाएगा, पर ग्रही जीवों का आक्रमण होगा , सबकुछ तहस नहस हो जाएगा पृथ्वी पर । पृथ्वी पर केवल भोग योनि के जीव कीट पतंग तथा जानवरों का शासन होगा , सभी अधर्मी मानव जानवर शरीर में जन्म लेंगे कर्म भोग के लिए , ये जानवर कुछ कुछ मनुष्य कि तरह दिखेंगे । पृथ्वी पर जानवरों का शासन चार लाख तिरेपन हजार तीन सौ बर्ष तक रहेगा , उसके बाद पृथ्वी समाप्त । 

23. रिस्तों में वाणी कि मधुरता के जगह कर्कशता का समावेश होगा । दर्पण झूठ बोलेगी । 

24. वेद शास्त्र, असली संत , फल तथा छाया प्रदान करने वाले बृक्ष एवं निर्मल सरिता नदी तालाब लूप्त हो जाएंगे । शास्त्रों को तोड मोड़ कर पेश करेंगे बहुरूपिए पंडित । बड़ी संख्या में ब्राह्मण मांस भक्षि होंगे । चंडाल प्रवचन करेंगे । अधिकतर ब्राह्मण उसका चरण धोकर पिएंगे , उनको अपना आदर्श मानेगें । शास्त्रों के नाम पर चंडाल मिथ्या प्रवचन करेंगे । 

25. लोग या तो जमीन के निचे चुहे कि तरह या गगन चुंबी इमारत में कबुतर के भांति निवास करेंगे और सर्दी एवं गर्मी से उम्र कमतर होगी । शरीर दुर्बल होगी । लोग हवा में उड़ेंगे । 

अंत में ब्रह्मांड कि गति अनियमित तथा अनियंत्रित हो जाएगी एवं एक भयानक विस्फोट होगा ब्रह्मांड में , ग्रह से ग्रह टकराएंगे और सृष्टि का महाप्रलय होगा । 

हां एक बात अवश्य होगी सभी वास्तविक तथा सच्चे धर्मनिष्ठ तथा भगवद् भक्त , वास्तविक संतों में आस्था रखने वाले जीवात्मा अपने ईष्ट और गुरू के लोक में निवास करने चले जाएंगे कल्युग के प्रारंभिक अवस्था में ही , उनको कलयुग के इन तापों से , घटनाओं से मुक्ति पहले ही मिल जाएगी ।
:- सोर्स - पद्म पुराण , गरूड़ पुराण एवं भविष्य पुराण । 
यह सभी बातें सत् प्रतिसत होके रहेगी । कुछ कुछ दिखने भी लगा है आजकल । 
:- संजीव कुमार ।

Wednesday, 6 December 2023

एक व्यक्ति ने पुछा कि भगवान सबके ह्रदय में रहते हैं हमेशा और मरने के बाद हम जहां जहां जाते हैं जिस योनि में जाते हैं , या स्वर्ग में जाते हैं या नरक में जाते हैं तो वो भी तो हमारे साथ साथ जाते हैं अतः उनको भी तो हमारे साथ सुख दुख झेलना पड़ता है, चाहे वो स्वर्ग का सुख हो या नरक का ?

एक व्यक्ति ने पुछा कि भगवान सबके ह्रदय में रहते हैं हमेशा और मरने के बाद हम जहां जहां जाते हैं जिस योनि में जाते हैं , या स्वर्ग में जाते हैं या नरक में जाते हैं तो वो भी तो हमारे साथ साथ जाते हैं अतः उनको भी तो हमारे साथ सुख दुख झेलना पड़ता है, चाहे वो स्वर्ग का सुख हो या नरक का ? 

उत्तर :- हां ये सत्य है कि भगवान हर जगह , हर योनि में , हर शरीर में हमारे साथ साथ जाते हैं , हमारे साथ साथ रहते हैं, यहां तक कि स्वर्ग हो या नरक , सभी जगह वो जीवात्मा के साथ साथ जाते हैं तथा हर क्षण रहते हैं । लेकिन वो सुख दुख नहीं भोगते ,‌वो भोगवाते है । माईक सुख दुख हमें भोगवाते है फल देकर ।

