वैराग्य शतकम्
॥ वैराग्य शतकम् भर्तृहरिविरचितम् ॥
बोद्धारो मत्सरग्रस्ताः प्रभवः स्मयदूषिताः।
अबोधोपहताश्चान्ये जीर्णमंगे सुभाषितम्।। २ ।।
अर्थ:
जो विद्वान् हैं, वे इर्षा से भरे हुए हैं; जो धनवान हैं, उनको उनके धन का गर्व है; इनके सिवा जो और लोग हैं, वे अज्ञानी हैं, वो अज्ञानता को ही ज्ञान समझ बैठे हैं और दुखी हैं । इसलिए विद्वत्तापूर्ण विचार, सुन्दर सुन्दर सारगर्भित निबन्ध या उत्तम काव्य शरीर में ही नाश हो जाते हैं ।
जो विद्वान् हैं, पण्डित हैं, जिन्हें अच्छे बुरे का ज्ञान या तमीज है, वे तो अपनी विद्वता के अभिमान से मतवाले हो रहे हैं, वे दूसरों के उत्तम से उत्तम कामों में छिद्रान्वेषण करने या नुक्ताचीनी करने में ही अपना पांडित्य समझते हैं; अतः ऐसो को कुछ कहने में लाभ की जरा भी सम्भावना नहीं ।
दुसरे प्रकार के लोग जो धनी हैं, वे अपने धन के गर्व से भूले हुए हैं भगवान को । उन्हें धन-मद के कारण कुछ सूझता ही नहीं, उन्हें किसी से बातें करना या किसी की सुनना ही पसन्द नहीं; अतः उनसे भी कुछ लाभ नहीं ।
अब रहे तीसरे प्रकार के लोग; वे नितान्त मूर्ख या अज्ञानी हैं; उन गँवारों में अच्छे बुरे की तमीज नहीं, अतः उनसे कुछ कहने या अपनी कृति दिखाने सुनाने को दिल नहीं चाहता; इसलिए हमारे मुंह से निकल सकने वाले उत्तमोत्तम विचार, निबन्ध, काव्य या सुभाषित, संसार के सामने न आकर, हमारे शरीर में ही नष्ट हुए जाते हैं । हमारा परिश्रम व्यर्थ जाता है और संसार हमारे कामों के देखने और लाभान्वित होने से वञ्चित रहता है ।
जो तुम्हारी तरफ मुखातिब हों, तुम्हारी बातों पर कान दे, तुम्हारी बातों को ध्यान से सुने, उन्ही को अपनी बातें सुनाओ । जो तुम्हारी बातें सुनना न चाहें, उनके गले मत पड़ो । ऐसा करने से आपकी आत्म-प्रतिष्ठा में बट्टा लगेगा – आपका अपमान होगा , अशांति होगी ।
पण्डित मत्सरता भरे, भूप भरे अभिमान ।
और जीव या जगत के, मूरख महाअजान ।।
मूरख महाअजान, देख के संकट सहिये ।
छन्द प्रबन्ध कवित्त, काव्यरस कासों कहिये ।।
वृद्धा भई मनमांहि, मधुर बाणी मुखमण्डित ।
अपने मन को मार, मौन घर बैठत पण्डित ।।
न संसारोत्पन्नं चरितमनुपश्यामि कुशलं विपाकः पुण्यानां जनयति भयं मे विमृशतः ।
महद्भिः पुण्यौघैश्चिरपरिगृहीताश्च विषया महान्तो जायन्ते व्यसनमिव दातुं विषयिणाम् ।। ३ ।।
अर्थ:
मुझे संसारी कामों में जरा सुख नहीं दीखता । मेरी राय में तो पुण्यफल भी भयदायक ही हैं । इसके सिवा, बहुत से अच्छे अच्छे पुण्यकर्म करने से जो विषय-सुख के सामान प्राप्त किये और चिरकाल तक भोगे गए हैं, वे भी विषय सुख चाहनेवालो का, अन्त समय में दुखों के ही कारण होते हैं ।
इस जीवन में सुख का लेश भी नहीं है । जिनके पास अक्षय लक्ष्मी, धन-दौलत, गाडी-घोड़े, मोटर, नौकर-चाकर, रथ-पालकी प्रभृति सभी सुख के सामान मौजूद हैं, राजा भी जिनकी बात को टाल नहीं सकता, जिनके इशारों से ही लोगों का भला बुरा हो सकता है, ऐसे सर्वसुख संपन्न लोग भी, चाहे ऊपर से सुखी दीखते हों, पर वास्तव में सुखी नहीं हैं; भीतर ही भीतर उन्हें घुन खाये जाता है; किसी न किसी दुःख से वे जरजरित हुए जाते हैं ।
अगर मनुष्य दुखों से दूर रहना चाहे, सदा सुख भोगना चाहे, तो उसे अनित्य और नाशमान पदार्थों से अलग रहना चाहिए । उनमें मोह न रखना चाहिए । बुद्धिमान को लोक-परलोक की असारता और संयोग-वियोग का विचार करके अनित्य पदार्थो से प्रेम न करना चाहिए उसे सदा नित्य अविनाशी परमात्मा से प्रेम करना चाहिए ।
उत्खातं निधिशंकया क्षितितलं ध्माता गिरेर्धातवो
निस्तीर्णः सरितां पतिर्नृपतयो यत्नेन संतोषिताः ।
मन्त्राराधनतत्परेण मनसा नीताः श्मशाने निशाः
प्राप्तः काणवराटकोऽपि न मया तृष्णेऽधुना मुञ्चमाम् ।। ४ ।।
अर्थ:
