बहुत बहुत महत्त्वपूर्ण :-
Radha Rani दीदी , जब जीव को ऐसी अवस्था प्राप्त हो जाती है जिसमें हरि गुरू के सिवा कुछ भी नहीं दिखे , और ना वो कोई संसारिक शब्द ग्रहण करें , हर वस्तु व्यक्ति में भगवान नज़र आए तो वो अपने माईक ज्ञान इंद्रियों से उपर उठ जाता है ।
वो हजारों के बीच रहने के बाद भी , यानि घोर कुसंग का बातावरण में रहने के बाद भी उसे यह सब विचलित ना करें अंदर से , आंतरिक चेतना के स्तर पर तभी असली भक्ति की शुरूआत होती है । और ऐसी अवस्था में आने के बाद हीं वो असली शिष्य होता है अपने गुरू का , यह शुरूआत है ।
वर्णा जीव अभी प्ले स्कूल में हीं है ।
और जब जीव विना किसी स्थूल जगत के माध्यम से , यानि माईक कर्मेंद्रिया और ज्ञानेंद्रियों से परे होकर अपने ईष्ट और गुरू को अपने आंतरिक चेतना के स्तर पर महसूस करने लगता है तो उनका तार वेतार रूप मानसिक स्तर पर अपने हरिगुरू से जुड़ जाता है ।
वो जीव फिर इस स्थूल जगत के सुख दुख , अच्छाई बुराई , भला बुरा की भावना से ऊपर उठ जाता है , सारा संसार उसे भगवद् मय नज़र आता है , हर किसी में अपना ईष्ट और उनकी वाणी सुनाई देता है ।
भला ऐसे जीव को भला बुरा का एहसास , संसारिक सुख दुख का एहसास क्यों हो !
वो भगवान के इस सृष्टि को साक्षि भाव से देखता है और साक्षि भाव से व्यवहार भी करता है संसार में ।
वो जीव उस दिव्य अवस्था को पा लेता है जिसमें उसे अपने हरि गुरू से प्राप्त दिव्य चेतना काम करने लग जाती है ।
अव वो जीव आंतरिक स्तर पर हमेशा मस्ती में रहता है,एक दिव्य नशे में रहता है और केवल उपर से साक्षि भाव से संसार में कर्म करने लगता है ।
संसार से विल्कुल डिटैच होकर संसार का कर्म करता है वो जीव ।
इस स्तर पर पहुंचने के बाद उसके सारे कर्म भगवान के द्वारा होने लगता है , गुरू के द्वारा होने लगता है ।
जीव तो हमेशा प्रेम रस में , आनंद में खो जाता है , उसे भला बहिरंग व्यक्ति , कोई जीव या घटना विचलित क्यों करेगा ?
हर तरफ प्रेम हीं प्रेम , संसार में कोई गाली दिया उसका भी कोई फिलिंग नहीं , तारिफ किया उसका भी कोई फिलिंग नहीं ।
विल्कुल स्थित प्रज्ञ की अवस्था की प्राप्ति ।
उसके लिए तो सारा संसार प्रभु का है , सब जीव जंगम , स्थावर ,सब उनका है , ऐसा महसूस होता है ।
कोई भी घटना , दुर्घटना सब उस जीव के लिए प्रभु की मर्जी से होता हुआ देख कर उसे हर जगह प्रेम हीं प्रेम महसूस होता है ।
कोई गाली दिया तो प्रेम , विरोधी बातें किया तो भी प्रेम ।
ऐसी अवस्था सिद्धावस्था कहलाती है ।
इस अवस्था में पहुंचने के बाद उस जीव के माईक कर्मेंद्रियां से किया कर्म और ज्ञानेंद्रिया यानि आंख ,नाक , कान , जीव, त्वचा से प्राप्त किसी संवेदना का कोई महत्त्व नहीं होता ।
उसको तो दिव्य ज्ञानेंद्रिया मिल जाता है या यूं कहिए की गुरू के द्वारा इन्ही इंद्रियो को दिव्य बना दिया जाता है जिससे वो जीव डाईरेक्ट अपने गुरूसे हर क्षण जुड़ा रहता है विना माध्यम के , और प्रत्येक क्षण उसे दिव्य संगीत (गोलोक वाला) सुनाई देता है संप्रेशन के माध्यम से ।
इसलिए अगर हम अभी यह भेद महसूस कर रहें हैं कि कोई हरि गुरू के विपरित बातें कर रहा है या कोई अनूकूल बातें कर रहा है तो इसका मतलब है कि हमारा कान ,नाक, मुख , आंख और त्वचा संसारिक रस रूप गंध और और शब्द में हीं मसगुल है और असली साधना की शुरूआत हुई हीं नहीं है अबतक ।
दीदी आपके प्रश्न का उत्तर श्री महाराज जी, मेरे उसी अंतर्चेतना के स्तर पर दिए हैं । यह उत्तर उनके द्वारा संप्रेषित है मुझे माध्यम बना कर । श्री राधे ।
आपका और सबका कल्याण हो । जय जय श्री राधे ।।
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