Saturday, 30 December 2023

भगवान के कृपा के बिना कोई उनको जान नहीं सकता ।

राम अतर्क्य बुद्धि मन बानी। मत हमार अस सुनहि सयानी॥
तदपि संत मुनि बेद पुराना। जस कछु कहहिं स्वमति अनुमाना॥2॥

राम सरूप तुम्हार, वचन अगोचर बुद्धि पर। 
अविगत अकथ अपार, नेति-नेति नित निगम कह॥126।।

सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥
तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन॥2॥

भगवान शंकर कह रहे हैं :- हे राम आपको कोई भी अपनी मन, बुद्धि, ज्ञान बल से नही जान सकता , बड़े बड़े ऋषि मुनि आपको नहीं जान पाए , स्वयं मैं , ब्रह्मा और विष्णु भी अपने बल से आपको नहीं जान पाए ! केवल अनुमान लगाते हैं आपके स्वरूप के बारे में और अपने ही अनुमान के आधार पर बड़े बड़े ऋषि महर्षि यहां तक कि वेद पुराण आपका बखान करते हैं । 

हे राम ! आपका स्वरूप मन बुद्धि वाणी से परे है। इसलिए आपके स्वरूप को न कोई जान पाया है, न बखान कर सकता है, न उसका पार ही पा सकता है। इसलिए वेद सदा 'नेति-नेति' कहकर आपका वर्णन करते हैं। हे राम आपको कोई भी जीव किसी भी साधन से नहीं जान सकता है ।
हे राम लेकिन वो भाग्यशाली जीव आपको जान सकता है, जिसे आप स्वयं अपने अहेतु कि कृपा से जना देते हैं , फिर वो आपको जानते ही आपका ही बन जाता है सदा के लिए, आपके स्वरूप शक्ति से परिपूर्ण हो जाता है । हे रघुनंदन! हे भक्तों के हृदय को शीतल करने वाले चंदन! आपकी ही कृपा से जीव आपको जान पाते हैं॥ :- श्री महाराज जी ।।

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