धन मिलने की उम्मीद से मैंने जमीन के पैंदे तक खोद डाले; अनेक प्रकार की पर्वतीय धातुएं फूंक डाली; मोतियों के लिए समुद्र की भी थाह ले आया; राजाओं को भी राजी रखने में कोई बात उठा न राखी; मन्त्रसिद्धि के लिए रात रात भर श्मसान एकाग्रचित्त से बैठा हुआ जप करता रहा; पर अफ़सोस की बात है, कि इतनी आफ़ते उठाने पर भी एक कानि कौड़ी न मिली । इसलिए हे तृष्णे ! अब तो तू मेरा पीछा छोड़ ।
इसका यही मतलब है कि, भाग्य के विरुद्ध चेष्टा करना व्यर्थ है । जितना धन भाग्य में लिखा है, उतना तो बिना कोशिश किये, बिना किसी कि खुशामद किये, बिना देश-विदेश डोले, घर बैठे ही मिल जाएगा, सुअवसर स्वयं दरवाजा खटखटा के आपको व्यापार देगा , नौकरी देगा या किसी बहाने धन देगा हीं , पुर्व जन्मों के भगवान के निमित्त आपका दान किया हुआ कई गुणा आपको मिलेगा , । नहीं तो भाग्य के लिखे से अधिक हजारों चेष्टाएं करने पर भी न मिलेगा , अगर गलत करके कुछ कमा भी लिया तो वो छिन जाएगा , लुट जाएगा , रोग शोक में समाप्त हो जाएगा , घाटा लगेगा नुकसान हो जाएगा ।
सिकंदर अमृत के लिए अँधेरी दुनिया में गया; पर अमूर्त के कुण्ड के पास पहुँच जाने पर भी, वह अमृत को चख न सका; क्योंकि उसके भाग्य में अमृत न था । मूर्ख मनुष्य भाग्य पर सन्तोष नहीं करता; धन के लिए मारा मारा फिरता है । जब कुछ भी हाथ नहीं लगता, तब रोता और कलपता है ।
भ्रान्तं देशमनेकदुर्गविषम् प्राप्तं न किञ्चित्फलम्
त्यक्त्वा जातिकुलाभिमानमुचितं सेवा कृता निष्फला ।
भुक्तं मानविवर्जितम परगृहेष्वाशङ्कया काकव-
त्तृष्णे दुर्मतिपापकर्मनिरते नाद्यापि संतुष्यसि ।। ५ ।।
अर्थ:
मैं अनेक कठिन और दुर्गम स्थानों में डोलता फिरा, पर कुछ भी नतीजा न निकला । मैंने अपनी जाति और कुल का अभिमान त्यागकर, पराई चाकरी भी की; पर उससे भी कुछ न मिला । शेष में, मैं कव्वे की तरह डरता हुआ और अपमान सहता हुआ पराये घरों के टुकड़े भी खाता फिरा । हे पाप-कर्म करने वाली और कुमतिदायिनी तृष्णे ! क्या तुझे इतने पर भी सन्तोष नहीं हुआ ?
खलोल्लापाः सोढाः कथमपि तदाराधनपरै:
निगृह्यान्तर्वास्यं हसितमपिशून्येन मनसा ।
कृतश्चित्तस्तम्भः प्रहसितधियामञ्जलिरपि
त्वमाशे मोघाशे किमपरमतो नर्त्तयसि माम् ।। ६ ।।
अर्थ:
मैंने दुष्टों की सेवा करते हुए उनकी तानेजानि और ठट्ठेबाज़ी सही, भीतर से, दुःख से आये हुए आंसू रोके और उद्विग्न चित्त से उनके सामने हँसता रहा । उन हंसने वालों के सामने, चित्त को स्थिर करके, हाथ भी जोड़े । हे झूठी आशा ! क्या अभी और भी नाच नचाएगी ?
आदित्यस्य गतागतैरहरहः संक्षीयते जीवितम्
व्यापारैर्बहुकार्यभारगुरुभिः कालो न विज्ञायते ।
दृष्ट्वा जन्मजराविपत्तिमरणं त्रासश्च नोत्पद्यते
पीत्वा मोहमयीं प्रमादमदिरामुन्मत्तभूतं जगत् ।। ७ ।।
अर्थ:
सूर्य के उदय और अस्त के साथ मनुष्यों की ज़िन्दगी रोज़ घटती जाती है । समय भागा जाता है, पर कारोबार में मशगूल रहने के कारण वह भागता हुआ नहीं दीखता । लोगों को पैदा होते, बूढ़े होते, विपत्ति ग्रसित होते और मरते देखकर भी उनमें भय नहीं होता । इससे मालूम होता है कि मोहमाया, प्रमादरूपी मदिरा के नशे में संसार मतवाला हो रहा है ।
किसी ने खूब कहा है :
सुबह होती है शाम होती है ।
योंही उम्र तमाम होती है ।।
विचारकर देखने से बड़ा विस्मय होता है कि दिन और रात कैसे तेजी से चले जाते हैं । जिनको कोई काम नहीं है अथवा दुखिया है, उन्हें तो ये बड़े भारी मालूम होते हैं, काटे नहीं कटते, एक एक क्षण, एक एक वर्ष की तरह बीतता है; पर जो कारोबार या नौकरी में लगे हुए हैं, उनका समय हवा से भी अधिक तेजी से उड़ा चला जा रहा है, यानी कारोबार या धंधे में लगे रहने के कारण उन्हें मालूम नहीं होता । वे अपने कामों में भूले रहते हैं और मृत्युकाल तेजी से नजदीक आता जाता है ।
इसलिए भज् गोविंदम ,भज् गोविंदम ,भज् गोविंदम मूढ़मते ।
अभी से भजन करले भक्ति करले बन्दे । नहीं तो तब पछताए क्या होत है जब चिड़ियां चुग गई खेत्
🙏❤️🙏
श्री राधे । 🙏❤️🙏
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