प्रश्न :- क्या उत्सव मनाने से आध्यात्मिक लाभ है ?
उत्तर :- अगर उत्सव के पीछे के मूल सिद्धांतों को जानने तथा अपने जीवन में लागु करने से हम वंचित हैं तो चाहे जितना उत्सव मनाया जाए , सब लोक रंजन है , मनोरंजन है , उसका कोई आध्यात्मिक लाभ नहीं है ।
हम महापुरुषों का प्राकट्य उत्सव मनाते हैं , पुण्य तिथि मनाते हैं , होली , दिवाली , दुर्गा पुजा , छठ , गुरू पूर्णिमा, शरद पुर्णिमा, रामनवमी , जन्माष्टमी, राधाष्टमी, शिवरात्रि, हनुमान जयंती, ये दिवस , वो दिवस , प्रकाशोत्सव आदि कोई भी उत्सव मनाते हैं लेकिन इन उत्सवों के पीछे का सिद्धांत ज्ञान , तत्वज्ञान आदि को नहीं जानते , उसमें दिलचस्पी नहीं है , उसको व्यवहार में लाने का प्रयास नहीं है , हरि और गुरू से अटैचमेंट न हो , प्रेम न हो तो सिर्फ उत्सव चाहे कितना मना ले , यह केवल अपने मनोरंजन मात्र के लिए है इसका कोई लाभ मिलने वाला नहीं है ।
महापुरुषों के मूर्ति को या भगवान के मूर्ति को स्थापित करके , उन पर फुल , माला चढ़ाना , बैंड बजाना , आरती करना, उछलना , कुदना नाचना , गाना तब तक सार्थक नहीं जब तक उनके बतलाए मार्गों पर चलने में दिलचस्पी न हो ।
यह तो ऐसा ही हुआ कि एक व्यक्ति अपने पिता के मुर्ति या फोटो को सोने में मढ़वा कर प्रति दिन फुल चढ़ाए , पुजा करें , उनका जन्मदिन पर उत्सव करें , भोज का आयोजन करें , लेकिन पिता के बतलाए मार्ग को न अपनाएं , उनके आदेशों का पालन न करें , उसके सिद्धांतों कि अवहेलना करें ।
भला कौन ऐसा पिता खुश होगा जिसका संतान धूमधाम से उनका जन्म दिन मनाए लेकिन पिता के आदेशों के विपरित चले , आदेशों के खिलाफ काम करें , उनके अपेक्षा पर खड़ा न उतरे ।
संसार में भी कोई माता पिता इन बातों से खुश नहीं हो सकता कभी ।
तो भला भगवान और गुरू कैसे खुश होंगे उनका शिष्य गुरू पूर्णिमा मनाए , उनका जन्मोत्सव मनाए , नाचे कुदे , उछले गाए , उत्सव मनाए लेकिन उनके सिद्धांतों से दुर रहे , बतलाए मार्गों का अबलंब न लें ।
तो ऐसे पुजा , आरती , उत्सव से कोई लाभ नहीं ।
गुरू और भगवान को सुख तो तब मिलता है जब कोई शिष्य या अनुयायी उनके सिद्धांतों का पालन करता है , उनके बतलाए मार्गों पर चलने का प्रयास ह्रदय से करता है । तभी कृपा होती है , तभी उत्सव का फल मिलता है । तभी उत्सव सार्थक होता है ।
श्री राधे ।
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