अरे आपको तो कहना चाहिए मैं अपने मन का बड़ा भारी गुलाम हूं , मर्जी का गुलाम हूं , संसारिक बिषय भोग और कामनाओं का गुलाम हूं, मेरा मन जैसे जैसे नचाता है वैसे वैसे मैं नाचता हूं ।
यदि अपने मन का मालिक होते, तो हम महापुरूष होते! मन को अपने इशारों पर नचाते , नाचते नहीं मन के इशारों पर ।
यही मन तो अनंतानंत जन्म बर्बाद कर दिया और अभी भी हम अपने इसी मन का गुलामी कर रहे है ?
शास्त्र कहता है :-
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः|
बन्धाय विषयासंगो मुक्त्यै निर्विषयं मनः || :- ब्रह्मबिंदूउपनिषद ।
“मन ही मनुष्य के बन्धन और मोक्ष का कारण है | इन्द्रियादिक विषयों में रत्त मन चौरासी लाख योनियों में आवागमन का कारण है और विषयों से विरक्त मन मोक्ष का भी कारण है |” मन ही हमें महान बना सकता है , महापुरूष बना सकता है और यही मन हमें राक्षस भी बना देता है ।
:- पूज्यनीयां रासेश्वरी देवी जी ।
No comments:
Post a Comment