Friday, 11 December 2020

दु:ख का असली कारण और निदान ।

बहुत-बहुत महत्त्वपूर्ण , अंत तक पढ़े जरूर :- 
दु:ख दो प्रकार का होता है । एक भावनात्मक यानि मानसिक संताप या रोग ,जो इनटैगिबुल होता है , दुसरा शारीरिक यानि टैंगीबुल ।

 अब शारीरिक दु:ख भी दो प्रकार का होता है , एक साध्यरोगात्मक शारीरिक  दु:ख  और दुसरा असाध्यरोगात्मक शारीरिक  दु:ख  । 
इन दोनों दुखों का कारण शारीरिक पीड़ा है । 
साध्य रोग औषधी से या शल्य चिकित्सा क्रिया से ठीक हो जाता है ।
पर असाध्य शारीरिक रोग खराब प्रारब्ध के कारण होता है । 
यह भोगने के बाद ठीक हो जाता है नहीं तो मृत्यु तक पीड़ा झेलनी होती है ।

साध्य शारीरिक रोग भी मन मस्तिष्क के गड़बड़ी का परिणाम है । 
हमारा भोजन ,  अन्न आहार  ग्रहण हमारे मन मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव डालता है । यह हमारे बिचारों को भी प्रभावित करता है । यानी भावनात्मक गड़बड़ी के कारणों में से भोजन के प्रकार का बहुत बड़ा योगदान है ।
भावनात्मक दु:ख हमारे विचारों के विकृति का परिणाम भी है ।और विचारों की विकृति अनावश्यक ईच्छा , अपेक्षा और कुसंगती का फल है । यही राग , द्वेष, घृणा , काम , क्रोध आदि तामसिक प्रवृत्ति का भी जन्मदाता है । दुसरे शब्दों में कहें तो  नकारात्मक संवेदनाओं का स्रोत भी यही है । अतः दु:ख अभाव और प्रभाव का प्रतिफल है ।
अभाव वास्तविक ज्ञान का यानि तत्त्व ज्ञान और भगवद् प्रेम का और प्रभाव कुसंग का  ।  
भोगे रोगभयं कुले च्युतिभयं वित्ते नृपालाद्भयं
माने दैन्यभयम्, बले रिपुभयम्, रूपे जराया भयम् ।
शास्त्रे वादिभयम्, गुणे कलभयम्, काये कृतान्ताद्भयं
सर्वं वस्तु भयान्वितं भुवि नृणां वैराग्यमेवाभयम् ॥ 
(Bhartrihari from the Vairagya shatakam)

“If you are attached to wealth you will fear of poverty. If you are attached to sensual enjoyment you will fear of diseases. If you are attached to prestige you will fear of humiliation. If you are attached to the people you will fear of loss of people . If you are attached to the world and your body you will fear of death .
The momemt you become detached, you become fearless.”

अतः भावनात्मक दु:ख सबसे ज्यादा खतरनाक है । यह पहले तो हमारे मन को बिमार बनाता है। फिर बिमार मन हमारे शरीर में भी रोग उत्पन्न कर देता है ।

यानी साफ्टवेयर खड़ाब होने के बाद हार्डवेयर पर भी असर पड़ता है और हार्डवेयर भी खड़ाब हो जाता है ।

अब अगर हम अपने सौफ्टवेयर को यानी मन को ठीक रखेंगें तो स्वाभाविक है हमारा हार्डवेयर यानि हमारा शरीर भी ठीक ठाक रहेगा ।

अब आप कहेगें की एक्सीडेंट के कारण शरीर जख्मी हो जाता है या अपाहिज हो जाता है जिससे शारीरिक कष्ट हो जाता है ।
तो एक्सिडेंट भी हमारे या किसी दुसरे के लापरवाही का परिणाम होता है । या तो हमारा मस्तिष्क गड़बड़ हुआ , हमारा ध्यान भंग हुआ और हमारा एक्सिडेंट हो गया , या किसी दुसरे का ध्यान भंग हुआ या उसके नासमझी से एक्सिडेंट हो गया ।
दोनों अवस्था में मन ही दोषी है । चाहे मेरा या किसी दुसरे का ।

