Saturday, 6 January 2024

भगवान श्री कृष्ण स्पष्ट कहते हैं कि पहले " सर्वधर्मान् परित्यज " उसके बाद "शरणं व्रज " उन्होंने ऐसा नहीं कहा कि पहले शरणं व्रज फिर सर्व धर्मान् परितज्य ‌।

श्रीकृष्ण - इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यः -- सर्वधर्मान् परित्यज्य सन्यस्य सर्वकर्माणि इत्येतत्। 
माम् एकं सर्वात्मानं समं सर्वभूतस्थितम् ईश्वरम् अच्युतं गर्भजन्मजरामरणवर्जितम् अहमेव इत्येवं शरणं व्रज?
 न मत्तः अन्यत् अस्ति इति अवधारय इत्यर्थः। 
अहंत्वा त्वाम् एवं निश्चितबुद्धिं सर्वपापेभ्यः सर्वधर्माधर्मबन्धनरूपेभ्यः मोक्षयिष्यामि स्वात्मभावप्रकाशीकरणेन। 
उक्तं च नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता (गीता 10।11)
 इति। अतः मा शुचः शोकं मा कार्षीः इत्यर्थः।।

भगवान श्री कृष्ण स्पष्ट कहते हैं कि पहले " सर्वधर्मान् परित्यज " उसके बाद "शरणं व्रज " 
उन्होंने ऐसा नहीं कहा कि पहले शरणं व्रज फिर सर्व धर्मान् परितज्य ‌। 
यानि मेरी शरणागति तब होगी जब तुम अपने सभी कर्म-धर्म , मायाबद्ध रिस्तेदारो , तमाम जन्मो का मायिक ज्ञान-वान को त्याग कर मेरे शरण में आओगे । तब तुम्हारी शरणागति होगी । उसके बाद मैं तुम्हारे सभी पाप और पुण्य दोनों को भष्म करके अपनी शरण में लूंगा और फिर मैं तुम्हारा योग क्षेम वहन करूंगा , तेरा ठेका मैं स्वयं ले लूंगा, फिर तेरी सारी जिम्मेदारी मेरी । उससे पहले नहीं । 

वो केवल मुख से बोलने से नहीं होगी शरणागति और न चरण में सिर पटक देने से । 
ये जो हम भगवान और गुरू के सामने मुख से कहते हैं कि मैं आपसे शरण में हूं । यह चार सौ बीसी है । कोई लाभ नहीं इससे । 

मुझसे प्रेम करना चाहते हो मुझे पाना चाहते हो , मेरी संपत्ति पाना चाहते हो ? जी महाराज तो संसार से आसक्ति तथा प्रेम छोड़ना होगा और केवल मेरे शरण में आना होगा ।‌

वो‌ केवल मुख से बोलने से कि मैं आपसे प्यार करता हुं प्रेम नहीं है । मन में संसार कि भी कामना और मुझसे भी प्रेम का इजहार ? यह छल है । यह असंभव है । जहां मेरी दासी माया रहती है वहां मैं नहीं रहता जी , जितनी मात्रा में संसारिक कामना मिटी है उतना हीं मैं तुमको प्यार करता हुं और तुम मुझे , सीधा सा गणित है । :- श्री महाराज जी के प्रवचन से

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