तदपि संत मुनि बेद पुराना। जस कछु कहहिं स्वमति अनुमाना॥2॥
राम सरूप तुम्हार, वचन अगोचर बुद्धि पर।
अविगत अकथ अपार, नेति-नेति नित निगम कह॥126।।
सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥
तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन॥2॥
भगवान शंकर कह रहे हैं :- हे राम आपको कोई भी अपनी मन, बुद्धि, ज्ञान बल से नही जान सकता , बड़े बड़े ऋषि मुनि आपको नहीं जान पाए , स्वयं मैं , ब्रह्मा और विष्णु भी अपने बल से आपको नहीं जान पाए ! केवल अनुमान लगाते हैं आपके स्वरूप के बारे में और अपने ही अनुमान के आधार पर बड़े बड़े ऋषि महर्षि यहां तक कि वेद पुराण आपका बखान करते हैं ।
हे राम ! आपका स्वरूप मन बुद्धि वाणी से परे है। इसलिए आपके स्वरूप को न कोई जान पाया है, न बखान कर सकता है, न उसका पार ही पा सकता है। इसलिए वेद सदा 'नेति-नेति' कहकर आपका वर्णन करते हैं। हे राम आपको कोई भी जीव किसी भी साधन से नहीं जान सकता है ।
हे राम लेकिन वो भाग्यशाली जीव आपको जान सकता है, जिसे आप स्वयं अपने अहेतु कि कृपा से जना देते हैं , फिर वो आपको जानते ही आपका ही बन जाता है सदा के लिए, आपके स्वरूप शक्ति से परिपूर्ण हो जाता है । हे रघुनंदन! हे भक्तों के हृदय को शीतल करने वाले चंदन! आपकी ही कृपा से जीव आपको जान पाते हैं॥ :- श्री महाराज जी ।।
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