उत्तर :- आपका जिज्ञासा विल्कूल सही और उत्तम है , देखिए तत्वज्ञान क्या है सबसे पहले हमें यह समझना होगा । श्री महाराज जी ने हमें तत्वज्ञान करवाया है और आज भी हमें करवा रहे हैं अपने प्रचारकों के द्वारा साथ साथ साधना भी करवा रहे हैं ।
ये तत्वज्ञान बस तीन है । इसी तीन के बारे में अनेकों शास्त्रों में, ग्रंथों में अनेका अनेक श्लोकों के द्वारा लंबी चौड़ी व्याख्या कि गई है। ये तीनों को किसी भगवद् प्राप्त महापुरुष का शरण ग्रहण करके उनके द्वारा ठीक ठीक समझने से तथा उनके बतलाए मार्ग का अनुसरण करने से तत्वज्ञान पक्का हो जाता है जीव को । ये तीन तत्वज्ञान क्या है ?
तो पहला - हम कौन हैं यानी जीव शक्ति कौन है , क्या है ? भगवान से हमारा क्या संबंध है ?
दुसरा - ये संसार यानी माया शक्ति क्या है ?
तीसरा - भगवान कौन है? तथा हम उनको कैसे प्राप्त कर सकते हैं ?
बस इन्हीं तीन बातों को वास्तविक महापुरुष वेदों शास्त्रों की ऋचाएं , श्रूतियों, स्मृतियों के श्लोकों का वास्तविक अर्थ समझाते हुए अपने अनुयायियों को तत्वज्ञान करा देते हैं ।
महापुरुषों के द्वारा पूर्ण तत्वज्ञान हो जाने का मतलव यही है कि श्रूतियों स्मृतियों तथा वेद की ऋचाओं के द्वारा उपर्युक्त तीन बिषय में जीव को ज्ञान हो गया यानि ये तत्वज्ञान संबंधित सिद्धियां जीव को प्राप्त हो चुकी । दुसरे शब्दों में कहें तो तत्वज्ञान हो जाने पर ये वेद की ऋचाएं, श्रूतियां , स्मृतियां जो भगवान श्री कृष्ण के अवतार काल में सगुण साकार रूप में गोपियां बन कर आई थी और लीला में भाग ली थी , यही दिव्य शक्तियां तत्वज्ञ को , साधकों के चारों तरफ से सुरक्षा चक्र बना लेती हैं और रक्षा करती है ।
तत्वज्ञान प्राप्त साधक जब भी कभी मायिक एरिया में मन ले जाता है तो तत्वज्ञान खड़ा हो जाता है उसके आगे उसकी बुद्धि में और साधक के विवेक को जगा देता है , ये खबड़दार तुम जो गलत बात अभी सोंच रहे हो वो गुरू द्वारा बतलाए गए मार्ग तथा शास्त्र के यानि मेरे विपरित है अतः सावधान ! इस प्रकार साधक भूल से भी गलत मार्ग में , या गलत बिषय में भटकने से पहले सचेत हो जाता है और उससे एवाऊट टर्न हो कर भगवान और गुरू के अनुकूल मार्ग पर चलने लग जाता है , अब वो व्यक्ति जिसके पास तत्वज्ञान नहीं है वो भटक जाता है उसका पतन हो जाता है और जिसको तत्वज्ञान पक्का हो चुका है वो नहीं भटकता कभी ।
इस प्रकार तत्वज्ञान एक दैविक शक्तियां हैं जिसे ज्ञान शक्ति, या विवेक शक्ति भी कहते हैं ,ये की ऋचाएं, श्रूतियां, स्मृतियां के रूप में हैं । यह सभी दैविक शक्तियां भगवान श्री राधाकृष्ण के अवतार काल में गोपियों के रूप में सगुन साकार होकर भगवान के परकिया लीला में शामिल हुई थीं ।
और फिर जीव को तत्वज्ञान हो जाने के बाद यही दैविक शक्तियां साधक के चारों ओर अदृश्य रूप में एक अभेध्य सुरक्षा घेरा बना लेती है एवं जब भी साधक का मन कभी माया के एरिया में भटकने का कोशिश करता है तो उसे सावधान कर देती है सचेत करती रहती है, साथ साथ अन्य किसी भी प्रकार के आकस्मिक घटना दुर्घटना या अदृश्य आसुरी बिचारों से, शक्तियों से , आसुरी प्रवृत्तियों से, रजोगुणी तथा तमोगुणी भोग बिषय कि कामनाओं से उसकी रक्षा करती रहती है । ये तत्वज्ञान रूपी दैविक शक्तियां एक वास्तविक श्रोत्रिए ब्रह्मनिष्ट महापुरुष पुरूष की शरणागति तथा उनकी अनन्य भक्ति करने वाले को ही उनसे मिलती है।
