Friday, 4 December 2020

गोलोक - जिस गोलोक में नित्य नवीन लीलाएँ हो रही हैं , उस गोलोक का वर्णन संक्षिप्त में :- श्री कृपालु महाप्रभु जु ।

गोलोक - जिस गोलोक में नित्य नवीन लीलाएँ हो रही हैं , उस गोलोक का वर्णन संक्षिप्त में -
प्रकृति से परे कारण समुद्र, उससे परे सिद्ध लोक, उससे परे शिवलोक, उससे परे परव्योम लोक है जहाँ अनंत भगवद् रुपों के अनंत बैकुण्ठ लोक हैं । उस परव्योम लोक के उपर सहस्त्र दल कमल के आकार का एक धाम है, जिसे गोलोक कहते हैं । 
उस कमल के कर्णिका के स्थान पर श्रीकृष्ण का महल अन्त:पुर है, जिसमें नंद-यशोदा के साथ श्रीराधा सहित श्रीकृष्ण वास करते हैं । कमलाकृति गोलोक के इतने भाग का नाम गोकुल है । उस कमल की पंखुड़ियों के स्थान पर गोप-गोपसुन्दरियों के उपवन हैं । ये उपवन गोकुल के मार्ग से मिले हुए हैं । ये मार्ग पंखुड़ियों के मूल संधि स्थान पर हैं । पंखुड़ियों के अग्र भाग की संधियों के स्थान पर गौओं के निवास या गोष्ठ हैं, जिसे केलि वृन्दावन या श्री वृन्दावन कहते हैं । प्रभु इन्ही स्थानों में नित्य अप्रकट लीला करते हैं और ब्रह्मा के एक दिन में इस पृथ्वी पर अवतीर्ण होकर अपनी लीला को परिकर एवं धाम सहित प्रकट करते हैं एवं जीवों को उसे देखने की शक्ति भी प्रदान करते हैं । :- श्री महाराज जी

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