Monday, 18 December 2023

बड़े-बड़े सरस्वती-वृहस्पति से भी आगे जो बुद्धि रखते है, वे भी किसी महापुरुष के वाक्य, क्रिया, मुद्रा, का अर्थ नहीं समझते ।

बड़े-बड़े सरस्वती-वृहस्पति से भी आगे जो बुद्धि रखते है, वे भी किसी महापुरुष के वाक्य, क्रिया, मुद्रा, का अर्थ नहीं समझते ।

"योगेश्वराणां गतिमन्धाबुद्धि: कथं विचक्षीत गृहानुबन्ध: ।"
                                              (भाग. ५-१०-२०)
फिर मायाबद्ध जीव बेचारा कैसे जानेगा, वह तो मंद बुद्धि है, 
उसकी बुद्धि त्रिगुण के अंतर्गत है । वह किस पैमाने से नापेगा ? 
श्रोत्रिय-ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष के अनुगत हुए बिना भक्ति कदापि नहीं मिल सकती ।
यानी गुरु कृपा हुई, तो भक्ति मिली। शास्त्र वेद यहाँ तक कहते है कि तुम भगवान् का नाम तक न लो, लेकिन केवल श्रोत्रिय-ब्रह्मनिष्ठ गुरु की भक्ति करो, सब कुछ मिल जाएगा ।

गुरुर्यस्य भवेत् तुष्टस्तस्य तुष्टो हरि: स्वयं ।

गुरु के तुष्ट होते ही भगवान विभोर हो जाते हैं । वह भगवान का प्राण प्रिय हो जाता है क्योंकि वह उनके प्राण प्रिय से प्यार करता है । इसलिए तो भगवान उद्धव जी से कहते है -

   न यथा में प्रियतम आत्मयोनिर्न शंकर: ।
न च संकर्षणो न श्रीर्नैवात्मा च यथा भवान् ।।
                           (भाग. ११-१४-१५)
उद्धव जी जब गोपियों के पास से लौटे तो श्रीकृष्ण ने उनसे कहा- 'उद्धव! मुझे तुम्हारे जैसे प्रेमी भक्त जितने प्रियतम हैं, उतने प्रिय मेरे पुत्र ब्रह्मा, आत्मा शंकर, सगे भाई बलराम जी, स्वयं अर्धाङ्गिनी लक्ष्मी जी और मेरी अपनी आत्मा भी नहीं है ' ।
:- मां

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