उत्तर :- हां ये सत्य है कि भगवान हर जगह , हर योनि में , हर शरीर में हमारे साथ साथ जाते हैं , हमारे साथ साथ रहते हैं, यहां तक कि स्वर्ग हो या नरक , सभी जगह वो जीवात्मा के साथ साथ जाते हैं तथा हर क्षण रहते हैं । लेकिन वो सुख दुख नहीं भोगते ,वो भोगवाते है । माईक सुख दुख हमें भोगवाते है फल देकर ।
कर्ता हम है अपने कर्मो का और भगवान नोट कर्ता है हमारे कर्म का और फल दाता हैं
वो हमारे कर्म का जिम्मेदार नहीं हैं , हम जैसा संकल्प करते हैं और फिर जो कर्म करते हैं ,उसको वो नोट करके फल देते हैं सिर्फ , वो हमारे कर्म का भोग फल नहीं भोगते साथ रहने के बाबजूद भी ।
वो तो आनंद है , सदा आनंद में रहते हैं और सभी जीवात्मा के साथ साथ रहते हैं हमेशा लेकिन अपने अहंकारवश , देहाभिमान के कारण अपने कर्म का कर्ता हम स्वयं है , साथ रहने के बाबजूद भी उनसे हमारा मन का कनेक्शन नहीं है , हमारे मन का कनेक्शन हमारे देह , हमारे देह के रिश्तेदारों और संसार से है , इसलिए हम मायाबद्ध जीवों का कर्ता वो नहीं है , इसलिए हमारे कर्म के अनुरूप वो फल देते हैं और भोगवाते है इसी संसार में , स्वर्ग में या नरक में भी ।
हां महापुरुषों के अंदर भी वो हैं लेकिन महापुरुषों का आत्मा और मन का पुरा कनेक्शन भगवान के साथ है हर क्षण है । संतों एवं महापुरुषों के आत्मा और मन अपने अंदर बैठे भगवान के साथ अटैच है,वो संसार में रहते हुए भी संसार , देह और देह के रिश्तेदार और कर्म से डिटैच्ड है और हर क्षण भगवान से अटैच्ड है इसलिए उनके सभी कर्म का कर्ता भगवान है , अत: जब उनके सभी कर्मों का कर्ता भगवान हैं तो फिर उनके कर्मों को नोट करने और फल देने का सवाल ही नही उत्पन्न होता ।
इसलिए तुलसीदास जी ने संतों और महापुरुषों के बिषय में कहा है कि :-
"होईहैं वही जो राम रची रखा , को करि तर्क बढ़ाबहि साखा "
यानि महापुरुषों के सभी कर्म , संकल्प , कर्म का डिसीजन भगवान के हाथ में है, इसलिए महापुरूषों को अपने कर्म का चिंता नहीं रहता कभी । महापुरुषों के लिए कर्म का चुनाव, कर्म करना सब भगवान हीं रचते हैं करते हैं । महापुरुषों को कर्म से कोई मतलव नहीं और न कर्म कि चिंता होती है ।
इसलिए महापुरूषों के लिए उन्होंने फिर कहा है :- तुलसी भरोसे राम के निर्भय होके सोये' ।
महापुरूष को कोई भय नहीं , न कर्म कि चिंता और न फल की इच्छा , इसलिए तुलसी सरिखे महापुरूष ही निर्भय होके सोने का अधिकारी है , हमारे जैसे माया बद्ध जीव नहीं , जीवात्मा जब तक संसार और अपने देह से अटैच्ड है तब तक उसको कर्म तथा कर्म फल का भय रहेगा , वो भयभीत रहेगा ही ।
मायाबद्ध निर्भय होके नहीं सो सकता क्योंकि वो आनंद में नहीं है, भगवान से मन अटैच नहीं ,वो इस मृत्युलोक के समस्त माया जनित रोगों के भोगों से कर्मफल के रूप में प्राप्त संसारिक सुख दुख के भय भयभीत रहेगा , रहना पड़ेगा, कोई बच नहीं सकता चाहे वो पृथ्वी का सम्राट या मायाबद्ध स्वर्ग का भी सम्राट क्यों न हो , सब मायाबद्ध अपने अपने कर्मों के रिश्क पर है। अगर कोई मायाबद्ध जीव , चाहे वो पृथ्वी का सम्राट क्यों न हो , या भारी क्रिमिनल क्यों न हो कहता है कि मैं निर्भय हुं , निडर हुं तो वो मुर्ख है , उसे नहीं पता कि वो उदंड है , निडर नहीं , संसार में जिसके पास जितना अधिक संसारिक वैभव है वो उतना भयभीत हैं उसे वैभव खोने का डर सबसे अधिक है अपेक्षाकृत उसके , जिसके पास कुछ नहीं , जो रोड पर सोता है ।
"भोगे रोगभयं कुले च्युतिभयं वित्ते नृपालाद्भयं ।
माने दैन्यभयम्, बले रिपुभयम्, रूपे जराया भयम् ।
शास्त्रे वादिभयम्, गुणे कलभयम्, काये कृतान्ताद्भयंसर्वं वस्तु भयान्वितं भुवि नृणां वैराग्यमेवाभयम् ॥
संसार में समस्त दुखों तथा भय का एक मात्र कारण जीवों का संसार से मोह है , अटैचमेंट है । "(Bhartrihari from the Vairagya shatakam)
जो जितना संसार से अटैच्ड है वो उतना भयग्रस्त है , चिंताग्रस्त हैं , परेशान हैं , दुखी है , और रहेगा । और जो जितना, जिस मात्रा में संसार से डिटैच्ड है तथा भगवान से अटैच्ड है वो उसी मात्रा में आनंदित है , भय रहित है , चिंता रहित है , दुख रहित है और रहेगा , सीधा सा हिसाब है ।
ये महापुरुषों के द्वारा जो कहा गया है कि -
"चाह गई चिंता मिटी, मनवा बेपरवाह'
जाके कछु नहीं चाहिए, वे साहन के साह”
ये सब भगवद् प्राप्त महापुरुषों के लिए है कहा गया है , यह मायाबद्ध मनुष्य के लिए अप्लीकेबल नहीं है , भ्रम में न रहें । मायाबद्ध कभी वेपरवाह हो ही नहीं सकता , न चाह यानि कामना मिट सकती है और न चिंता मिट सकती है ।
इसलिए तुलसीदास जी ने हम मायाबद्ध जीवों तथा संसार के लिए फिर कहा है कि :-
कर्म प्रधान विश्व करि राखा , जो जस करही सो तस फल चाखा ।
यह श्लोक हम मायाबद्ध जीवों के लिए अप्लीकेबल है ।
मायाबद्ध जीव जैसा संकल्प करता है ,जैसा कर्म करता है भगवान नोट करके फल देते हैं और फिर भोगवाते भी है , कोई बच नहीं सकता है ।
वहीं वो महापुरुषों के सभी कर्म को स्वयं करते हैं , महापुरूष हमेशा भगवान यानि आनंद में रहते हैं , संसार में रहते हुए भी संसार से डिटैच्ड और भगवान से 100% अटैच्ड रहते हैं ।
संसार में उनके द्वारा जो भी कर्म होता या किया हुआ दिखाई पड़ता है हम साधारण जीवों को , वो भगवान के द्वारा किया जाता है , महापुरुषों के द्वारा नहीं ।
यही अंतर है । :- श्री महाराज जी द्वारा दिए गए तत्वज्ञान के आधार पर । श्री राधे ।
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