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झाड़खंड राज्य के नगर उंटारी प्रखंड , गढ़वा जिले में 1885 में 1280 किलो विशुद्ध सोने का वंशीधर भगवान का स्वयं भू प्रकट प्रतिमा का प्राण प्रतिष्ठा भी मंदिर बनने से पहले हुआ था।
और फिर बनारस से सोने से बना श्री राधा रानी की प्रतिमा बाद में स्थापित की गई थी ।
नगर उंटारी की रानी भगवान श्री कृष्ण की अनन्य भक्त थीं, राज्य में रानी "शिवमणी कुंवर" ही शासक थी, वो राज्य के पुर्व राजा की अविवाहित पुत्री थी जो अपने पिता कि एक मात्र संतान थीं , और ए भगवान श्री कृष्ण को अपना पति मानती थी । नगर में आज भी वो मीरा का अवतार मानी जाती हैं ।
वो भगवान श्री कृष्ण से मिलने के लिए व्याकूल रहती थी । कई कई दिन तक वो श्री कृष्ण के याद में वेहोश रहती थी । वेहोशी में ही भगवान श्री कृष्ण उनको दर्शन दिए और उनके किला से कुछ दुर पहाड़ी पर स्वयं का होने का प्रमाण दिए ।
अत: मुर्छा से उठने के बाद हीं वो दरबार में अपने दरबारियों को बुला कर कहा कि भगवान श्री कृष्ण की प्रतिमा दरबार से कुछ दूर पहाड़ी के टीले पर पीपल के पेड़ के नीचे अवस्थित है , उन्हें लेने जाना है । कुछ सैनिक और कुछ हाथी लेकर सभी दरबारी वहां गए रानी के साथ , एक जगह जब रानी ने अपने हाथों से कुछ ही मिट्टी हटाई तो अंदर से इसी प्रतिमा का अति दिव्य प्रकाश से प्रकाशमान स्वर्ण मुकुट युक्त भगवान का प्रतिमा जो इस पोस्ट में अटैच्ड है वहां दिखाई दिया । यह प्रतिमा अद्भुत है, अद्वितीय है , अति सुन्दर है । यह 1280 किलो सोने का है तथा स्वयंभू प्रकट है ।
इस प्रतिमा को हांथी बदल बदल कर हाथी पर लाद कर लाया जा रहा था । लेकिन रानी के किला के पीछे हाथी बैठ गया , प्रतिमा को वहां उतार लिया गया दुसरे हांथी पर रखने के लिए , लेकिन ये भगवान श्री कृष्ण का प्रतिमा वहां से टसमस नहीं हुआ । अत: यहीं पर इस प्रतिमा के उपर टेंपररी पंडाल बना कर प्राण प्रतिष्ठा किया गया । बाद में वहां मंदिर बना । इसलिए मंदिर आरा तिरछा बना है ।
और बाद में फिर स्वप्न के आधार पर श्री राधिका जी का सोने का प्रतिमा बनारस राज्य के राजा द्वारा भेजा गया जिनको उनके बगल में स्थापति किया गया है ।
भगवान का यह सोने का विग्रह और राधिका जी का विग्रह इतना खूबसूरत है कि अगर कोई भावुक जीव इन विग्रह को लगातार देख ले कुछ देर तक तो ह्रदय में आनंद उमर जाता है , आंखों से अपने आप अश्रुपात होने लगते हैं और भगवान के प्रेम वो मनुष्य वशीभूत हो जाता है और यहां भावुक भक्त अपना सुध-बुध खो देते हैं , यहां से हटने का जी नहीं करता ।
मैंने स्वयं कई बार इनका दर्शन किया है ।
अत: भगवान के इस प्रतिमा में भी मंदिर बनने से पहले प्राण प्रतिष्ठा किया गया था
। रांची से यह मंदिर 250 किलोमीटर दुरी पर अवस्थित है । कहते हैं इस मंदिर को आताताईयों ने लूटने का कई बार प्रयास किया , लेकिन वो सफल नहीं हो पाया और आज तक इस मंदिर को कोई नुक्सान नहीं पहुंचा सका है । सभी देव गंधर्व किन्नर और भगवान श्री कृष्ण के सोलह अक्ष्वनी सेना अदृश्य रूप में इस मंदिर का आज भी रक्षा करते रहते हैं ।
जिसने भी इस मंदीर को नुक्सान पहुंचाने का प्रयास किया वो समाप्त हो गया , उसका नामों निशान मिट गया और हो जाता है । श्री राधे ।
और जो अटूट श्रद्धा विश्वास शरणागत तथा निष्काम प्रेम भाव से आकर इनका दर्शन करता है उसके करोड़ों पाप नष्ट हो जाते हैं दर्शन मात्रेण, और लौकिक अलौकिक लाभ पा लेता है वो ।
भगवान का यह सोने का स्वयंभू प्रकट प्रतिमा के आधार का पांच फिट भाग जमीन के अंदर है वो भी सोने का है यह आधार नाग का है और उसके फन पर बने सहस्त्र पंखुरी वाला कमल के उपर भगवान खड़े हैं, भगवान की ऊंचाई साढे चार फीट का है । उनका रूप अति मनोहर है । श्री राधे । :- संजीव कुमार, रांची ।
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