Friday, 5 January 2024

विपरित परिस्थित में अनुकूल चिंतन क्या होता है को समझने के लिए सबसे पहले विपरित परिस्थितियां को ठीक से समझना होगा ।

विपरित परिस्थित में अनुकूल चिंतन क्या होता है को समझने के लिए सबसे पहले विपरित परिस्थितियां को ठीक से समझना होगा । 
तब श्री महाराज जी का यह सिद्धांत समझ में आएगा ।

विपरित परिस्थितियां हैं :- माया । संसारिक इंद्रियादिक सुख दुख का फिलिंग को कहते हैं विपरित परिस्थितियां । 
संसार से मोह , धन का लोभ और जो धन है उससे मोह , अपने जन यानि रिस्ते नातेदार यानि पति पत्नी शारिरीक माता पिता पुत्र पुत्री आदि से मोह , अपने संसारिक ज्ञान का अहंकार की मैं बड़ा पढ़ा लिखा हुं डि लीट हुं । तो यह है विपरित परिस्थितियां । 

इनके बिच रह कर और इनसे मन के गहराई से निर्लिप्त होकर , मोह लोभ त्याग कर इन‌ सबको मन से अपना न‌ जान कर और व्यवहारिक रूप से भी अपना न मान कर केवल एक मात्र अपने गुरू तथा ईष्ट को हीं अपना सबकुछ मान कर उनको व्याकूल होकर रो कर पुकारना और केवल उन्हीं के सिद्धांतों पर चिंतन करना है अनुकूल चिंतन । 

और साधना क्या है ? साधना है इन्हीं तमाम संसारिक बिषय वस्तू जीव ज्ञान धन जन से मोह त्यागने का तथा केवल भगवान और गुरू को अपना मानने का उनसे संबंध जोड़ने का व्यवहारिक प्रैक्टिस करना । 

भगवान और गुरु का रूपध्यान करते हुए इन सबसे मोह लोभ अटैचमेंट को गुरू के चरणों में त्याग देना शरणागति है । 
भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि पहले " सर्वधर्मान् परित्यज " उसके बाद "शरणं व्रज " 
यानि मेरी शरणागति तब होगी जब तुम सब कर्म-धर्म , मायाबद्ध रिस्तेदारो , तमाम जन्म का संसारिक ज्ञान को त्याग कर मेरे शरण में आओगे । तब तुम्हारी शरणागति होगी । उसके बाद मैं तुम्हारे सभी पाप और पुण्य दोनों को भष्म करके अपनी शरण में लूंगा और योग क्षेम वहन करूंगा । उससे पहले नहीं । 
इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यः -- सर्वधर्मान् परित्यज्य संन्यस्य सर्वकर्माणि इत्येतत्। माम् एकं सर्वात्मानं समं सर्वभूतस्थितम् ईश्वरम् अच्युतं गर्भजन्मजरामरणवर्जितम् अहमेव इत्येवं शरणं व्रज? न मत्तः अन्यत् अस्ति इति अवधारय इत्यर्थः। अहं त्वा त्वाम् एवं निश्चितबुद्धिं सर्वपापेभ्यः सर्वधर्माधर्मबन्धनरूपेभ्यः मोक्षयिष्यामि स्वात्मभावप्रकाशीकरणेन। उक्तं च नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता (गीता 10।11) इति। अतः मा शुचः शोकं मा कार्षीः इत्यर्थः।।

वो दो एक घंटे को आंख बंद करके और उनका ध्यान कितना कल्प तक करते रहिए लेकिन अपने संसार और संसारिक सुख सुविधा , सुख दुख तथा मायाबद्ध रिस्तेदारो से अटैचमेंट कि समाप्ति जबतक नहीं होगी तब तक कोई भी साधना सफल नहीं हो सकती , भगवान का प्रत्यक्ष अनुभव नहीं हो सकता । साधना के दौरान या उनको याद करने भर से आंखों में असली अश्रु नहीं आएंगे । 

आप सोचोगे माया भी रहे मेरे पास और मोहन‌ भी मिल‌ जाए , तो ऐसा होना असंभव है कभी नहीं हो सकता । माया में रत्ति भर भी धंसे मन को मनमोहन मोहित कभी नहीं करते । 
चाईलेंज है मेरा । 
महाभारत के संजय का मन शुद्ध था इसलिए मनमोहन ने उसको मोहीत कर लिया और धृतराष्ट्र का नहीं, गांधारी का नहीं । 
कुन्ती बुआ त्याग कि प्रतिमुर्ती थी । माया में मन नहीं धंसा था उनका । इसलिए मोहन ने उनका मन मोहीत किया गांधारी का नहीं । 

साधना के लिए एकांत चाहिए, कोलाहल नहीं । एकांत में संसार और संसारिक सभी बिषय वस्तुओं से रत्ति भर तक के अटैचमेंट के त्याग के प्रैक्टिकल प्रैक्टिस को और केवल अपने गुरू और इष्ट से हीं एक मात्र अटैचमेंट रखने के मानसिक भाव को बार बार उत्पन्न करने के उद्धम को साधना कहते हैं और जिस दिन ऐसा हो जाए वास्तव में उसको सिद्धी कहते हैं ।