तो साबित हुआ की मन हीं मानसिक और शारीरिक दोनों प्रकार के  दु:खों का कारण है ।

अब सवाल उठता है कि क्या अगर हम अपने मन को स्वस्थ व संतुलित रखें तो हमे दुख नहीं होगा ?
तो उत्तर है हां , नहीं होगा ।

और मन को ठीक रखने के लिए सबसे पहले सात्त्विक भोजन, यानि शुद्ध आहार यानि सही सही खान पान , फिर सादा परिधान यानि ठीक ठीक पहनावा  उसके बाद विशुद्ध विहार यानि अच्छे लोगों की संगति, संत महापुरुषों का संग और भजनक्रिया, उसके बाद फिर संतुलित निंद और योग की बहुत आवश्यकता है ।

दुसरा  , भावनात्मक संतुलन के लिए ईश्वर का रूपध्यान , मनन , स्मरण, किर्तन यानि सासंग भक्ति बहुत आवश्यक है ।
सासंग भक्ति हीं मन को काबू में रखने का प्रमुख उपाय है ।
अतः भगवान और गुरू की भक्ति से हीं मनुष्य अपने मन पर विजय प्राप्त कर सकता है अपने बल से कादापी नहीं  ।
दुसरे शब्दों में हरि गुरू की भक्ति वो दुर्लभ औषधी है जिससे हम अपने मन की गुलामी से मुक्त होकर अपने मन को बस में करके इसको हरि गुरू का दास बनाकर अपना जीवन सफल कर सकतें हैं ।

नहीं तो जाहिर है कि जाहिलो की तरह हम भी यही कहते फिरेंगे की हम अपने मर्जी यानि मन का मालिक है , जबकि हमको कहना चाहिए की हम अपने मन का गुलाम है । 

भावनात्मक दुख शारीरिक दुख से ज्यादा खतरनाक होता है । यह हमारे मन को तो दुख देता ही है साथ साथ शरीर को भी पीड़ादायक बना देता है । और इतना हीं नहीं हम दुसरे के भावनात्मक दुख का भी कारण बन जाते हैं । 
अतः हमें भोजन के साथ साथ भजन पर विशेष ध्यान देना चाहिए । साथ साथ शरीर को और दुरूस्त रखने के लिए योग , प्राणायाम का सहारा भी लेना चाहिए । फिर हम साक्षी भाव से मन में उठते हुए नकारात्मक भावना को रीड करके उससे उदासिन और सकारात्मक भावना को अपना कर इसका उपयोग मन को शांत रख कर हरि गुरू में और गहरे रूप से लगाकर अपना लक्ष्य हासिल आसानी से कर सकते हैं ।
फिर रूपध्यान के दरम्यान अलौकिक अनुभव को जल्द प्राप्त करते हुए असली आनंद का आभास पाना शूरू कर सकते हैं ।
जिसका मन बेचैन , असंतुलित होता है उसका न भजन में मन लगता है और न सात्विक भोजन में , ऐसे व्यक्ति का मन कुसंग में ही लगता है ।  बिगड़े मन , बहके मन बाले कभी भगवान और गुरू में भरोसा नहीं करते । कारण उनका खान पान दूषित है । जो तमोगुण को बढ़ा देता है । 
अतः ऐसे व्यक्ति को सबसे पहले अपने भोजन को ठीक करना होगा , और फिर बार बार असली महापुरुष का सत्संग सुनना होगा जबरदस्ती , फिर मन धीरे धीरे तमोगुण से रजोगुण , फिर रजोगुण से सतोगुण में विचरण करने लगेगा और फिर जीव का मन भगवान और उनके भक्त यानी संत के संगती में लगने लगेगा । असली रस का आभास यहीं से शुरू होगा  और यहीं से असली यात्रा शुरू होगी और परमानंद की प्राप्ति पर जाकर खत्म होगी । श्री राधे ।।
:- संजीव कुमार ।

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