वैराग्य शतकम से -
एक दुखित बूढ़ा सेठ
————————–
एक वैश्य ने उम्र भर मर-पचकर खूब धन जमा किया । बुढ़ापे में पुत्रों ने सारे धन पर अधिकार कर बूढ़े को पौली में एक टूटी सी खाट और फटी सी गुदड़ी पर डाल दिया और कुत्ता मारने के लिए हाथ में लकड़ी दे दी । सुबह शाम घर का कोई आदमी बचा-खुचा, बासी-कूसी उसे खाने को दे जाता । सेठ बड़े दुःख से अपना जीवन जीता था । पुत्र-वधुएं दिन भर कहा करती थी – “यह मर नहीं जाते, सबको मौत आती है पर इनको नहीं आती। दिन भर पौली में थूक-थूक कर मैला करते हैं ।” एक दिन एक पोता उन्हें पीट रहा था । इतने में नारद जी आ निकले उन्होंने सारा हाल देखकर कहा – “सेठजी ! आप बड़े दुखी हैं । स्वर्ग में कुछ आदमियों की आवश्यकता है । अगर तुम चलो तो हम ले चलें ।” सुनते ही सेठ ने कहा – “जा रे वैरागीड़ा ! मेरे बेटे पोते मुझे मारते हैं चाहे गाली देते हैं, तुझे क्या ? तू क्या हमारा पञ्च है ? मैं इन्हीं में सुखी हूँ । मुझे स्वर्ग की आवश्यकता नहीं ।” सेठ की बातें सुनकर नारद जी को बड़ा आश्चर्य हुआ । कहने लगे – “ओह ! संसार सचमुच ही मोह-पाश में फंसा है । मोह की मदिरा के मारे इसे होश नहीं । मनुष्य ने कब्र में पैर लटका रखे हैं; फिर भी विषयों में ही उसका मन लगा है ।
गतं तत्तारुण्यं तरुणिहृदयानन्दजनकं
विशीर्णा दन्तालिर्निजगतिरहो यैष्टिशरणां ।
जड़ी भूता दृष्टिः श्रवणरहितं कर्णयुगलं
मनोमे निर्लज्जं तदपि विषयेभ्यः स्पृहयति ।।
तरुणियों के ह्रदय में आनन्द पैदा करने वाली जवानी चली गयी है, दन्तपंक्ति गिर गयी है, लकड़ी का सहारा लेकर चलता हूँ, नेत्र ज्योति मारी गयी है, दोनों कानों से सुनाई नहीं देता, तो भी मेरा निर्लज्ज मन विषयों को चाहता है ।
जिस सर का है यह बाल, उसी सर में जोड़ दे।।
पर ज़ौक़ न छोड़ेगा इस पीरा जाल को।
यह पीरा जाल, गर तुझे चाहे तो छोड़ दे।।
मतलब या कि लोग दुनिया को नहीं छोड़ते, दुनिया ही उन्हें निकम्मा करके छोड़ देती है ।
वैराग्य शतकं – तृष्णादूषणं – 14
वलीभिर्मुखमाक्रान्तं पलितैरङ्कितं शिरः।
गात्राणि शिथिलायन्ते तृष्णैका तरुणायते।। १४ ।।
अर्थ:
चेहरे पर झुर्रियां पड़ गयी, सर के बाल पककर सफ़ेद हो गए, सारे अंग ढीले हो गए – पर तृष्णा तो तरुण होती जाती है ।
नैननकी पलही में पल के, क्षण आधि घरी घरी घटिका जो गई है ।
जाम गयो जुग जाम गयो, पुनि सांझ गयी तब रात भई है ।
आज गयी अरु काल गई, परसों तरसों कुछ और ठई है ।
सुन्दर ऐसे ही आयु गई, तृष्णा दिन ही दिन होत नई है ।
आज सारा संसार तृष्णा के फेरे में पड़ा हुआ है । अमीर और गरीब, सभी इसके बन्धन में बन्धे हैं । गरीब की अपेक्षा धनियों को तृष्णा बहुत है । धनी हमेशा निन्यानवे के फेरे में लगे रहते हैं । ९९ होने पर १०० करने की फ़िक्र लगी रहती है । १००० होने पर १०,००० की, १० हज़ार होने पर लाख की, लाख होने पर करोड़ की और करोड़ होने पर अरब-ख़रब की तृष्णा लगी रहती है । इसी फेर में मनुष्य रोगी और बूढा हो जाता है पर तृष्णा न रोगिणी होती है और न बूढी ।
अङ्गम् गलितं पलितं मुण्डम दशनविहीनं जातं तुण्डं ।
वृद्धो याति गृहीत्वा दण्डं तदपि न मुञ्चत्याशापिण्डम ।।
