Monday, 4 December 2023

इस कलयुग में संसार में सभी माया बद्ध मनुष्य के स्वयं के स्थिति के बारे में ठीक से पता नहीं है कि उसके स्वयं का अंत:करण कितना गंदा है ईर्ष्या द्वेष छल कपट , काम क्रोध भरा परा है हर किसी में, चाहे वो कितना भी बड़ा संसारिक ज्ञानी या पंडित क्यों न हो ?

संसार में जब एक मनुष्य दुसरे मनुष्य के भेष भूषा बाहरी स्थिति तथा व्यवहार को देखकर उसके अंदर के अंत:करण को ठीक ठीक नहीं जान सकता तो भला वो किसी वास्तविक महापुरुष को, संत को कैसे जान सकता है या समझ सकता है अपने सीमित बुद्धि से ? महापुरुषों के व्यवहार तो और भी अटपटे होते हैं बाहर से । साधारण जीव कोई अंतर्यामी है जो वो किसी के बाहरी भेष भूषा तथा व्यवहार से उसके अंदर की स्थिति जान ले ?

 इस कलयुग में संसार में सभी माया बद्ध मनुष्य के स्वयं के स्थिति के बारे में ठीक से पता नहीं है कि उसके स्वयं का अंत:करण कितना गंदा है ईर्ष्या द्वेष छल कपट , काम क्रोध भरा परा है हर किसी में, चाहे वो कितना भी बड़ा संसारिक ज्ञानी या पंडित क्यों न हो ? वो भला दुसरे को क्या सर्टिफिकेट देगा ? अगर कोई ऐसा करता है तो समझ लेना चाहिए कि उसके स्वयं का गंदा चित्त चरित्र दुसरे के आईने में प्रतिबिंबित होता है। दुसरे का दोष देखना , उसको गनना ये सिद्ध करता है कि वो स्वयं उतना हीं बड़ा दोषी है जितना दोष उसको दुसरे में दिखाई देता है । बड़ा गंदा है उसका अंत:करण । 

"अत: जब तुम्हारा अपने गुरू के उपर दृढ़ विश्वास है, पुर्ण श्रद्धा है, समर्पण है , हर क्षण सेवा की भावना है, अनन्यता है तो फिर दुसरा तुम्हारे और तुम्हारे गुरू के बारे में क्या कहता है इसकी चिंता तुम्हें कभी नहीं करना चाहिए। न उससे तुम्हें उलझना चाहिए और न विचलित होना चाहिए। 

हमेशा यह सोचना चाहिए कि कलयुग तो क्या जब त्रेता में भगवान श्री राम कि भी आलोचना करने वाला अज्ञानी एवं अहंकारी जीव था , जब द्वापर में भगवान श्री कृष्ण को भी भला बुरा कहने और उनके बारे में गलत-सलत बोलने वाला नादान अधम जीव था तो भला आज इस भ्रष्टयुग के भटके हुए जीव वास्तविक महापुरुष को भला कैसे समझ सकता हैं । " :- पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी । 

गोस्वामी जी कहते है :- 
जाने बिनु न होई परतीति, बिनु प्रतीति होइ नही प्रीति। 
प्रीति बिना न भक्ति दृढ़ाई, जिमि खग पति जल के चिकनाही।। 

अर्थात ईश्वर को जाने बिना हमारे भीतर विश्वास नही आ सकता है, और विश्वास के बिना प्रेम प्रकट नही हो सकता है। प्रेम व विश्वास के बगैर भक्ति दृढ़ नही हो सकती है। 
इसलिए अगर कोई अधम जीव किसी भी वास्तविक महापुरुषों के बारे गलत बातें करता है तो मान लिजिए वो भगवान के कृपा से वंचित हैं । इसलिए बेचारा ऐसी गंदी बातें सोचता है ,बोलता है और दुसरे से करता है । 

"जाकि रही भावना जैसी, प्रभु मुरत देखी तीन तैसी "

जिसकी जैसी भावना है , जितना अंत:करण गंदा है , जितना चरित्र गंदा है वो तो उसी भावना से भगवान और भगवद् महापुरूष के बारे में अनुमान लगाता है , गंदी बातें बोलता है और दुसरे गंदे लोग उससे सुनके पतियाते है । इसमें कोई आश्चर्य नहीं । यह समझना चाहिए कि महापुरुषों के बारे में गलत बोलने वाला और सुनने वाला , तथा पतियाने वाला जीव अपने पतन की ओर, विनाश कि ओर हीं स्वयं अग्रसर है । 
श्री राधे ।

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