Wednesday, 24 January 2024

गुरु के हम सदा ऋणी हैं!

गुरु के हम सदा ऋणी हैं! 

गुरु जीव को बहुत नीचे से उठाकर यानि पाप रूपी पंक से निकाल कर सबसे ऊपर या परम पद पर पहुंचा देते हैं , अर्थात साक्षात् भगवान की गोद में बिठा देते हैं | अनंत जन्मों के दूषित अंतःकरण को, अपने सत्संग से स्वच्छ और शुद्ध बना देते हैं, फिर उसमें अपनी कृपा शक्ति द्वारा भगवान का दिव्य प्रेम भी भरते  हैं | इस प्रकार, गुरु ऐसे असंभव को भी संभव बनाते  हैं, भला उनके ऋण से कोई कैसे उरिन हो सकता है ?

 आध्यात्मिक जगत में जीव का आधार केवल गुरु हैं ! गुरु की कृपा के बिना, उनके मार्गदर्शन के बिना, इस पथ पर चलना सर्वथा असंभव है | भगवान कभी किसी जीव पर स्वयं अपनी अंतिम कृपा अर्थात दिव्य प्रेमदान  नहीं करते , गुरु के माध्यम से ही जीव पर भगवान की अंतिम कृपा - भगवद दर्शन , भगवद प्रेम की प्राप्ति होती है ! इसका बहुत सुन्दर उदहारण श्रीमदभागवत में है | उद्धव भगवान के परम सखा थे, सदा कृष्ण के साथ रहते थे, पर भगवान ने अपने  दिव्यप्रेम का स्वाद उद्धव जी को स्वयं नहीं चखाया  ! दिव्य प्रेम की प्राप्ति के लिए उन्होंने उद्धव को ब्रज में गोपियों के पास भेजा और वहां जाकर उद्धव को जो लाभ मिला, उसे सभी भागवद प्रेमी जन जानते हैं ! 

जीव में यदि आध्यात्मिक पिपासा है तो उसे भगवान से यही प्रार्थना करनी चाहिए कि जीवन में कोई सच्चा महापुरुष मिल जाये और हमारी उन महापुरुष के प्रति सच्ची श्रद्धा हो जाये ! भगवान ऐसी प्रार्थना को जरूर पूरा करते हैं ! ऐसा बनाव अवश्य बनाते हैं और उसी जन्म में उसे गुरु की प्राप्ति हो भी जाती है | 

लेकिन, जिनपर ऐसी कृपा हो चुकी है यानि जिनको गुरु मिल गए हैं, गुरु द्वारा तत्वज्ञान सुनने का सौभाग्य भी मिल गया है और तत्त्वज्ञान समझ में भी आता है उनको तो हरि से बस यही प्रार्थना निरंतर करनी चाहिए कि हे प्रभु ! मैं सदा अपने गुरु का आभार मानूँ | उनकी सेवा में तन , मन, धन, प्राण सब निछावर करूँ और सदा  उनके उपदेशों का स्मरण करता रहूँ | वे मुझसे जिस दीन और मधुर व्यवहार की अपेक्षा रखते हैं, मैं सदा वैसा ही आचरण करूँ ; बस, मुझे ऐसा बना दीजिये ! :- पूज्यनीयां रासेश्वरी देवी जी।

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