अंग शिथिल हो रहे हैं, सर गंजा हो गया है, मुँह से दांत गिर चुके हैं, चलने के लिए लाठी का सहारा लेना पड़ता है, फिर भी कामना पीछा नहीं छोड़ रहीं ।
अवश्यं यातारश्चिरतरमुषित्वाऽपि विषया
वियोगे को भेदस्त्यजति न जनो यत्स्वयममून् ।
व्रजन्तः स्वातन्त्र्यादतुलपरितापाय मनसः
स्वयं त्यक्त्वा ह्येते शमसुखमनन्तं विदधति ।। १६ ।।
अर्थ:
विषयों को हम चाहें कितने दिन तक क्यों न भोगें, एक दिन वे निश्चय ही हम से अलग हो जायेंगे; तब मनुष्य उन्हें स्वयं अपनी इच्छा से ही क्यों न छोड़ दे? इस जुदाई में क्या फर्क है ? अगर वह न छोड़ेगा तो, वे छोड़ देंगे । जब वे स्वयं मनुष्य को छोड़ेंगे, तब उसे बड़ा दुःख और मनःक्लेश होगा । अगर मनुष्य उन्हें स्वयं छोड़ देगा, तो उसे अनन्त सुख और शान्ति प्राप्त होगी ।
जो लोग विषयों को पहले ही त्याग देते हैं, उन्हें उनके न होने पर दुःख नहीं होता; किन्तु जो उन्हें नहीं छोड़ते, उन्हें उनके न होने पर महाकष्ट होता है । जो बुद्धिमान पहले से ही धन दौलत स्त्री-पुरुष आदि से मोह हटा लेते हैं, उन्हें मरते समय कष्ट नहीं होता । जो उनमें अपना मन लगाए रहते हैं, वे मरते समय रोते हैं, पर ज़बान बंद हो जाने से अपने मन की बात बता नहीं सकते । इसलिए जो सुख से मरना चाहें, उन्हें पहले से ही विषयों से मुख मोड़ लेना चाहिए । इसी तरह, जो आज नाना प्रकार के सुख भोग रहा है, यदि कल उसे वे सुख न मिलें, तो वह बड़ा दुखी होता है; किन्तु जो विषयों को भोगते तो हैं, किन्तु उनमें आसक्ति नहीं रखते, उन्हें विषय सुखों के न मिलने या उनसे बिछुड़ने पर ज़रा भी कष्ट नहीं होता ।
सांसारिक सुख-भोग असार, अनित्य और नाशवान हैं । ये सदा स्थिर रहनेवाले नहीं; आज जो लक्ष्मी का लाल है, वह कल दर दर का भिखारी देखा जाता है; जो आज जवान पट्ठा है, मिर्जा अकड़बेग की तरह अकड़ता हुआ चलता है, वही कल बुढ़ापे के मारे लकड़ी टेक टेक कर चलता है । जिसे पहले सब लोग खूबसूरत कहते थे और मुहब्बत से पास बिठाते थे, अब उसके पास खड़ा होना भी नहीं चाहते । मतलब यह कि यौवन, जीवन, मन-धन, शरीर-छाया और प्रभुता, यह सब अनित्य और चञ्चल हैं; अतः दुःख के कारण हैं । काय में मरण, लाभ में हानि , जीत में हार, सुन्दरता में असुन्दरता, भोग में रोग, संयोग में वियोग और सुख में दुःख – ये सब दुःख के कारण हैं । अगर बिना मृत्यु का जीवन, बिना रंज कि ख़ुशी, बिना बुढ़ापे कि जवानी, बिना दुःख का सुख, बिना वियोग का संयोग और सदा-सर्वदा रहने वाला धन होता, तो मनुष्य को इस जीवन में अवश्य सुख होता ।
विषय भोगों में सुख नहीं है । ये असार हैं; केले के पत्ते या प्याज के छिलको की तरह सारहीन हैं । फिर भी, मोहवश मनुष्य विषयों में फंसा रहता है । पर एक न एक दिन मनुष्य को इन विषय-भोगों से अलग होना ही पड़ता है । अलग होने के समय विषय भोगी को बड़ा दुःख होता है इससे विषय परिणाम में दुःखदायी ही हैं ।
इसलिए भज् गोविंदम ,भज् गोविंदम ,भज् गोविंदम मूढ़मते ।
अभी से भजन करले भक्ति करले बन्दे । नहीं तो तब पछताए क्या होत है जब चिड़ियां चुग गई खेत्
🙏❤️🙏
No comments:
Post a Comment