कर्ता हम है अपने कर्मो का और भगवान नोट कर्ता है हमारे कर्म का और फल दाता हैं 
वो हमारे कर्म का जिम्मेदार नहीं हैं , हम जैसा संकल्प करते हैं और फिर जो कर्म करते हैं ,उसको वो नोट करके फल देते हैं सिर्फ , वो हमारे कर्म का भोग फल नहीं भोगते साथ रहने के बाबजूद भी । 
वो तो आनंद है , सदा आनंद में रहते हैं और सभी जीवात्मा के साथ साथ रहते हैं हमेशा लेकिन अपने अहंकारवश , देहाभिमान के कारण अपने कर्म का कर्ता हम स्वयं है , साथ रहने के बाबजूद भी उनसे हमारा मन का कनेक्शन नहीं है , हमारे मन का कनेक्शन हमारे देह , हमारे देह के रिश्तेदारों और संसार से है , इसलिए हम मायाबद्ध जीवों का कर्ता वो नहीं है , इसलिए हमारे कर्म के अनुरूप वो फल देते हैं और भोगवाते है इसी संसार में , स्वर्ग में या नरक में भी । 

हां महापुरुषों के अंदर भी वो हैं लेकिन महापुरुषों का आत्मा और मन का पुरा कनेक्शन भगवान के साथ है हर क्षण है । संतों एवं महापुरुषों के आत्मा और मन अपने अंदर बैठे भगवान के साथ अटैच है,‌वो संसार में रहते हुए भी संसार , देह और देह के रिश्तेदार और कर्म से डिटैच्ड है और हर क्षण भगवान से अटैच्ड है इसलिए उनके सभी कर्म का कर्ता भगवान है , अत: जब उनके सभी कर्मों का कर्ता भगवान हैं तो फिर उनके कर्मों को नोट करने और फल देने का सवाल ही‌ नही‌ उत्पन्न होता । 

इसलिए तुलसीदास जी ने संतों और महापुरुषों के बिषय में कहा है कि :- 

"होईहैं वही जो राम रची रखा , को करि तर्क बढ़ाबहि साखा "

यानि महापुरुषों के सभी कर्म , संकल्प , कर्म का डिसीजन भगवान के हाथ में है, इसलिए महापुरूषों को अपने कर्म का चिंता नहीं रहता कभी । महापुरुषों के लिए कर्म का चुनाव, कर्म करना सब भगवान हीं रचते हैं करते हैं । महापुरुषों को कर्म से कोई मतलव नहीं और न कर्म कि चिंता होती है । 

इसलिए महापुरूषों के लिए उन्होंने फिर कहा है :- तुलसी भरोसे राम के निर्भय होके सोये' ।
महापुरूष को कोई भय नहीं , न कर्म कि चिंता और न फल की इच्छा , इसलिए तुलसी सरिखे महापुरूष ही निर्भय होके सोने का अधिकारी है , हमारे जैसे माया बद्ध जीव नहीं , जीवात्मा जब तक संसार और अपने देह से अटैच्ड है तब तक उसको कर्म तथा कर्म फल का भय रहेगा , वो भयभीत रहेगा ही । 

मायाबद्ध निर्भय होके नहीं सो सकता क्योंकि वो आनंद में नहीं है, भगवान से मन अटैच नहीं ,‌वो इस मृत्युलोक के समस्त माया जनित रोगों के भोगों से कर्मफल के रूप में प्राप्त संसारिक सुख दुख के भय भयभीत रहेगा , रहना पड़ेगा, कोई बच नहीं सकता चाहे वो पृथ्वी का सम्राट या मायाबद्ध स्वर्ग का भी सम्राट क्यों न हो , सब मायाबद्ध अपने अपने कर्मों के रिश्क पर है। अगर कोई मायाबद्ध जीव , चाहे वो पृथ्वी का सम्राट क्यों न हो , या भारी क्रिमिनल क्यों न हो कहता है कि मैं निर्भय हुं , निडर हुं तो वो मुर्ख है , उसे नहीं पता कि वो उदंड है , निडर नहीं , संसार में जिसके पास जितना अधिक संसारिक वैभव है वो उतना भयभीत हैं उसे वैभव खोने का डर सबसे अधिक है अपेक्षाकृत उसके , जिसके पास कुछ नहीं , जो रोड पर सोता है । 

"भोगे रोगभयं कुले च्युतिभयं वित्ते नृपालाद्भयं ।
माने दैन्यभयम्, बले रिपुभयम्, रूपे जराया भयम् ।
शास्त्रे वादिभयम्, गुणे कलभयम्, काये कृतान्ताद्भयंसर्वं वस्तु भयान्वितं भुवि नृणां वैराग्यमेवाभयम् ॥ 
संसार में समस्त दुखों तथा भय का एक मात्र कारण जीवों का संसार से मोह है , अटैचमेंट है । "(Bhartrihari from the Vairagya shatakam)

