" तुम मेरे थे, मेरे हो , मेरे रहोगे । बहकुं ना अब बहकाने से ।
जब समझ प्रेम में डुब गई तो अब, क्या होगा समझाने से !"
हमारे जीवन में हरि-गुरू से बढ़ कर कोई नहीं । हरि-गुरू हमारी आत्मा है । जिसका उदेश्य हीं हरिगुरू से प्रेम और सेवा हो , जो हरि गुरू के निमित्त ही सांसें लेता हो , जो हरि गुरू के निमित्त जीवित हो , जिसका धन हरिगुरू हीं हो , जिसके जीवन में हरिगुरू के सीवा और कुछ नहीं । जो हरि गुरू के आगे किसी चीज की अहमियत नहीं देता हो , उसको भला ये माया क्या तड़पाएगी भला अब । लोग क्या तड़पाऐंगे भला !
"तुमको हीं तन मन धन अर्पण , तुम हीं एक मेरा जीवन धन ,
अब पीछे नहीं हटेगा पग पिय , विरह चोट उर खाने से
दे दो ऐसी विरह वेदना , मिट जाए मम अहं चेतना ।
और अधिक चमकेगा सोना , पुनी पुनी अग्नी तपाने से "
आया ना आ मुरली वाले , रो रो कर हम तुम्हें पुकारे ,
प्रेम बढ़ेगा छिन छिन मेरा , यूं तेरे तड़पाने से ।
पिय तुमसे हीं प्रीति लगाई , पर झोली भी संग नहीं लाई ,
एक बार लगा लो सीने से , बलिहार जाऊं अपनाने से ।
चाहे मम आलिंगन कर लो , चाहे मम प्राणन हीं हरलो ,
चाहे जी भरकर तड़पा लो, मोही काम श्याम गुण गाने से ।
एक दिन प्रेम रंग लाएगा , पिय तुमको भी तड़पाएगा ,
मैं हुं सखी किशोरी जू कि , नाता मम बरसाने से ।
तुम मेरे थे, मेरे हो, मेरे रहोगे। बहकुं ना अब बहकाने से ।
जब समझ प्रेम में डुब गई तो अब, क्या होगा समझाने से ।
तुम हार मान लो बनवारी , बदनाम ना हो जाए यारी ,
हारोगे हारे हो सब दिन, पछताओगे इतराने से ।
तुम ही तो सबकुछ मेरा है , यह कहा हुआ भी तेरा है ,
जग में भी बढ़ता प्यार सदा , पिय के घर आने जाने से ।
जग छुट तो छुटे, संसार के सारे रिस्ते टुटे तो टुटे , सारे लोग नाराज हो जाए तो हो जाए , जग दुश्मन बन जाए तो बन जाए , समाज ना पुछे ना सही । हरि गुरू से हमारा रिस्ता अब कभी नहीं टुट सकता है । चाहे दु:खों का पहाड़ आन परे । शरीर भी ज़बाब दे दे चाहे । हरि गुरू हमारी आत्मा है , प्राण हैं । उनसे दुर नहीं रह सकता कभी , चाहे जो कीमत चुकानी पड़े , ।
ऐसे भी संसार छुटेगा हीं एक दिन , शरीर भी छुटेगा हीं । ए धन , दौलत , शोहरत , दोस्त , दुश्मन , सब दो दिन का हीं है । छुटना तय है । आज साथ छोड़ दें या कल , छुटेगा हीं । तो भला हम इन सबके खातिर अपने परम पुज्य श्री कृपालु महाप्रभु को क्यों भुलें ।
श्री कृपालु महाप्रभु हीं एक मात्र हमारे है , वही हमारे शास्वत माता पिता हैं ।
हम उनके काबिल नहीं पर वो तो हमारे है । वो तो दिव्य हैं । वही हमारे धन हैं । जीवन धन भी वहीं और आत्मा रमण भी वही हैं ।
मुझसे रिस्ता वहीं रख सकता है जिनको हरिगुरू से सच्चा प्रेम है । श्रीकृष्ण का वास्तविक भक्त ही मेरे संबंधी हैं । मां जगदम्बा जो राधारानी है का वास्तविक भक्त से हीं मेरा आत्मीयता का रिस्ता है ।
मैं किसी को धोखे में नहीं रखना चाहता हुँ ।
जो हरि गुरू से , भगवान श्री कृष्ण से , राधा रानी से वास्तविक प्रेम करतें हैं वहीं मेरा दोस्त , रिस्तेदार , नातेदार हैं । वांकी लोग मेरा त्याग सदा के लिए कर सकतें हैं चाहें,। मैं उनका आभारी रहुंँगा । मेरी उनसे ना राग होगा और ना हीं द्वेष ।
मेरी चिंता करने वाला मेरा गुरूदेव हैं । मेरी मां राधिका हैं और पिता श्री कृष्ण हैं । और पुज्यनियां मां रासेस्वरी देवी हैं । और उनका वास्तविक भक्त हैं । मां जगदंबा ( राधारानी ) के भक्त के चरणों में मेरा हर वक्त नमन है ।
मैं जैसा भी हुँ अपने गुरू का धन हुं । यहीं मेरी वास्तविकता है । यहीं मेरी सच्चाई है ।
ना मैं भक्त हुँ । ना एक अच्छा साधक हुं । मैं अवगुणों की खान हुं । पर मेरा गुरू मेरे साथ हैं । कभी ना कभी तो कृपा होगी इसका विश्वास हैं । वो मेरे हैं बस और कुछ नहीं ।
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