Tuesday, 5 December 2023

भगवद् कृपा का पैमाना :

भगवद् कृपा का पैमाना :- 
वास्तविक महापुरुषों से मिलन के बाद अगर किसी को और अधिक संसार मिल रहा है और वो इसको भगवद् कृपा समझ रहा है, गुरू कि कृपा मानता है तो यह एक बहुत बड़ी अज्ञानता तथा भ्रम है, गलत धारणा है । 
क्योंकि श्री कृपालु जी महाप्रभु ने शास्त्रीय सिद्धांतों को समझाते हुए हमें बतलाया है कि भौतिक बस्तूएं यानि संसार का समान तो जीव को अपने पुर्व जन्म में किए कर्म यानि प्रारब्ध, भाग्य एवं इस जीवन में किए जा रहे क्रियामान कर्मों से मिलता है कर्म फल के रूप में । 
भगवद् कृपा , महापुरुषों की कृपा , भगवान की असली कृपा तो तब मानना चाहिए जब अनुभव में आए कि गुरू कृपा से हमारी संसारिक कामनाएं कितनी कम हुई है , या धीरे धीरे समाप्त हो रही है । 
संसार से अटैचमेंट कितना समाप्त हुआ, कम हुआ और भगवान से , गुरू से कितना प्रेम बढ़ा यह असली पैमाना है कृपा को मापने का । जिस मात्रा में गुरू निर्दिष्ट हमारी साधना होगी , सिद्धांतों का श्रवन होगा , चिंतन होगा , उसको व्यवहार में लाने का प्रयास होगा उतना लाभ होगा , उतनी कृपा बढ़ेगी , उतना आनंद मिलेगा , अशांति समाप्त होगी तथा जीवन में सकुन , आनंद बढ़ेगा ।। 
अगर संसार अधिक मिलने लगा और इसी को हम कृपा मान रहे हैं तो इसका मतलव संसार से हमारा अटैचमेंट बढ़ गया है । और यह तो बड़ा भारी अध्यात्मिक नुकसान है । यह कृपा नहीं है । जितना आज अधिक संसार मिलेगा , भौतिक संपत्ति मिलेगी , कल के लिए वही दुख का कारण बनने बाला है निश्चित रूप से । क्योंकि भौतिक सामान अस्थाई होता है , आज धन है, रूप है योवन है , पद् है, प्रतिष्ठा है , यश है , हर तरफ से सम्मान मिल रहा है, भौतिक साधन है , भौतिक सुख मिल रहा है कल जब नहीं होगा तब पता चलेगा , तब बहुत दुख होगा । संसारिक सुख आज जिसके पास है कल नहीं रहने वाला , उसी प्रकार संसारिक दुख भी आज जिसके पास है कल नहीं रहने वाला , यह परिवर्तनशील है, अस्थाई है । अत: जो भौतिक बस्तुओं कि प्राप्ति , पद प्रतिष्ठा, पोजिशन को भगवान या गुरू कि कृपा मानता है उससे बड़ा मुर्ख दुनिया में कोई नहीं । 
भगवद् कृपा से तो भगवदिए सुख , आनंद मिलता है जो स्थाई है तथा प्रतिपल बढ़ने वाला होता है । और संसार अधिक मिलने लगा एवं उसमें अटैचमेंट बढ़ने लगा तो समझ लीजिए हम आप बड़े खतरे में है , अधिक संसार पाकर जितना आपको खुशी मिल रहा है , निश्चित हम आप कल उतना अधिक दुख पाने वाले हैं । अत: सावधान ।
श्री महाराज जी का सिद्धांत है कि संसार से जिस मात्रा में अटैचमेंट कम होता है उसी मात्रा में भगवान से , महापुरुष से प्रेम बढ़ता है , अत: भगवान और गुरू से प्रेम का बढ़ना कृपा है । 
संसार अधिक मिलना कृपा नहीं है यह खतरा है , आने वाला भावी दुख का संकेत है । :- हमारे गुरूदेव श्री महाराज जी से प्राप्त सिद्धांत ज्ञान । 
श्री राधे ।

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