पुज्यनिया मां रासेस्वरी देवी जी के श्री मुख से -
सूक्ष्म संवेदिता एक रहस्य , एक सच्चाई । निज अनुभव ।
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विचारों का संचार बिना किसी स्थूल माध्यम के करने की प्रक्रिया को दूर संवेदिता या सूक्ष्म संप्रेषण कहा जाता है । एक सामान्य मस्तिष्क दूर संवेदों को न तो पूरी तरह भेजने और न ही उसे प्राप्त करने में सक्षम होता है । हाँ , इसे अवश्य ही विकसित किया जा सकता है समुचित अभ्यास द्वारा । सूक्ष्म संवेदना में समय, दूरी और भाषा बाधक बनकर खड़ी नही होती । क्योंकि विचार शब्द के रुप में संप्रेषित नहीं होता वरण् जो वास्तविक विचार किसी के मस्तिष्क में चलता है, वह भाव रुप में दूसरे मस्तिष्क तक पहूँचकर पुन: विचार रुप में रुपांतरित होकर उस तक संप्रेषित होता है । यहां मस्तिष्क की सचेतना ही कार्य करती है ।
आध्यात्मिक जगत में इस प्रकार के संप्रेषण का बड़ा महत्व है । अनेकों प्रमाण , आख्याण भारतीय परंपरा में भरे परे हैं जब गुरु अपना मार्गदर्शन सूक्ष्म संप्रेषण रुपी आन्तरिक पथ द्वारा अपने शिष्यों को प्रदान किया करते थे और आज भी कर रहें हैं ।
यानि मार्गदर्शन सीधे मन-से-मन, ह्रदय-से-ह्रदय और आत्मा-से-आत्मा तक ।
एक समय आता है जब शिष्यत्व की परिपक्वता पर शिष्य वह सबकुछ भी बिना किसी माध्यम के दूर से सबकुछ सुनने लगता है, जो गुरुवर मूक संप्रेषण के द्वारा उस तक पहूँचाना चाहते हैं या शिष्य के किसी भी प्रश्न , जिज्ञांसा का समाधान या मार्गदर्शन मूक संप्रेषण के द्वारा करने लगते हैं । अब वह अपने गुरुवर की कही-अनकही बातों, उनके मनोभावों को ही नही समझता, वल्कि उनके बीच संवादो का आदान प्रदान के लिए किसी माध्यम की जरुरत ही नही रह जाती है ।
इसे आज के वैज्ञानिक युग मे विज्ञान ने भी माना है और नाम दिया है मूक संप्रेषण, इस पर शोध भी चल रहे हैं ।
ऐसे मे जहां तक हमारे श्री महाराज जी की बात है ! जिस प्रकार वे प्रवचन और सत्संग के माध्यम से अपनी अहैतुकी कृपा आम लोगों के मध्य वितरित करते हैं उसी प्रकार वे अपनी विशेष कृपा सूक्ष्म संप्रेषण द्वारा अपने कृपा पात्रो को बाँटते हैं ।
श्री महाराज जी अकसर ही कहा करते थे कि जो साधक मेरी स्थूल उपस्थिति तक ही सीमित रहते हैं, मुझसे आन्तरिक तार नहीं जोड़े रखते, उनका संबन्ध मेरे स्थूल अस्तित्व तक हीं सीमित रह जाता है और मैं भी उससे उसी स्तर पर संबंध रख पाता हूँ । , किन्तु जो दूर रहकर भी आन्तरिक स्तर पर मेरी उपस्थिति का सदैव अनुभव करते हैं, वे सदा मेरे करीब हैं । तभी तो अनेकानेक साधकों का यह दावा है कि उन्हे दूर रहकर भी अपने गुरुवर के दर्शन , उनका मार्ग दर्शन प्राप्त होता था और आज भी प्राप्त हो रहें हैं ।
जब कोई आध्यात्मिक क्षेत्र में कदम रखता है तो उसे अपने गुुरु से आन्तरिक संबंध अवश्य ही स्थापित करना चाहिए क्योंकि तभी आन्तरिक सम्प्रेषण संभव है ।
साधक के लिए अपने गुुरु से संबंध बनाए रखने की यही एक सबसे कारगर विधि है । और इसी विधि द्वारा गुरु अपने शरणागतों से जुड़े रहते हैं ।
एक रहस्य की बात आपको बतलाऊँ ! जो साधक सुदूर क्षेत्रों में रहते थे, वे कई बार उन साधकों की तुलना में अधिक गहरा संबंध जोड़ पाए जो श्री महाराज जी के सन्निकट रहे ।
साधकों द्वारा श्री महाराज जी से आन्तरिक संबंध स्थापित करते ही उन्हे संदेश ठीक उसी प्रकार प्राप्त होने लगते हैं जैसे तार को सर्किट हाऊस से जोड़ते ही उसमें विद्युत का प्रवाह स्वयं: ही होने लगता है । अर्थात् गुरु की ऊर्जा उस शिष्य की ओर बहने लगती है ।
तन-मन-धन की सेवा के माध्यम से श्री महाराज जी अपने अनुयायियों को उनके आन्तरिक परिवर्तन में सहायता करते हैं ताकि वे अपनी ऊर्जा और अपने ज्ञान को प्रवाहित करने का उपयुक्त संवाहक उन्हे बना सकें ।
गुुरु और साधक के बीच संप्रेषण की स्थिति उसकी शरणागति विशेष पर निर्भर करती है ।
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