वो संसार में रहते हुए भी भीतर से वैरागी तथा हर क्षण हर अवस्था में अपने हरिगुरू का अनन्य तथा शरणागत रहते हुए अंतिम लक्ष्य भगवद् प्राप्ति के लिए मन ही मन हर क्षण साधना करता रहेगा । और इस काल के सफर में भी बड़ा आनंद मिलना शुरू हो जाता है। तत्वज्ञान पक्का हो जाने के बाद से और भगवद् प्राप्ति की लक्ष्य के लिय साधना के सफर के बीच में भी बला का आनंद मिलता है , क्षण क्षण प्रेम की अभुत और अकुत अनुभूति सफर के हर पड़ाव पर बढ़ते जाता है ।
ऐसा हुआ ही नहीं आजतक की कोई अगर अनन्य तथा शरणागत भाव से भीतर से यह रियलाईजेशन कर लें ,श्रद्धा संपन्न होकर पूर्ण विश्वास कर लें कि हम शरीर नहीं भगवान का अंश जीवात्मा है तथा हमारा सभी नाते रिस्ते केवल भगवान तथा गुरू से उसको संसार से वैराग्य और भगवान तथा अपने गुरू से अटैचमेंट न हुआ हो !
श्री महाराज जी ने स्पष्ट कहें है कि साधना काल यानि जबतक तत्वज्ञान पक्का न हो जाए तबतक जीव को अनन्य तथा शरणागति का पालन करना ही होगा । उसके बाद जब साधक का तत्वज्ञान गुरू कृपा से एक बार पक्का हो गया तो वो हमेशा अनन्य और शरणागत हर हाल में अपने आप रहेगा चाहे वो कितना भी गंदा वातावरण में पर जाए या किसी दुसरे का बात उसके कान में परे और सुने । वो भीतर से अनन्य तथा शरणागत अपने गुरू और ईष्ट का ही रहेगा हर हमेशा ।
तत्वज्ञान पक्का हो जाने का क्या लक्षण है ? तो तत्वज्ञान पक्का होने का लक्षण यह है कि साधक के मन में कोई भी संसारिक कामना पैदा न हो स्वाभाविक रूप से । किसी भी संसारिक बस्तू का आभाव या नुकसान हो जाए तो उसका मन स्वाभाविक रूप से रत्ति भर भी विचलित न हो और उल्टा अपने हरि और गुरू के प्रति और भी प्रेम बढ़ जाए कोई नुक्सान होने पर ।
कबीर दास जी के घर में जो थोड़ा बहुत बर्तन था उसे चोर चुरा लिया , वो नाचने लगे अच्छा हुआ , अब बर्तन के चोरी की चिंता भी खत्म । उसके बाद उनके घर को कुछ लोगों ने दुष्टता से जला दिया , वो और भी विभोर हो गए और वोले भगवान ने मेरे उपर बड़ा उपकार किया है। अब सारी धरती हमारी बिस्तर है और आकाश मेरा छत ।
वो फकीर बन कर घुमने लगे ।
अब एक जगह यमुना जी के किनारे अपनी जप की माला अधोवस्त्र और पानी पीने की छोटी मटकी आदि रख कर यमुना जी में स्नान करने गए, तभी एक बंदर ने उनका माला उठा कर भाग गया और उसे तोर कर फेंक दिया और मटकी भी फोर दिया ।
कबीर जी और भी विभोर हो गए और पद बना कर नाच कर गाने लगे :-
मोरी सर से टली बला
भला हुआ मेरी मटकी फूटी
मैं तो पनिया भरन से छूटी
मोरी सर से टली बला
भला हुआ मोरी माला टूटी
मोरी सर से टली बला
माला कहे है काठ की
अरे तू क्या फेरे मोय
मन का मनका फेर दे
सो तुरत मिला दूँ तोय
भला हुआ मोरी माला टूटी
मैं तो राम भजन से छूटी
मोरे सर से टली बला
माला फेरों न कर जपों
और मुख से कहूँ न राम
राम हमारा हमें जपे रे
हम पायो बिसराम
भला हुआ मोरी माला टूटी
मोरे सर से टली बला
हद हद कर के सब गए
और बेहद गया न कोय
अनहद के मैदान में
रहा 'कबीर' सोय
- हद हद कर सब गए यानि सब लोग संसारिक धन जन के लिए जीवन भर हाय हाय करते मर जाता है लेकिन कोई भी यहां से इसे साथ लेकर आजतक नहीं गया ।
इसलिए तत्वज्ञ हाय हाय नहीं करता वो तो निश्चिंत रहता है हर हाल में , विल्कूल स्थित प्रज्ञ की अवस्था और चाईलेंज करता है भगवान को कि ह्रदय से जब जाओगे मर्द बंदौगे तोय । तुम मेरे हृदय से अब निकल कर तो दिखाओ तब तुमको माने ।।
माला तो सांसों का भगवान ने दिया हीं है हमें , तो बहिरंग माला लेकर जपना तो एक दिखावा है ।।
"सांसों की माला में सुमिरू मैं तेरा नाम "
ये बहिरंग माला वाला लेकर जप करने से कुछ नहीं होता । मन और ह्रदय जबतक राममय गुरू सेवा और कृपा से न हो जाए तब तक जप तप व्रत पुजा उपवास यज्ञ कर्म धर्म सब दिखावा है व्यर्थ है , कोई लाभ नहीं है इन सबसे ।
तो जिसके उपर तत्वज्ञान रूपी एंटी रस्ट कोटिंग एक बार चढ़ गई उसका तत्वज्ञान पक्का हो जाता है और तत्वज्ञान पक्का जिसका हो गया वो जीव कुछ भी करे बहिरंग उस पर उसका बहिरंग एक्टिंग उसके अंत:करण को फिर कभी गंदा नहीं कर पाता है ।
श्री राधे । जय जय श्री राधे ।
:- मेरे प्राणनाथ श्री महाराज जी से प्राप्त तत्वज्ञान और दृष्टि से ।
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