जो जितना संसार से अटैच्ड है वो उतना भयग्रस्त है , चिंताग्रस्त हैं , परेशान हैं , दुखी है , और रहेगा । और जो जितना, जिस मात्रा में संसार से डिटैच्ड है तथा भगवान से अटैच्ड है वो उसी मात्रा में आनंदित है , भय रहित है , चिंता रहित है , दुख रहित है और रहेगा , सीधा सा हिसाब है । 

ये महापुरुषों के द्वारा जो कहा गया है कि -
 "चाह गई चिंता मिटी, मनवा बेपरवाह' 
जाके कछु नहीं चाहिए, वे साहन के साह” 

ये सब भगवद् प्राप्त महापुरुषों के लिए है कहा गया है , यह मायाबद्ध मनुष्य के लिए अप्लीकेबल नहीं है , भ्रम में न रहें । मायाबद्ध कभी वेपरवाह हो ही नहीं सकता , न चाह यानि कामना मिट सकती है और न चिंता मिट सकती है । 

इसलिए तुलसीदास जी ने हम मायाबद्ध जीवों तथा संसार के लिए फिर कहा है कि :- 

कर्म प्रधान विश्व करि राखा , जो जस करही सो तस फल चाखा । 

यह श्लोक हम मायाबद्ध जीवों के लिए अप्लीकेबल है । 
मायाबद्ध जीव जैसा संकल्प करता है ,जैसा कर्म करता है भगवान नोट करके फल देते हैं और फिर भोगवाते भी है , कोई बच नहीं सकता है ।

वहीं वो महापुरुषों के सभी कर्म को स्वयं करते हैं , महापुरूष हमेशा भगवान यानि आनंद में रहते हैं , संसार में रहते हुए भी संसार से डिटैच्ड और भगवान से 100% अटैच्ड रहते हैं । 
संसार में उनके द्वारा जो भी कर्म होता या किया हुआ दिखाई पड़ता है हम साधारण जीवों को , वो भगवान के द्वारा किया जाता है , महापुरुषों के द्वारा नहीं । 
यही अंतर है । :- श्री महाराज जी द्वारा दिए गए तत्वज्ञान के आधार पर । श्री राधे ।

Tuesday, 5 December 2023

हार-जीत, सफलता-असफलता , हानी-लाभ,जीवन-मरण,यश-अपयश, सुख-दुख सब बिधि हाथ यानि भगवान के हाथ में है तो फिर मनुष्य के हाथ में क्या है ?

प्रश्न :- हार-जीत, सफलता-असफलता , हानी-लाभ,जीवन-मरण,यश-अपयश, सुख-दुख सब बिधि हाथ यानि भगवान के हाथ में है तो फिर मनुष्य के हाथ में क्या है ? 

उत्तर :- कर्म , मनुष्य केवल कर्म करने का अधिकारी है, इच्छित फल की प्राप्ति मनुष्य के हाथ में नहीं है । 
भगवान ने मनुष्य को केवल तीन बिषय में स्वतंत्रता प्रदान किए हैं यानि तीन अधिकार दिए हैं सृष्टि के समय और इसमें वो कभी हस्तक्षेप नहीं करते । वो तीनों निम्नलिखित हैं :- 

1.कर्म के चुनाव का अधिकार-मनुष्य को कर्म  चुनाव करने का अधिकारी है । वो चाहे अच्छे कर्म का चुनाव करें या बुरे कर्म का चुनाव करें , यह मनुष्य के अपने हाथ में है। 

2. चुनें हुए कर्म को करने का संकल्प , यानि कर्म का प्रयोजन का अधिकार तथा कर्म करने का नियत तथा निति का अधिकार - भगवान ने मनुष्य को दुसरा अधिकार दिया है उसके चुने हुए कर्म को करने का संकल्प करने का अधिकार, इसमें भी भगवान कभी हस्तक्षेप नहीं करते । अच्छा नियत है , अच्छा नियत से कर्म करने का संकल्प किया गया है मनुष्य के द्वारा तो अच्छा फल भगवान देते हैं , बुरा कर्म किया तो बुरा फल मिलता है । 

3. तीसरा और अंतिम अधिकार मनुष्य को भगवान से मिला है वो है कर्म करने कि शक्ति, बुद्धि, बल तथा क्षमता । 

