वातावरण का प्रभाव
हमारे गुरुदेव ने बहुत सुन्दर एक बात कही है, जिसमें उन्होंने वातावरण का हमारे मन पर क्या प्रभाव पड़ता है, उसकी चर्चा की है |
"दिन में कई बार ऐसा होता है कि आपको जैसा भी वातावरण मिलता है ,वैसे ही आपकी मनोवृत्तियाँ भी बदलती जाती हैं। कभी तो ये विचार होता है कि अरे! पता नहीं कब टिकट कट जाये,शीघ्र से शीघ्र कुछ साधना कर लेनी चाहिए। संसार तो अपने आप छोड़ देगा नहीं, फिर संसार ने पकड़ भी तो नहीं रखा है, मैं स्वयं ही जाकर उसमें पिस रहा हूँ।
कभी यह विचार उत्पन्न होता है ,अरे! कर लेंगे, जल्दी क्या है, समय बहुत पड़ा है, ऐसी भी क्या जल्दी है। फिर अभी अमुक-अमुक संसार का काम (ड्यूटि ) भी तो करना है। रात तक कर लेंगे.....कल कर लेंगे। इत्यादि। कभी-कभी यह विचार पैदा होता है 'अरे यार! खाओ,पियो,मौज उड़ाओ,चार दिन की जिंदगी है ,आगे किसने देखा है क्या होगा भगवान वगवान तो बिगड़े हुए दिमाग की उपज है'। पता नहीं वह मौज उड़ाने का क्या अर्थ समझता है। अरे मौज तो महापुरुष भी चाहता है।
अस्तु, यह सब अंतरंग गुण-वृत्त्यिओ का दैनिक परिवर्तनशील अनुभव है जिसे आप भली-भाँति समझते हैं। अब यह देखिये कि उपर्युक्त रीति से अपनी ही मनोवृत्तियाँ कैसे बदल जाती हैं। किसी क्षण में मान लीजिये कि आपकी मनोवृत्ति यह हुई कि मैं चलूँ कुछ साधना कर लूँ । इतने में ही रजोगुण या तमोगुण आदि का वातावरण विशेष मिल गया ,अर्थात स्त्री पुत्रादि का आसक्ति वर्धक कुछ विषय मिल गया तो हमारी मनोवृत्ति उन गुणों के वातावरण को पाकर फिर बदल गयी एवं हम तत्क्षण साधना से च्युत हो गये। "
भावार्थ यह कि हमारी मनोवृति तीन गुणों के आधीन है, उसपर से जैसा वातावरण मिल जाता है, मन का चिंतन वैसा ही होने लगता है | संग का बहुत गहरा प्रभाव हमारी चितवृत्ति पर पड़ता है | इसीलिए कहा जाता है कि जैसा करोगे संग, वैसा चढ़ेगा रंग ||
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