भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी अभिन्न हैं । दो नहीं है । दोनों एक ही है और दोनों में अंतर भी है ।
यह कैसे हो सकता है कि दोनों एक भी है और दोनों में अंतर भी है । तो हो सकता नहीं वल्कि है ।
भगवान श्री कृष्ण के प्रति अथाह अनंत निष्काम प्रेम का स्वरूप हीं श्री राधा रानी है । दुसरे शब्दों में श्री राधा रानी भगवान श्री कृष्ण के प्रेम की सारभूता तत्व का नाम है ।
श्री कृष्ण परम तत्व है तो श्री राधा रानी उनके प्रेम का परम रस स्वरूप हैं । यानि भगवान श्री कृष्ण तत्व है तो श्री राधा रानी उनकी प्रेम रस सार रूपी गुणात्मक परम रस तत्व हैं ।
भगवान श्री कृष्ण के परम प्रेम रस सार तत्व हीं आज से 5128 वर्ष पहले इस धरा धाम पर श्री राधा रूप में अवतरित हुई थी ।
फिर यही परम प्रेम रस सार रूपी श्री राधा तत्व हीं आज से लगभग 600 बर्ष पहले गौरोगों के स्वरूप में साकार होकर अवतरित हुए थे ।
फिर वही श्री राधा तत्व तीसरी बार साकार रूप लेकर हमारे गुरू देव श्री कृपालु के स्वरूप में इस धरा धाम पर अवतरित हुए थे ।
जिन जिन जीवों के ह्रदय में भगवान श्री कृष्ण के प्रति जो भी प्रेम है , जितनी मात्रा का प्रेम है उन सभी में श्री राधा तत्व के प्रेम रस की उतनी मात्रा प्रकट है ।
यह भगवद् प्रेम यानि ब्रजनंदन श्री कृष्ण का प्रेम बड़ा दुर्लभ है । यह श्री राधा रानी के प्रेम रस गुणों के बिना संभव नहीं है ।
अत: यही कारण है कि ऐसा दुर्लभ प्रेम श्री कृष्ण के प्रति किसी जीव के ह्रदय में प्रकट हो यह श्री महाराज जी के कृपा के बिना असंभव है । आप सब हम सब बहुत भाग्यशाली हैं कि श्री महाराज जी के कृपा के कारण वही श्री राधा प्रेम रस सार हमारे आपके ह्रदय में भगवान श्री कृष्ण के प्रति प्रेम के रूप में हिलोरें ले रहा है । इसका प्रमाण यह है कि श्री महाराज जी के कृपा के फलस्वरूप भगवान श्री कृष्ण के प्रति प्रेम हीं आंसु बन कर आपके कपोलों को भींगा रहा है तर कर रहा है । यही श्री राधा रानी की गुणात्मक प्रभाव है । यह शौभाग्यशालियों के ह्रदय में उत्पन्न होता है ।
इस भगवद् प्रेम की प्यास हीं श्री राधा रानी प्रेम रस रूपी तत्व है जो हमारे आपके ह्रदय में श्री महाराज जी का दिया हुआ प्रसाद है । इस भगवद् प्रेम रस रूपी अमर लता को हम जितना अधिक बढावेगे उतना हमारे ह्रदय में परमानंद प्रकट होगा । जो श्री महाराज जी के बतलाई साधना रूपी जल से सिंचित होकर लगातार बढ़ेगी ।
श्री राधे । उनकी कृपा से यह मेरा आंशिक अनुभव है । और आप सब भी उनके प्रेमी जन हैं वल्कि मुझसे कहीं अधिक है आप सब इसलिेए आपका तो है हीं । यह अनुभवगम्य है आपका और हमारा जो मैने आपसे शेयर किया है । श्री राधे ।
और हां एक बात और , इसी श्री राधा रूपी परम दिव्य प्रेम रस के बढ़ते हुए उत्तरोत्तर प्रवाह को संभालने के लिये हमारे अंत:करण की शुद्धता परमावश्यक है । जैसे गंगा जी को संभालने के लिय भगवान शंकर की जटा ।
अंत:करण शुद्ध होने पर श्री महाराज जु द्वारा इसे दिव्यता प्रदान करने के बाद ही इस परम दिव्य प्रेम के शक्तिशाली अथाह प्रेम के प्रवाह को हमारा ह्रदय संभाल सकेगा और हम सदा के लिय आनंद प्राप्त कर लेंगे । श्री राधे :- आपका संजीव । 🙏🙏🙏❤️🙏🙏🙏🙏
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