लेकिन फल के चुनाव का अधिकार मनुष्य को नहीं है । कर्म के चुनाव , संकल्प और कर्म करने के बाद कर्म के अनुरूप तथा प्रारब्ध के मिश्रण के अनुसार भगवान फल देते हैं । यही फल हार-जीत, सफलता-असफलता , हानी-लाभ,जीवन-मरण,यश-अपयश, दुख-सुख , के रूप में प्रत्येक मनुष्य को मिलता है । और भोगना पड़ता है उसे क्योंकि भोगने के चुनाव का अधिकार मनुष्य को नहीं है । जो कर्म फल भगवान के द्वारा मिला है उससे कोई बच नहीं सकता । 

"कृतितव्य: भोगतव्यं," कर्म फल भोगना ही पड़ेगा । 
 'जस करनी तस भोगहु ताता, 
चाहे वो कितना बड़ा राजा क्यूं न हो । 

सार यह कि मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र है तो भगवान फल देने में स्वतंत्र है लेकिन मनुष्य कर्म फल भोगने में स्वतंत्र नहीं हैं । फल भोगना ही पड़ेगा । कर्म फल किसी का पीछा नहीं छोड़ती । 

भगवान ने गीता में स्पष्ट रूप से कहा है कि :- 
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।2.47।। गीता । 
:- श्री महाराज जी द्वारा "कर्म तथा भोग सिद्धांत पर दिए गए प्रवचन का सार ।

क्या उत्सव मनाने से आध्यात्मिक लाभ है

प्रश्न :- क्या उत्सव मनाने से आध्यात्मिक लाभ है ? 
उत्तर :- अगर उत्सव के पीछे के मूल सिद्धांतों को जानने तथा अपने जीवन में लागु करने से हम वंचित हैं तो चाहे जितना उत्सव मनाया जाए , सब लोक रंजन है , मनोरंजन है , उसका कोई आध्यात्मिक लाभ नहीं है ।
 हम महापुरुषों का प्राकट्य उत्सव मनाते हैं , पुण्य तिथि मनाते हैं , होली , दिवाली , दुर्गा पुजा , छठ , गुरू पूर्णिमा, शरद पुर्णिमा, रामनवमी , जन्माष्टमी, राधाष्टमी, शिवरात्रि, हनुमान जयंती, ये दिवस , वो दिवस ,  प्रकाशोत्सव आदि कोई भी उत्सव मनाते हैं लेकिन इन उत्सवों के पीछे का सिद्धांत ज्ञान , तत्वज्ञान आदि को नहीं जानते , उसमें दिलचस्पी नहीं है , उसको व्यवहार में लाने का प्रयास नहीं है , हरि और गुरू से अटैचमेंट न हो , प्रेम न हो तो सिर्फ उत्सव चाहे कितना मना ले , यह केवल अपने मनोरंजन मात्र के लिए है इसका कोई लाभ मिलने वाला नहीं है । 
महापुरुषों के मूर्ति को या भगवान के मूर्ति को स्थापित करके , उन पर फुल , माला चढ़ाना , बैंड बजाना , आरती करना, उछलना , कुदना नाचना , गाना  तब तक सार्थक नहीं जब तक उनके बतलाए मार्गों पर चलने में दिलचस्पी न हो ।

यह तो ऐसा ही हुआ कि एक व्यक्ति अपने पिता के मुर्ति या फोटो को सोने में मढ़वा कर प्रति दिन फुल चढ़ाए , पुजा करें , उनका जन्मदिन पर उत्सव करें , भोज का आयोजन करें , लेकिन पिता के बतलाए मार्ग को न अपनाएं , उनके आदेशों का पालन न करें , उसके सिद्धांतों कि अवहेलना करें । 
भला कौन ऐसा पिता खुश होगा जिसका संतान धूमधाम से उनका जन्म दिन मनाए लेकिन पिता के आदेशों के विपरित चले , आदेशों के खिलाफ काम करें , उनके अपेक्षा पर खड़ा न उतरे । 
संसार में भी कोई माता पिता इन बातों से खुश नहीं हो सकता कभी । 
तो भला भगवान और गुरू कैसे खुश होंगे  उनका शिष्य गुरू पूर्णिमा मनाए , उनका जन्मोत्सव मनाए , नाचे कुदे , उछले गाए , उत्सव मनाए लेकिन उनके सिद्धांतों से दुर रहे , बतलाए मार्गों का अबलंब न लें । 
तो ऐसे पुजा , आरती , उत्सव से कोई लाभ नहीं । 
गुरू और भगवान को सुख तो तब मिलता है जब कोई शिष्य या अनुयायी उनके सिद्धांतों का पालन करता है , उनके बतलाए मार्गों पर चलने का प्रयास ह्रदय से करता है । तभी कृपा होती है , तभी उत्सव का फल मिलता है । तभी उत्सव सार्थक होता है । 
श्री राधे ।