चलिए महाभारत में । अर्जुन दोनो सेना के बिच खड़े हैं भीड़ से दुर अपने गुरू श्री कृष्ण के सामने , गुरू सत्रह अध्याय तक तत्वज्ञान देकर समझा रहे हैं साधना करवा रहे हैं, फिर अठारहवे अध्याय तक आते आते अर्जुन ने मन से यह स्वीकार कर लिया कि अपने गुरू और ईष्ट को छोड़ कर सब माया है इनसे मोह समाप्त हो गया उसका । 
फिर अर्जुन इन तमाम संसारिक सुख दुख कि कामना , तमाम रिस्तेदारो से मोह और तमाम पिछले जन्मों का मायिक ज्ञान को अपने गुरू श्री कृष्ण के चरणों में त्याग कर दिया और हाथ जोड़ कर खुद को उनके हवाले करके खड़ा हो गया और कहा अब जो आप आदेश देंगे वहीं करूंगा । इसी को कहते हैं शरणागति। 
शरणागति का मतलव यह नहीं कि हम संसार से और संसारिक बिषय वस्तुओं से भी मोह लोभ अटैचमेंट रखें, इन सबको भी अपने मन में रखें और केवल शाब्दिक रूप से गुरू को कहें कि हम आपके चरण शरण में खड़े हैं । 
अरे तुम शरण में हो कहां ? तुम तो अपने मन के अंदर अपने तमाम संसार से अटैचमेंट भर रखें हो ।
नहीं स्वीकार होगी ऐसी शरणागति । 

तो असली शरणागति है इन तमाम संसार से मोह को गुरू के चरणों में त्याग कर केवल उनको अपना सबकुछ स्वीकार करना । तभी संसार से वैराग्य और उनसे प्रेम होगा । नहीं तो असंभव । 

दिव्य बस्तुओं को पाने के लिए मायिक बस्तुओं का त्याग आवश्यक है , यह त्याग मन से होना चाहिए, शरीर से हो या न हो । 
अरे संसार में भी कोई भी संसारिक सामान पाने के लिए बहुत कुछ खोना परता है जीव को , जिसने बचपन में घर के सुख सुविधा का मोह त्याग कर पढ़ाई साधना कि वो डौक्टर इंजिनियर बना , जिसने त्याग नहीं कि वो आवारा बना बैठा है । तो दिव्य बस्तु को पाने के लिए हम संसार को खोना‌ नहीं चाहते और पाना जरूर चाहते हैं यह कपट नहीं चलेगा, यह असंभव है । गुरू दिव्य बस्तु नहीं देगे । चाहे उनके शब्द को कितना भी ग्रहण कर लो और दुसरे को बताओ । चिराग के तले अंधेरा हीं रहेगा आपके । आपको कुछ नहीं मिलने वाला इन‌ लोक रंजनों से । 

जब तक मन से वैराग्य नहीं होगा संसार से, मन से संसार छुटेगा नहीं आपके तबतक आपके मन को दिव्य नहीं बना सकते गुरू । यह मस्तिष्क में बैठ जाएं ठीक से तो अच्छा है ।

जब अर्जुन ने तमाम मोह लोभ संसार का त्याग दिया गुरू के चरण में तब गुरू उसके मन बुद्धि और ईंद्रियों को दिव्य बना कर अपने भगवद् स्वरूप का दर्शन करा दिय। 

अब संजय के मन बुद्धि को कौन दिव्य बनाया ?
तो संजय के मन बुद्धि और इंद्रियों को दिव्य शक्ति से दिव्य बनाया उसके गुरू वेदव्यास जी ने । संजय का मन शुद्ध था इसलिए । 

उन्होंने धृतराष्ट्र के मन बुद्धि और ईंद्रियों को क्यों नहीं दिव्य बनाया ?
तो नहीं बनाया इसलिए कि धृतराष्ट्र अपने पुत्र के मोह में डूबा हुआ था । संसारिक सत्ता के लोभ में धंसा हुआ था उसका मन ।
इसलिए संजय के मुख से महाभारत और गीता का उपदेश सुन कर भी कोई असर नहीं हुआ उस पर ।
जिसका मन संसार में धंसा होता है उस पर सिद्धांत ज्ञान का कोई असर नहीं होता और वो धृतराष्ट्र के तरह एक दिन समाप्त हो जाता है ।

आज यही हो रहा है हम सबके साथ तमाम तत्वज्ञान गीता, रामायण, श्री मद्भागवत्, तथा सत्संग के बाबजूद हम उपर नहीं उठ रहे है़ । हमारा मन धृतराष्ट्र कि तरह अपने संसारिक बिषय वस्तु एवं जन में धंसा हुआ है इसलिए संजय से केवल सुन रहे हैं ,‌ सिद्धांत , तत्वज्ञान आदि हम केवल शाब्दिक ज्ञान के रूप में धृतराष्ट्र कि तरह ग्रहण कर रहे हैं लेकिन उसका वास्तविक अर्थ नही ग्रहण समझ रहे हैं इसलिए हमारी गति भगवान और गुरू कि ओर नहीं हो रही हो , हम अधोगति कि ओर है । 

हम अगति यानि संसार में हीं भटक रहे है और स्वयं को साधक समझने का गलतफहमी पाल रखे हैं । 

इसलिए अपने गुरू को ध्यान करके चिंतन करिए। मेरी इन बातों को गहराई से समझने का प्रयास करिए । यह सब अपने गुरू श्री महाराज जी से दृष्टि पाया है मैंने और आपको बता रहा हुं । अहंकार त्याग कर स्वीकार करिए । मेरी चिंता मत करिए । मुझे समझने में अपना समय बर्बाद मत करिए । मेरी चिंता सिर्फ मेरे गुरू श्री महाराज जी को करने दिजिए । श्री राधे ।

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