अत: मन के गुलाम जीवात्मा को यानि मन की शरणागति करने वाले को , दुसरे शब्दों में भगवान कि दासता के जगह पर माया के पुत्र मन का गुलामी करने वाले को भगवान नहीं मिलते ।
हरि गुरू के शरणागत जीव को भगवान मिलते हैं । सजातीय होने के कारण माया के पुत्र मन को माया कि हीं गुलामी भाती है । इसलिए मन बार-बार संसार में हीं भागता है । मन का गुलाम जीवात्मा हरि और गुरू का शरणागत नहीं हो सकता ।
शास्त्रीय सिद्धांत कहता है कि हम जिसकी शरणागति करेंगे , स्वाभाविक है हमें उसी कि संपत्ति तथा गुण मिलेंगे । अत: माया के गुलाम जीवात्मा को , माया के भक्त जीव को माया कि हीं संपत्ति तथा गुण मिलता है । माया का गुण है संसार के बिषय बस्तुओं से राग-द्वेष, काम क्रोध घृणा आदि और परिणाम में अल्पकालिक क्षणभंगुर इन्द्रियादिक सुख तथा अंततः दुख एवं चौड़ासी लाख योनियों में भटकने का पीड़ा ।
भगवान कि संपत्ति है दैविक गुण और परिणाम में चौड़ासी लाख के चक्कर से सदा के लिए छुटकारा तथा अनंत काल एवं अनंत मात्रा का सुख और आनंद ।
भगवान की संपत्ति पाने के लिए , भगवान को पाना होगा ।
और भगवान को पाने के लिए हमे मन की गुलामी छोड़ कर मन से हरि और गुरू की पूर्ण शरणागती करनी होगी । दुसरा कोई उपाय नहीं है । :- श्री महाराज जी द्वारा दिया गया तत्वज्ञान पूज्यनीयां रासेश्वरी देवी जी के शब्दों में ।
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