भगवद् कृपा का पैमाना :

भगवद् कृपा का पैमाना :- 
वास्तविक महापुरुषों से मिलन के बाद अगर किसी को और अधिक संसार मिल रहा है और वो इसको भगवद् कृपा समझ रहा है, गुरू कि कृपा मानता है तो यह एक बहुत बड़ी अज्ञानता तथा भ्रम है, गलत धारणा है । 
क्योंकि श्री कृपालु जी महाप्रभु ने शास्त्रीय सिद्धांतों को समझाते हुए हमें बतलाया है कि भौतिक बस्तूएं यानि संसार का समान तो जीव को अपने पुर्व जन्म में किए कर्म यानि प्रारब्ध, भाग्य एवं इस जीवन में किए जा रहे क्रियामान कर्मों से मिलता है कर्म फल के रूप में । 
भगवद् कृपा , महापुरुषों की कृपा , भगवान की असली कृपा तो तब मानना चाहिए जब अनुभव में आए कि गुरू कृपा से हमारी संसारिक कामनाएं कितनी कम हुई है , या धीरे धीरे समाप्त हो रही है । 
संसार से अटैचमेंट कितना समाप्त हुआ, कम हुआ और भगवान से , गुरू से कितना प्रेम बढ़ा यह असली पैमाना है कृपा को मापने का । जिस मात्रा में गुरू निर्दिष्ट हमारी साधना होगी , सिद्धांतों का श्रवन होगा , चिंतन होगा , उसको व्यवहार में लाने का प्रयास होगा उतना लाभ होगा , उतनी कृपा बढ़ेगी , उतना आनंद मिलेगा , अशांति समाप्त होगी तथा जीवन में सकुन , आनंद बढ़ेगा ।। 
अगर संसार अधिक मिलने लगा और इसी को हम कृपा मान रहे हैं तो इसका मतलव संसार से हमारा अटैचमेंट बढ़ गया है । और यह तो बड़ा भारी अध्यात्मिक नुकसान है । यह कृपा नहीं है । जितना आज अधिक संसार मिलेगा , भौतिक संपत्ति मिलेगी , कल के लिए वही दुख का कारण बनने बाला है निश्चित रूप से । क्योंकि भौतिक सामान अस्थाई होता है , आज धन है, रूप है योवन है , पद् है, प्रतिष्ठा है , यश है , हर तरफ से सम्मान मिल रहा है, भौतिक साधन है , भौतिक सुख मिल रहा है कल जब नहीं होगा तब पता चलेगा , तब बहुत दुख होगा । संसारिक सुख आज जिसके पास है कल नहीं रहने वाला , उसी प्रकार संसारिक दुख भी आज जिसके पास है कल नहीं रहने वाला , यह परिवर्तनशील है, अस्थाई है । अत: जो भौतिक बस्तुओं कि प्राप्ति , पद प्रतिष्ठा, पोजिशन को भगवान या गुरू कि कृपा मानता है उससे बड़ा मुर्ख दुनिया में कोई नहीं । 
भगवद् कृपा से तो भगवदिए सुख , आनंद मिलता है जो स्थाई है तथा प्रतिपल बढ़ने वाला होता है । और संसार अधिक मिलने लगा एवं उसमें अटैचमेंट बढ़ने लगा तो समझ लीजिए हम आप बड़े खतरे में है , अधिक संसार पाकर जितना आपको खुशी मिल रहा है , निश्चित हम आप कल उतना अधिक दुख पाने वाले हैं । अत: सावधान ।
श्री महाराज जी का सिद्धांत है कि संसार से जिस मात्रा में अटैचमेंट कम होता है उसी मात्रा में भगवान से , महापुरुष से प्रेम बढ़ता है , अत: भगवान और गुरू से प्रेम का बढ़ना कृपा है । 
संसार अधिक मिलना कृपा नहीं है यह खतरा है , आने वाला भावी दुख का संकेत है । :- हमारे गुरूदेव श्री महाराज जी से प्राप्त सिद्धांत ज्ञान । 
श्री राधे ।

Monday, 4 December 2023

इस कलयुग में संसार में सभी माया बद्ध मनुष्य के स्वयं के स्थिति के बारे में ठीक से पता नहीं है कि उसके स्वयं का अंत:करण कितना गंदा है ईर्ष्या द्वेष छल कपट , काम क्रोध भरा परा है हर किसी में, चाहे वो कितना भी बड़ा संसारिक ज्ञानी या पंडित क्यों न हो ?

