Monday, 18 December 2023

भगवान की उपासना-अराधना हेतु भला गुरु की क्या आवश्यकता है ? भगवान तो सर्वज्ञ, सार्वभौम और सर्वसमर्थ है । ऐसे में गुरु की क्या जरुरत है ? क्यों लोग गुुरु के चक्कर में पड़ते है ?

अकसर ही यह सुनने को मिलता है कि भगवान की उपासना-अराधना हेतु भला गुरु की क्या आवश्यकता है ? भगवान तो सर्वज्ञ, सार्वभौम और सर्वसमर्थ है । ऐसे में गुरु की क्या जरुरत है ? क्यों लोग गुुरु के चक्कर में पड़ते है ? हम ह्रदय से प्रभु को पुकारें , तो हमारा काम बन जाएगा । पर धारणा विल्कुल गलत है । भगवत्मार्ग की ओर यदि कोई उन्मुख होना चाहता है, तो उसे मार्गदर्शन की परम आवश्यकता है। संसार में भी जन्म से लेकर मृत्यु तक हमारे प्रत्येक कर्म-ज्ञान का स्त्रोत कहीं और विद्यमान है । जब संसार में हम बिना मार्गदर्शन के आज तक कुछ न कर सके तो अज्ञेय भगवान को अपने बल पर बिना मार्गदर्शन के प्राप्त करने की बात कहना क्या अपने आपको धोखा देना नहीं है ? 
अत: भगवत्पिपासुजन गुरु के महात्म को अपने ह्रदय में धारण करें, वरना इसके बिना आपका सारा प्रयत्न पानी को हाथ की लकीर से विभक्त करने जैसा ही होगा ।
जैसे भगवान् सनातन है, जीव की भगवत्पिपासा सनातन है, उसी प्रकार भगवत्प्राप्ति के एकमात्र आधार गुरु और उनका महत्त्व सनातन है । ध्रुव सत्य है ।

तमिद् गुरुं प्रपद्येत जिज्ञासु: श्रेय उत्तमम् ।
शाब्दे परे च निष्णातं ब्रह्मण्युपशमाश्रयम् ।।
 (भाग. ११-३-२१)

अर्थात् शाश्वत कल्याण को जानने के इच्छुक व्यक्ति को भक्ति शास्त्र में अर्थात् भगवद् विषयक श्रावणकीर्त्तनादि विषयों में पारदर्शी भगवत्-निष्ठ श्रीगुरु की शरण लेनी चाहिए । उन श्रीगुरुदेव को अपना हितकारी, परम बांधव तथा परमाराध्य श्रीहरि रुप जानना चाहिए । और निरंतर निष्कपट भाव से उनकी सेवा करनी चाहिए । उनके अनुगत होकर साधन विधान करना चाहिए , जिससे आत्मप्रद अर्थात् अपने तक को प्रद करने वाले भक्तवत्सल श्रीभगवान् संतुष्ट होते हैं । :- मां

No comments:

Post a Comment