उत्तर - उत्तर श्री कृष्ण के द्वारा ही दिया गया है भगवद् पुराण में , प्रस्तुत है उनकी वाणी :-
श्री कृष्ण उवाच:-
यस्याहमनुगृह्णामि हरिष्ये तद्धनं शनैः ।
ततोऽधनं त्यजन्त्यस्य स्वजना दुःखदुःखितम् ॥
तं भ्रंशयामि सम्पद्भ्यो यस्य चेच्छाम्यनुग्रहम्।।
स यदा वितथोद्योगो निर्विण्णः स्याद्धनेहया ।
मत्परैः कृतमैत्रस्य करिष्ये मदनुग्रहम् ॥
तद्ब्रह्म परमं सूक्ष्मं चिन्मात्रं सदनन्तकम् ।
विज्ञायात्मतया धीरः संसारात्परिमुच्यते ॥
अतो मां सुदुराराध्यं हित्वान्यान् भजते जनः ।
(श्रीमद्भागवतपुराण)
भावार्थ:- भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं जिस पर मैं कृपा करता हूँ, उसका संसारिक ऐश्वर्य, धन आदि धीरे-धीरे छीन लेता हूँ , सभी भौतिक संपत्तियों से बंचित कर देता हूं ,जब मैं मेरी भक्ति साधना करने वाले जीव के माया के ग्रंथि को काटता हुं तो शुरू शुरू में वो बेचैन होने लगता है, घबड़ाने लगता है और संसार कि प्राप्ति के लिए फिर से प्रयास करने लगता है लेकिन मैं उसके हरेक प्रयास को विफल कर देता हुं , इस प्रकार अंत में वो निराश हो जाता है संसार से और फिर संसार से वो सदा के लिए विरक्त हो जाता है । जीव जब संसारिक ऐश्वर्य से तथा संसारिक भोग विलास में लिप्त अपने परिजन से आसक्ति रहित हो जाता है , तब संसार के लोग यहां तक कि उसके सगे-सम्बन्धी उसका पीछा छोड़ देते हैं ।
इस प्रकार वो जीव मेरी भक्ति में और अधिक रस लेने लगता है , वो संसारिक धन तथा ऐश्वर्य की कामना को त्याग देता है मेरी प्रेरणा से । वो समझ जाता है कि संसार के प्रत्येक बिषय बस्तुओं तथा व्यक्ति से लगाव , आसक्ति , अटैचमेंट हीं समस्त दुखों का मूल कारण है , फिर उसे दुःख समझ कर वो उधर से अपना मुँह मोड़ लेता है और फिर मेरे प्रेमी भक्तों का, यानि भगवद् प्राप्त संतों का आश्रय लेकर उनका संग बढ़ा देता है , मेरे जनों का संग करना उसे अच्छा लगने लगता है , तब मैं उस पर अपनी अहेतु की कृपा करता हूं ।
फिर मेरे कृपा से मेरे जन यानि मेरे संत उसको मेरा प्रेम दान कर देते हैं , प्रेम दान मिलते ही वो मुझे प्राप्त कर लेता है , मुझे प्राप्त करके सदा के लिए मेरे बनाए जेलखाना के चौरासी लाख योनियों के बंधन से मुक्त होकर मेरे लोक में सदा के लिए मेरे साथ निवास करता है और मेरे स्वरूप शक्ति से युक्त होकर मेरे हीं समान दिव्य शक्तियों का स्वामी बन जाता है एवं सदा के लिए आनंदमय हो जाता है ।
लेकिन जो जीव इस संसारिक धन से अटैचमेंट रखता है, संसारिक बिषय बस्तुओं की कामना लेकर मेरी भक्ति करता है वो मेरा भक्त नहीं है , वो मेरे दिव्य प्रेम का अधिकारी नहीं हो सकता ।
मेरे दिव्य प्रेम , दिव्य संपत्ति, दिव्य एश्वर्य, दिव्य ज्ञान कि प्राप्ति के लिए जीव का लगाव , अटैचमेंट संसार से समाप्त होना आवश्यक है । इसलिए मैं उसका संसार छीन लेता हुं , उसे योग भ्रष्ट कर देता हूं , उसे एश्वर्य रहित कर देता हूं , यह मेरी सबसे बड़ी कृपा है और संसार का मिलना मेरा सबसे बड़ा कोप है ।
इस प्रकार मेरी प्रसन्नता, मेरी आराधना, मेरी भक्ति बहुत कठिन है, साहसी लोग, निडर लोग , बुद्धिमान लोग मेरी भक्ति करते हैं । साधारण लोग, भयभीत लोग , कायर लोग , संसार में हीं आसक्त होते हैं और संसारिक भोग बिलास की हीं कामना रखते हैं । संसारिक भोग बिलास में लिप्त लोग मुझे प्राप्त नहीं कर सकते, मेरी भक्ति नहीं कर सकते । वो संसार कि प्राप्ति के लिए लालायित रहते हैं और मायाजनित दुख भोगते रहते हैं ।
अत: ऐसे भोगी बिलासी कामी लोग मुझे छोड़कर अन्यान्य मायाधिनस्वर्ग के मायाधिन देवी देवताओं की आराधना करते रहते हैं , और संसार पाकर दुख के दलदल में और भी फंसे रहते हैं तथा त्रिगुण , त्रिताप ( आध्यात्मिक ताप , भौतिक ताप तथा दैविक ताप) , त्रिकर्म , त्रिदोष , पंचक्लेश आदि से पीड़ित होकर मेरे ही बनाए चौरासी लाख योनियों में चक्कर लगाते रहते हैं मेरी दासी माया का झापड़ खाते रहते हैं । :- श्री कृष्ण का कथन श्री मद्भागवत महा पुराण के दशम स्कंध के श्लोक का भावार्थ ।
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जब संसार में भी प्रधान मंत्री बनने से पहले उसको चीफ मिनिस्टर के पद का त्याग करना पड़ता है , राष्ट्रपति बनने के लिए प्रधानमंत्री के पद का या अन्य पद एश्वर्य आदि को त्यागना पड़ता है ।
तो भगवान के लोक में दिव्य प्रेम , दिव्य पद् दिव्य एश्वर्य की प्राप्ति के लिए संसारिक पद् प्रतिष्ठा, मान सम्मान धन जन से छुटकारा तो आवश्यक है ।
कहां दिव्य लोक में दिव्य प्रेम और आनंद और कहां संसार का दुख युक्त इन्द्रियादिक सुख ? दोनों विरोधी बस्तुए है दोनों विरोधी बस्तुए एक साथ नहीं मिल सकती है । अत: भगवान के दिव्य प्रेम की प्राप्ति के लिय भगवान कि दासी माया की संपत्ति से त्याग पत्र तो देना ही होगा । जो लोग संसार नहीं छोड़ना चाहते हैं भगवान उसे और भी संसार देकर दु:ख में उलझा देते हैं ताकि वो दुख पाकर संसार अनासक्त होने लिए तैयार हो जाए ।
इसलिए भगवान जिस पर अपनी अहैतु कि कृपा करते हैं उसका संसार पहले छीन लेते हैं ताकि वो दुख से सदा के लिए मुक्त होकर आनंद मय हो जाए ।
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