Thursday, 20 July 2023

गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका गुरूवर ।न तातो न माता न बन्धुर्न दातान पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता ।न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैवगतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका गुरूवर ॥१॥

गुरूदेव का सिद्धांत तथा आदेश है कि हरेक भाव और संकल्प तथा कर्म का रूख अपने गुरू के तरफ मोड़ दो । उसे गुरू के निमित्त कर दो । इसी सिद्धांत और आदेश का पालन करते हुं मैं आदि जगद्गुरु शंकराचार्य जी के भवानी अष्टक के भाव का रूख अपने गुरू के तरफ मोड़ते हुए इस अष्टक से गुरूदेव की बंदना करता हुं तथा उनसे ऊनकी शरणागति प्राप्त करने के लिए प्रार्थना करता हुं । हमारे लिए तो हमारे गुरुदेव कृपालु महाप्रभु ही हमारी मां भवानी स्वरूप भी है । जो उन्होंने अपने लीला में मां भवानी का रूप धारण कर हमें दर्शन दिया था । जिसका विडियो ब्रजगोपिका धाम में के सी डी में भी है । 

गुरू शरणागति भावार्थ सहित : - 
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका गुरूवर ।
न तातो न माता न बन्धुर्न दाता
न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता ।
न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका गुरूवर ॥१॥

भवाब्धावपारे महादुःखभीरु
पपात प्रकामी प्रलोभी प्रमत्तः ।
कुसंसारपाशप्रबद्धः सदाहं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका गुरूवर ॥२॥

न जानामि दानं न च ध्यानयोगं
न जानामि तन्त्रं न च स्तोत्रमन्त्रम् ।
न जानामि पूजां न च न्यासयोगं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका गुरूवर ॥३॥

न जानामि पुण्यं न जानामि तीर्थ
न जानामि मुक्तिं लयं वा कदाचित् ।
न जानामि भक्तिं व्रतं वापि मातर्गतिस्त्वं
गतिस्त्वं त्वमेका गुरूवर ॥४॥

कुकर्मी कुसङ्गी कुबुद्धिः कुदासः
कुलाचारहीनः कदाचारलीनः ।
कुदृष्टिः कुवाक्यप्रबन्धः सदाहं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका गुरूवर ॥५॥

प्रजेशं रमेशं महेशं सुरेशं
दिनेशं निशीथेश्वरं वा कदाचित् ।
न जानामि चान्यत् सदाहं शरण्ये
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका गुरूवर ॥६॥

विवादे विषादे प्रमादे प्रवासे
जले चानले पर्वते शत्रुमध्ये ।
अरण्ये शरण्ये सदा मां प्रपाहि
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका गुरूवर ॥७॥

अनाथो दरिद्रो जरारोगयुक्तो
महाक्षीणदीनः सदा जाड्यवक्त्रः ।
विपत्तौ प्रविष्टः प्रनष्टः सदाहं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका गुरूवर ॥८॥

   ------------------भावार्थ-------------------

भावार्थ श्लोक १ :- हे गुरूवर! पिता, माता, भाई बहन, दाता, पुत्र, पुत्री, सेवक, स्वामी, पत्नी, विद्या और व्यापार – इनमें से कोई भी मेरा नहीं है, हे गुरुदेव एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो, मेरे माता पिता बंधु ईष्ट हो मैं केवल आपकी शरण में हूँ।

भावार्थ श्लोक २. :- हे गुरुदेव मैं जन्म-मरण के इस अपार भवसागर में पड़ा हुआ हूँ, भवसागर के महान् दु:खों से भयभीत हूँ। मैं पाप, लोभ और कामनाओ से भरा हुआ हूँ तथा घृणा योग्य संसार के बन्धनों में बँधा हुआ हूँ। हे गुरुदेव, मैं केवल तुम्हारी शरण में हूँ, अब एकमात्र तुम्हीं मेरी गति मति हो ।

भावार्थ श्लोक ३.:- हे गुरुदेव! मैं न तो दान देना जानता हूँ और न ध्यानयोग मार्ग का ही मुझे पता है। तंत्र, मंत्र और स्तोत्र यज्ञ व्रत उपवास हवन जप तप का भी मुझे ज्ञान नहीं है। पूजा तथा न्यास योग आदि की क्रियाओं को भी मै नहीं जानता हूँ। हे गुरुदेव! अब एकमात्र तुम्हीं मेरी गति मति , बुद्धि तथा विवेक हो, मुझे केवल तुम्हारा हीं आश्रय है।

भावार्थ श्लोक ४. :- हे गुरुदेव! मै न पुण्य जानता हूँ, ना ही तीर्थों को, न मुक्ति का पता है न लय का। हे गुरुदेव! भक्ति और व्रत का भी मुझे ज्ञान नहीं है। हे गुरुदेव! एकमात्र तुम्हीं मेरी गति मति हो, अब केवल तुम्हीं एक मात्र मेरा सहारा हो। मैं आपकी शरण में हूं , मेरा उद्धार करो ।

भावार्थ श्लोक ५. :- है गुरूदेव ! मैं कुकर्मी, कुसंगी, कुबुद्धि (दुर्बुद्धि), पतित और अधम (सदाचार से हीन कार्य), दुराचारपरायण, कुत्सित दृष्टि (कुदृष्टि) रखने वाला और सदा दुर्वचन बोलने वाला हूँ। हे गुरुदेव! मुझ अधम की एकमात्र तुम्हीं गति मति हो, मुझे केवल तुम्हारा ही आश्रय है। मुझे अपनी शरण में ले लो ।

भावार्थ श्लोक ६ :- हे गुरुदेव! मैं ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र को नहीं जानता हूँ। सूर्य, चन्द्रमा,तथा अन्य किसी भी देवता को भी नहीं जानता हूँ। हे शरण देनेवाले अकारण करूण गुरूदेव ! तुम्हीं मेरा सहारा हो, मैं केवल तुम्हारी शरण में हूँ, एकमात्र तुम्हीं मेरी गति मति हो।

भावार्थ श्लोक ७:- हे गुरुदेव! तुम विवाद से , विषाद से , प्रमाद तथा प्रवास में, जल में , अनल में (अग्नि में), पर्वतो में, शत्रुओ माया के दुर्गुण रूपी शत्रुओं से ( काम क्रोध मद मोह लोभ आदि से ) और अज्ञान रूपी वन (अरण्य) में सदा ही मेरी रक्षा करो, हे गुरुदेव ! मुझे केवल तुम्हारा ही आश्रय है, एकमात्र तुम्हीं मेरी गति मति हो। मैं आपके शरण में हुं ।

भावार्थ श्लोक ८:- हे गुरुदेव ! मैं सदा से ही अनाथ, दरिद्र, जरा-जीर्ण, रोगी हूँ। मै अत्यन्त दुर्बल, दीन, बाचाल, विपदा ग्रस्त (विपत्तिओं से घिरा रहने वाला जीव ) भयभीत तथा दुर्वल जीव हूँ। अत: हे गुरुदेव ! अब तुम्हीं एकमात्र मेरी गति मति बुद्धि , विवेक तथा बल हो, मैं केवल आपके ही शरण हूँ, तूम्हीं मेरा सहारा हो। कृप्या मेरी शरणागति स्वीकार कर मुझे सदा के लिए अनुग्रहित करें ।

No comments:

Post a Comment