जो अनन्य नहीं है, उनका शरणागत नहीं है, श्रद्धा संपत्ति व विश्वास एवं आस्था से रहित है तथा अन्य के पास भी भटकता रहता है , अपने गुरू के बतलाए मार्ग के अलावा अन्य स्वर्ग के देवी देवताओं का या कर्मकांड का भी सहारा लेकर अन्य देवताओं को पुजता है उनके पास तत्वज्ञान नहीं ठहरता कभी , यानि यह दैविक शक्तियां नहीं ठहरती है उनके पास ।
इसलिए देखते होंगे हम आप कि ऐसा साधक जो अपने गुरू के साथ साथ अन्य मार्ग का भी सहारा लेता है , अपने गुरू के अलावा दुसरे के पास भी जाता है उसके तत्वज्ञान कि विस्मृति हो जाती है एन वक्त पर , समय पर तत्वज्ञान काम नहीं आता उसके , और वो गलत बिषय में फंस जाता है, तत्वज्ञान उसको सचेत नहीं करता है । क्योंकि जैसे ही उसकी अनन्यता भंग हुई कि तत्वज्ञान छीन गया उसका , सुरक्षा चक्र समाप्त हो गया ।
अत : तत्वज्ञान एक ऐसी सिद्धियां है जो गुरू के शरणागत तथा अनन्य जीव के पास हीं ठहरती है अन्य के पास नहीं ।
इसलिए शास्त्रों में वेदों में तत्वज्ञान की प्राप्ति के लिए यानि इन सिद्धियों कि प्राप्ति के लिए किसी एक ही महापुरूष की शरणागति और केवल उन्हीं की अनन्य भक्ति पर बल दिया जाता है ।
रत्ती भर भी अनन्यता भंग हुई, तत्वज्ञान संबंधित सिद्धियां जितना मिला वो समाप्त हो जाता है, अत: भगवद् प्राप्ति तक साधक के लिए साधना काल में यानि साधन भक्ति काल में एक ही वास्तविक महापुरुष के प्रति अनन्य होकर केवल उनकी हीं शरणागति करना आवश्यक है और केवल उनके द्वारा बतलाये गए मार्ग का हीं अनुसरण करना अनिवार्य है ।
नहीं तो तत्वज्ञान कान से केवल सुन लिए और फिर अन्य जगह जो भी आया उस हरेक का प्रवचन सुन रहे हैं तो इससे कोई लाभ नहीं होने वाला , कोई तत्वज्ञान नहीं होने वाला और न ए दैविक शक्तियां ठहरने वाला हमारे पास कभी।
बेचारा साधक न तीन में न तेरह में , न इधर का और न उधर का वाली स्थिति में हो जाता है ।
और ऐसा ही साधक कहता फिरता है कि हमको तो कोई अनुभव नहीं होता , हमारे जीवन में शांति नहीं है , मन अशांत रहता है साधना करने के बाबजूद भी ! अरे आपने अनन्यता का पालन किया क्या ? पहले यह देखिए ।
साधना भी कर रहे और अन्य देवी देवता का पुजा कर्मकांड भी कर रहे हैं और शहर में जो आया उसके पास भी जा रहे हैं हर किसी का सत्संग सुनने के लिए !
आजकल तो कुछ साधक लोग सोसल मिडिया या टीभी पर श्री महाराज जी का भी सुनते हैं और दुसरे संतों का भी सुनते रहते हैं तो फिर अनन्य तो आप नहीं रहे तो फिर तत्वज्ञान संबंधित दैविक शक्तियां कैसे ठहरेगी आपके पास । और नहीं ठहरी तो फिर आपकी रक्षा कौन करेगा ? फिर दैविक अनुभूति अनुभव कैसे होना शुरू हो जाए भला ?
शरणागत और अनन्य हो जाने के बाद एक दिन तो क्या हरेक साधना में अनुभूति होने लगती है , गुरू द्वारा हरेक साधना में कुछ न कुछ नित्य नया दिव्य ज्ञान और अनुभव, आध्यात्मिक धन , मानसिक सुख शांति आनंद आदि डायरेक्ट गुरू कृपा से मिलता रहता है , मानसिक आनंद और सुख की झलक मिलने लगती है ।
यह जरा गहराई से बिचार करना चाहिए।
श्री राधे , जय जय श्री राधे ।।
:- श्री महाराज जी द्वारा प्राप्त तत्वज्ञान एवं दृष्टी से ।।
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