संसार में जब एक मनुष्य दुसरे मनुष्य के भेष भूषा बाहरी स्थिति तथा व्यवहार को देखकर उसके अंदर के अंत:करण को ठीक ठीक नहीं जान सकता तो भला वो किसी वास्तविक महापुरुष को, संत को कैसे जान सकता है या समझ सकता है अपने सीमित बुद्धि से ? महापुरुषों के व्यवहार तो और भी अटपटे होते हैं बाहर से । साधारण जीव कोई अंतर्यामी है जो वो किसी के बाहरी भेष भूषा तथा व्यवहार से उसके अंदर की स्थिति जान ले ?

 इस कलयुग में संसार में सभी माया बद्ध मनुष्य के स्वयं के स्थिति के बारे में ठीक से पता नहीं है कि उसके स्वयं का अंत:करण कितना गंदा है ईर्ष्या द्वेष छल कपट , काम क्रोध भरा परा है हर किसी में, चाहे वो कितना भी बड़ा संसारिक ज्ञानी या पंडित क्यों न हो ? वो भला दुसरे को क्या सर्टिफिकेट देगा ? अगर कोई ऐसा करता है तो समझ लेना चाहिए कि उसके स्वयं का गंदा चित्त चरित्र दुसरे के आईने में प्रतिबिंबित होता है। दुसरे का दोष देखना , उसको गनना ये सिद्ध करता है कि वो स्वयं उतना हीं बड़ा दोषी है जितना दोष उसको दुसरे में दिखाई देता है । बड़ा गंदा है उसका अंत:करण । 

"अत: जब तुम्हारा अपने गुरू के उपर दृढ़ विश्वास है, पुर्ण श्रद्धा है, समर्पण है , हर क्षण सेवा की भावना है, अनन्यता है तो फिर दुसरा तुम्हारे और तुम्हारे गुरू के बारे में क्या कहता है इसकी चिंता तुम्हें कभी नहीं करना चाहिए। न उससे तुम्हें उलझना चाहिए और न विचलित होना चाहिए। 

हमेशा यह सोचना चाहिए कि कलयुग तो क्या जब त्रेता में भगवान श्री राम कि भी आलोचना करने वाला अज्ञानी एवं अहंकारी जीव था , जब द्वापर में भगवान श्री कृष्ण को भी भला बुरा कहने और उनके बारे में गलत-सलत बोलने वाला नादान अधम जीव था तो भला आज इस भ्रष्टयुग के भटके हुए जीव वास्तविक महापुरुष को भला कैसे समझ सकता हैं । " :- पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी । 

गोस्वामी जी कहते है :- 
जाने बिनु न होई परतीति, बिनु प्रतीति होइ नही प्रीति। 
प्रीति बिना न भक्ति दृढ़ाई, जिमि खग पति जल के चिकनाही।। 

अर्थात ईश्वर को जाने बिना हमारे भीतर विश्वास नही आ सकता है, और विश्वास के बिना प्रेम प्रकट नही हो सकता है। प्रेम व विश्वास के बगैर भक्ति दृढ़ नही हो सकती है। 
इसलिए अगर कोई अधम जीव किसी भी वास्तविक महापुरुषों के बारे गलत बातें करता है तो मान लिजिए वो भगवान के कृपा से वंचित हैं । इसलिए बेचारा ऐसी गंदी बातें सोचता है ,बोलता है और दुसरे से करता है । 

"जाकि रही भावना जैसी, प्रभु मुरत देखी तीन तैसी "

जिसकी जैसी भावना है , जितना अंत:करण गंदा है , जितना चरित्र गंदा है वो तो उसी भावना से भगवान और भगवद् महापुरूष के बारे में अनुमान लगाता है , गंदी बातें बोलता है और दुसरे गंदे लोग उससे सुनके पतियाते है । इसमें कोई आश्चर्य नहीं । यह समझना चाहिए कि महापुरुषों के बारे में गलत बोलने वाला और सुनने वाला , तथा पतियाने वाला जीव अपने पतन की ओर, विनाश कि ओर हीं स्वयं अग्रसर है । 
श्री राधे ।