Thursday, 20 July 2023

आगम और निगम किसे कहते हैं श्रूति प्रस्थान और स्मृति प्रस्थान क्या है ?

प्रश्न :- आगम और निगम किसे कहते हैं श्रूति प्रस्थान और स्मृति प्रस्थान क्या है ? 
उत्तर :- निगम का मतलव भगवान के मुख से निश्रित श्लोकों का समुह , उनके मुख से निकला वाक्य , यानि उनकी आप्त वाणी वेद , वेदांत आदि , जिसे भगवान श्री कृष्ण ने ब्रह्मा , विष्णु तथा शंकर जी को सुनाया तथा ब्रह्मा जी ने मनु , वेदव्यास , नारद, सप्तर्षियों आदि को सुनाया , वेदव्यास ने शुकदेव परमहंस जी को सुनाया अत: इसे श्रूति प्रस्थान भी कहा जाता है और चूंकि यह भगवान के मुख से प्रकट हुआ है अतः इसे विनिर्गत ग्रंथ कहते हैं । 

पहले यह भगवान से लेकर सभी ने अपने शिष्यों को सुनाया था अतः यह सुन कर याद रखने वाला दिव्य वाक्य था , लिखित स्वरूप में नहीं था । इसलिए वेदों को श्रूति प्रस्थान भी कहा गया है । 

फिर द्वापर में वेदव्यास जी ने कलयुग के लोगों का भविष्य देख लिया था कि कलयुग में लोगों कि स्मृति यानि यादाश्त तथा सोंचने एवं समझने कि शक्ति कमजोर होगी, लोग सुनकर जल्द भूल जाएगें इसलिए उन्होंने इसे गणेश जी से लिखवाकर लिखित ग्रंथ का स्वरूप दे दिया । इसलिए वेदों तथा वेदांतों को "निगम" कहते हैं ।

और गीता , श्री मद् भागवद् , रामायण आदि स्मृत ग्रंथ और स्मृति प्रस्थान कहलाते हैं । स्मृत ग्रंथ भी दिव्य तथा चिन्मय ग्रंथ है क्योंकि यह स्वयं भगवान या उनके अवतार या भगवद् प्राप्त महापुरुषों के द्वारा प्रकट किया गया है जैसे वेदव्यास , तुलसीदास, सुरदास, कबीर दास , कालीदास आदि । इसलिए स्मृत ग्रंथ भी निर्दोष तथा निष्कलंक है , दोष रहित है । 

और " आगम " पुराण को कहते हैं , उपनिषद को कहते हैं जो वेदों के श्लोकों को समझने में सहायक है तथा इनके दिव्य चिन्मय श्लोकों को समझ कर व्यवहार में लाकर उससे मनुष्य अपना कल्याण कर सकता है । 
आगम के बिना वेदों को समझना असंभव है । 
अत: "निगम" यानि वेद, दिव्य तथा चिन्मय आध्यात्मिक साइंस है, शास्त्र है, और आगम इनका व्यवहारिक साइंस है, साधना भक्ति का मार्ग और तरीका , बिधि , निषेध , उपाय , मंत्र , तंत्र , पुजा, पाठ , यज्ञ , हवन विधि आदि का ग्रंथ है जैसे आयुर्वेद, वैदिक ज्योतिष शास्त्र , कर्मकांड वाली, पुराण , उपनिषद आदि आगम शास्त्र है । 

ऐसे वेदों को वास्तविक महापुरुषों के अलावा कोई सही से समझा नहीं सकता । अत: वास्तविक महापुरूषों के द्वारा इसे आसान बना कर समझाया गया उनके लिखे ग्रंथ प्रवचन आदि को भी आगम कहते हैं । 

अत: श्री कृपालु महाराज जी द्वारा लिखा गया तमाम ग्रंथ , पद् संकीर्तन आदि भी "आगम" है । आगम और निगम दोनों निष्कलंक है , पुंदोष पंक रहित है , दिव्य हैं ।

एवं जो मनुष्य भगवद् प्राप्त नहीं थे या नहीं है फिर भी वेदों को विनिर्गत तथा स्मृत ग्रंथों को अपने मन से अर्थ किया है या यूं कहें कि अर्थ का अनर्थ किया है , अपने मायिक भ्रांत बुद्धि से इनका गलत अर्थ किया है वो कृत ग्रंथ कहलाता है । 
यह कृत ग्रंथ हीं हिन्दू धर्म में अनेको अंधविश्वासों को बढ़ावा दिया है क्योंकि यह कुछ लोगों के अपने परसेशन के आधार पर उनके द्वारा लिखा गया मनगढ़ंत बातों की किताबें है , इसलिए इसमें अनेकों प्रकार के दोष है , यह अशूद्ध है एवं मार्ग से भटकाने वाला है । वास्तविक साधकों को इनका सहारा नहीं लेना चाहिए कभी , यह कुसंग है मायिक पुस्तकें हैं क्योंकि मायाबद्ध लोगों के द्वारा लिखा गया है । 
:- संजीव। 

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