अत: भगवत्पिपासुजन गुरु के महात्म को अपने ह्रदय में धारण करें, वरना इसके बिना आपका सारा प्रयत्न पानी को हाथ की लकीर से विभक्त करने जैसा ही होगा ।
जैसे भगवान् सनातन है, जीव की भगवत्पिपासा सनातन है, उसी प्रकार भगवत्प्राप्ति के एकमात्र आधार गुरु और उनका महत्त्व सनातन है । ध्रुव सत्य है ।
तमिद् गुरुं प्रपद्येत जिज्ञासु: श्रेय उत्तमम् ।
शाब्दे परे च निष्णातं ब्रह्मण्युपशमाश्रयम् ।।
(भाग. ११-३-२१)
अर्थात् शाश्वत कल्याण को जानने के इच्छुक व्यक्ति को भक्ति शास्त्र में अर्थात् भगवद् विषयक श्रावणकीर्त्तनादि विषयों में पारदर्शी भगवत्-निष्ठ श्रीगुरु की शरण लेनी चाहिए । उन श्रीगुरुदेव को अपना हितकारी, परम बांधव तथा परमाराध्य श्रीहरि रुप जानना चाहिए । और निरंतर निष्कपट भाव से उनकी सेवा करनी चाहिए । उनके अनुगत होकर साधन विधान करना चाहिए , जिससे आत्मप्रद अर्थात् अपने तक को प्रद करने वाले भक्तवत्सल श्रीभगवान् संतुष्ट होते हैं । :- मां
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