Wednesday, 27 December 2023

मन का मालिक या मन का गुलाम है हम ?

संसार में लोग बड़े शान से कहते हैं - मैं अपने मन का मालिक हूं ! सुनो सबकी करो अपने मन की , मैं अपने मर्जी का मालिक हूं , मेरा मन जो कहता है वहीं मैं करता हूं आदि आदि । 
अरे आपको तो कहना चाहिए मैं अपने मन का बड़ा भारी गुलाम हूं , मर्जी का गुलाम हूं , संसारिक बिषय भोग और कामनाओं का गुलाम हूं, मेरा मन जैसे जैसे नचाता है वैसे वैसे मैं नाचता हूं । 

 यदि अपने मन का मालिक होते, तो हम महापुरूष होते! मन को अपने इशारों पर नचाते , नाचते नहीं मन के इशारों पर । 

यही मन तो अनंतानंत जन्म बर्बाद कर दिया और अभी भी हम अपने इसी मन का गुलामी कर रहे है ? 

शास्त्र कहता है :- 
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः|
बन्धाय विषयासंगो मुक्त्यै निर्विषयं मनः || :- ब्रह्मबिंदूउपनिषद ।

“मन ही मनुष्य के बन्धन और मोक्ष का कारण है | इन्द्रियादिक विषयों में रत्त मन चौरासी लाख योनियों में आवागमन का कारण है और विषयों से विरक्त मन मोक्ष का भी कारण है |” मन ही हमें महान बना सकता है , महापुरूष बना सकता है और यही मन हमें राक्षस भी बना देता है । 
:- पूज्यनीयां रासेश्वरी देवी जी ।

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