Wednesday, 13 December 2023

अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः। - गीता , भगवान श्रीकृष्ण ।।

अनन्यता भक्ति मार्ग के पथिकों का सबसे बड़ा आधार है अस्त्र है , साधन है । मेरा स्व अनुभव है अनन्यता तथा सततं यानि निरंतर स्मरण से व्यक्ति का उत्थान बहुत जल्दी जल्दी होता है ,
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः। - गीता , भगवान श्रीकृष्ण ।। 

 अनन्यता भंग हुआ कि जो कमाया वो सब गया दो मिनट में । 
संसार में भी आज उस डौक्टर के पास , कल दुसरे डाक्टर के पास जाने से रोगी कहीं का नहीं रहता । 
और एक साथ अनेक डाक्टर का दवा खाने से भी रियेक्सन होना स्वाभाविक है। ठीक इसी प्रकार आध्यात्मिक मार्ग में जब एक बार यह निश्चय हो गया की हमारा कल्याण इन्हीं से होने वाला है तो उनको मन के द्वारा कस कर , यानि दृढ़ होकर पकड़ लेना परमावश्यक है । और केवल उन्हीं पर भरोसा करके उन्हीं के बतलाए मार्ग का सेवन करना चाहिए, अनुसरण करना चाहिए। 

कभी कभी शुरू में महापुरुष तथा भगवान श्री कृष्ण जीव के अनन्यता का बड़ी बड़ी परीक्षाऐं लेते है , कठीन कठीन एवं अनुकुल तथा प्रतिकूल परिस्थितियों को देकर , अलग अलग संत को लाकर खड़ा कर देते हैं कन्फ्यूज करने के लिए ताकि परीक्षा ठीक से हो, कभी कभी भौतिक जगत संबंधित कष्ट भी मिल जाता है परीक्षा के लिए , यानि हर तरह से परीक्षा होती है , बहुत ठोका बजाया तथा परखा जाता है अनन्यता के लिए , विश्वास में दृढ़ता का परीक्षा के लिए , श्रद्धा भाव में दृढ़ता के लिए परीक्षा , यानि हर तरह से परीक्षा , अनुकूल तथा विपरित दोनों परिस्थितियों द्वारा ।  

उस समय अगर हमारी अनन्यता भंग नहीं हुई तो बस रस मिलने लगता है , हर प्रकार से लाभ मिलने लगता है , क्योंकि वो समझ जाते हैं कि यह समझ गया है अनन्यता का रहस्य । अब कुछ भी हो जाए ये कहीं और नहीं जाने वाला । अब ये जियेगा और मरेगा सिर्फ मेरे पास । इसको अपना भक्ति और प्रेम देना ही पड़ेगा । 
फिर झट से उसको अपना लेते हैं । 
लेकिन जो भटका वो गया । वो कहीं का नहीं , न तीन में ओर न तेरह में , ऐसे को कोई नहीं पुछता । इसलिए शास्त्रों में कहा गया है कि -
"एक ही साधे सब सधे , सब साधे सब जाए "
हरेक महापुरूषों द्वारा मार्ग अलग अलग है , भाव अलग अलग है कोई साख्य भाव के मार्ग का पथिक हैं वो साख्य भाव का मार्ग पर अपने अनुयायियों को चलाते हैं , कोई सखा भाव मार्ग का संत हैं , कोई वात्सल्य भाव का हैं तो कोई दास भाव का तो कोई माधुर्य भाव का । 
कोई माधुर्य भाव में भी साधारणी रति के संत हैं गुरू हैं , कोई सामंजसा रति के है तो कोई समर्था रति की उपासना बतलाते है , 
समर्था रति के बहुत कम महापुरूष हुऐ हैं , अवतार लेकर आए हैं धरा धाम पर , न के बराबर , ये हज़ारों सालों में केवल एक आध बार अवतार लेकर आते हैं पृथ्वी पर उच्च कोटि के जीवों का कल्याण करने । उच्च कोटी के जीव इसलिए कि ऐसे महापुरुषों कि प्राप्ति तथा उन पर अटुट श्रद्धा और विश्वास की उत्पत्ति एक जन्म के साधना का फल तो नहीं है । 

हमारे गुरूदेव उनमें से एक है, इनके पहले पांच सौ साल पहले ये गौरांग बन कर आए थे । 
हमारे श्री महाराज जी समर्था रति में भी महाभाव भक्ति वाले रसिक संत हैं , गोलोक के वृंदावन के निभृत निकुंज रस वाले संत है , ये और भी दुर्लभ होते हैं, बड़ा दुर्लभ , दुर्लभतम होते हैं ये । भगवान श्री कृष्ण इनको अपने आंखों का पुतली बना कर पलकों में छुपा कर रखते हैं । इनसे भगवान श्री कृष्ण एक क्षण के लिए भी दुर नहीं रहते। और न रह सकते , ये कहीं जाते हैं तो श्री कृष्ण सब कुछ भूल भाल कर अपना लोक तथा श्रीमति जी को भी त्याग कर इनके पीछु पीछु चलते हैं दौड़ने लगते हैं । इनके बिना वो रह ही नहीं सकते कभी । 

'हरि के जो वल्लभ हैं दुर्लभ भुवन माझ 
तिनही के पद् रेणु आसा जिय करिहें 
योगी जपि तपि जासो मौकों कछु काम नाही
प्रीति प्रतीति रिति मेरी मति हरिहें " 

बड़ा दुर्लभ होते हैं ऐसे संत , ऐसे संत को भगवान श्री कृष्ण भी अपना वल्लभ मानते हैं । 
अत: ऐसे महापुरुष जिनको मिल गया उससे बड़ा सौभाग्यशाली जीव कोई नहीं तीनों लोकों में । 
अब इनको पाकर कोई अन्य जगह क्यों जाए । कामधेनु को छोड़ कर छेड़ी कौन दुहावे । रस मलाई छोड़ कर रसगुल्ला कौन चाहे भला । गोलोक रस वाले के रस का चस्का जिसको लग गया , वो वैकुंठ लोक के रस को क्यों चाहे , वैकुंठ भी फीका है गोलोक के रस के आगे तो भला अन्य लोक कि कामना करना वेकूफी है । यह समझने की बात है , जो समझ गया वो पा लिया । बस । :- संजीव । 
श्री राधे ।

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