उत्तर :- कर्म , मनुष्य केवल कर्म करने का अधिकारी है, इच्छित फल की प्राप्ति मनुष्य के हाथ में नहीं है ।
भगवान ने मनुष्य को केवल तीन बिषय में स्वतंत्रता प्रदान किए हैं यानि तीन अधिकार दिए हैं सृष्टि के समय और इसमें वो कभी हस्तक्षेप नहीं करते । वो तीनों निम्नलिखित हैं :-
1.कर्म के चुनाव का अधिकार-मनुष्य को कर्म चुनाव करने का अधिकारी है । वो चाहे अच्छे कर्म का चुनाव करें या बुरे कर्म का चुनाव करें , यह मनुष्य के अपने हाथ में है।
2. चुनें हुए कर्म को करने का संकल्प , यानि कर्म का प्रयोजन का अधिकार तथा कर्म करने का नियत तथा निति का अधिकार - भगवान ने मनुष्य को दुसरा अधिकार दिया है उसके चुने हुए कर्म को करने का संकल्प करने का अधिकार, इसमें भी भगवान कभी हस्तक्षेप नहीं करते । अच्छा नियत है , अच्छा नियत से कर्म करने का संकल्प किया गया है मनुष्य के द्वारा तो अच्छा फल भगवान देते हैं , बुरा कर्म किया तो बुरा फल मिलता है ।
3. तीसरा और अंतिम अधिकार मनुष्य को भगवान से मिला है वो है कर्म करने कि शक्ति, बुद्धि, बल तथा क्षमता ।
लेकिन फल के चुनाव का अधिकार मनुष्य को नहीं है । कर्म के चुनाव , संकल्प और कर्म करने के बाद कर्म के अनुरूप तथा प्रारब्ध के मिश्रण के अनुसार भगवान फल देते हैं । यही फल हार-जीत, सफलता-असफलता , हानी-लाभ,जीवन-मरण,यश-अपयश, दुख-सुख , के रूप में प्रत्येक मनुष्य को मिलता है । और भोगना पड़ता है उसे क्योंकि भोगने के चुनाव का अधिकार मनुष्य को नहीं है । जो कर्म फल भगवान के द्वारा मिला है उससे कोई बच नहीं सकता ।
"कृतितव्य: भोगतव्यं," कर्म फल भोगना ही पड़ेगा ।
'जस करनी तस भोगहु ताता,
चाहे वो कितना बड़ा राजा क्यूं न हो ।
सार यह कि मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र है तो भगवान फल देने में स्वतंत्र है लेकिन मनुष्य कर्म फल भोगने में स्वतंत्र नहीं हैं । फल भोगना ही पड़ेगा । कर्म फल किसी का पीछा नहीं छोड़ती ।
भगवान ने गीता में स्पष्ट रूप से कहा है कि :-
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।2.47।। गीता ।
:- श्री महाराज जी द्वारा "कर्म तथा भोग सिद्धांत पर दिए गए प्रवचन का सार ।
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