Friday, 20 November 2020

सफ़र-ए- जिंदगी का तू अकेला ही मुसाफिर है,

सफ़र-ए- जिंदगी का तू अकेला ही मुसाफिर है,
बेगाने हैं ये सब जो अपनापन जताते हैं,
छोड़ जाएँगे ये साथ इक दिन तेरा राहों में
वो जो आज खुद को तेरा हमसफ़र बताते हैं।
तेरा साथी बस मात्र हरि गुरू हीं होगा ।
वही तेरा रक्षक और वही तेरा रह-गुज़र होगा । ।

तेरी जिंदगी की असलियत का
जब तुझ पर असर होगा,
असल में उस समय ही
शुरू तेरे जीने का सफ़र होगा।

मत कर गुरूर खुद के वजूद पर
इक दिन न इसका नाम-ओ-निशां होगा,
कितना भी भाग लो मौत से लेकिन
सफ़र-ए-जिंदगी का यही आखिरी मुकाम होगा।।

( मेरी कविता ।)

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