Thursday, 20 July 2023

एक बहुत महत्वपूर्ण हमारे काम का प्रश्न कुछ लोगों ने पुछा है कि उनको गाने नहीं आता है , यानि उनको लय ताल सुर कि जानकारी नहीं है फिर एकांत साधना में पद को कैसे किस तरह गा कर रूपध्यान करें ?

एक बहुत महत्वपूर्ण हमारे काम का प्रश्न कुछ लोगों ने पुछा है कि उनको गाने नहीं आता है , यानि उनको लय ताल सुर कि जानकारी नहीं है फिर एकांत साधना में पद को कैसे किस तरह गा कर रूपध्यान करें ? 

उत्तर :- देखिये किसी ने आपके मन में एक भ्रान्ति पैदा कर दिया है कि रूपध्यान साधना के लिए एक अच्छा गायक होने कि आवश्यकता होती है , यह धारणा श्री महाराज जी के सिद्धांत ज्ञान , तत्वज्ञान के विल्कूल विपरित है । 
भगवान और गुरू भाव देखते हैं , सुर लय और ताल नहीं देखते हैं अपने साधक का , अगर ऐसा रहता तो बड़े बड़े गवईया हीं केवल भजन कीर्तन का अधिकारी होता ! और भक्ति के लिय योग्यता सुर ताल लय में expertise होना होता । 
जबकि मैं बता दूं कि जितने भी गवईयां है उनका विशेष ध्यान तो अपने सुर ताल और लय को सजाने में लगा रहता है और उपर से उनको अच्छे सुर का अहंकार भी होता है । वो क्या खाक साधना का लाभ उठा पांऐगे , लोगों को खूश करना उनसे तारीफ पाना ऐसे गवईया का विशेष उद्देश्य होता है । 

नंबर दो :- भगवान और वास्तविक महापुरूष अपने इंद्रियों के गुलाम नहीं होते हैं । वो इंद्रियांतित होते हैं , उनको न कर्णसुख कि जरूरत है और न नयन सुख कि जो उनके सामने विशेष सुर ताल और लय वाला एवं सुंदर वस्त्र और आभूषण वाला हीं गा कर साधना कर सकता है । 

सुर ताल लय कि जरूरत आम लोगों के लिए जरूरी है , और सामुहिक साधना में थोड़ा जरूरी है क्योंकि वहां बिना भाव‌ वाले लोग भी होते हैं जो पद संकीर्तन के सुर लहरी में हीं खोने को हीं साधना समझते हैं जबकि सुर लहरी में खोना अपना सुख है जीव का साथियों । कर्ण सुख । और अपना सुख तो साधना है ही और न हो सकता है कभी । 

हमको तो भगवान और अपने गुरू को अपने भाव से रिझाना है न कि अपने सुर लहरी और ताल से । 
भगवान और संत भावक ग्राही होते हैं वो सुर लहरी और लय ग्राही नहीं । 
अगर वो सुर लहरी लय ग्राही होते तो बड़े बड़े गायक जैसे लता मंगेश्कर और बड़े बड़े गवईया आदि को भगवद प्राप्ति हो जाता झट से । 

आजकल कुछ बाबा जी लोग सुर लय ताल में खो कर वाह वाह करते हैं मंत्र मुग्ध हो जाते हैं गायक के गाने पर , ऐसे बाबा जी अधिकतर भोगी होते हैं, अपना सुख , कर्ण सुख में खोने को हीं भक्ति समझते हैं । 
जबकि यह सब लोक रंजन है , जन रंजन । गायक गाते हैं ताकि अधिक से अधिक लोग ताली बजावें और उनका नाम हो , लोग उनको बुक करें , बुलावें , धन दे । 
कईयों को तो गाने के लिए हीं झगड़ते और मनमुटाव करते देखा है मैंने कि हम गाऐगे तो हम गाऐगे । यह सब नामापराध है । 
ध्यान रहे केवल लय सुर ताल का ग्राहक साधक नहीं होते , भक्त नहीं होते , वो अपने कर्ण सुख का ग्राहक होते हैं । अपने मन का रंजन चाहिए उनको लय सूर और ताल से । जरूरी नहीं कि जो लोग लय ताल सूर पर झूमते है वो भगवान के रूप गुण लीला के ध्यान पर , और भाव पर मुग्ध हो । 

तो सिद्धांतों के अनुसार एकांत साधना में आपको जैसे भी गा कर साधना करना आता है गाइए और ध्यान पद के भाव पर रहे न कि सुर लय ताल पर । 

कोई फिकस्ड मत करिए कि इस पद को हमें ऐसे हीं गा कर साधना करना है । नहीं तो नहीं आवे तो हम रूपध्यान कर हीं नहीं सकते , गा हीं नहीं सकते । 

अगर किसी ने ऐसा कहा है आपको तो वो खूद गुमराह है और आपको भी साधना से दूर रखने का पाप कर रहा हैं । 

भगवान और गुरू के यहां ऐसा कोई विशेष रिजर्वेशन नहीं है कि एक बढ़िया गायक हीं रूपध्यान साधना कर सकता है, और जिसको गला नहीं वो एकांत साधना का अधिकारी नहीं है । बड़े बड़े गायक इसी अहंकार में , अभिमान में आज कहीं के नहीं होते और आगे नहीं बढ़ पाते क्योंकि अपने सुर ताल और लय को संवारने पर हीं उनको हमेशा ध्यान रहता है ,‌भगवान के रूपध्यान पर नहीं । गाने का सूक्ष्म अहंकार उनको साधना पथ से कब दूर धकेल देता है यह उनको एहसास हीं नहीं होता । 

इसलिए आप अपने तरीके से गाइए पद को लेकिन ध्यान रखना है कि आपका भाव पद् के अनुकूल हो , पद का जो 'भावार्थ' है वो सही सही हो , उसी भावार्थ के अनुसार रूपध्यान करके न अधिक जोर से और न इतना धीमे आवाज़ में गाइए कि बाहर का शोर सुनाई परे और ध्यान भटके । मैं तो ऐसे हीं करता हूं हर रोज जब भी मन करता है एकांत रूपध्यान साधना में खुद गाता हुं । न‌ मुझे सुर का ज्ञान है न लय का और न ताल का , भगवान और महापुरूष भाव देखते हैं सुर लय ताल कभी नहीं , हमें भगवान और गुरू को रिझाने के लिए गाना है न कि लोगों के मन को लुभाने के लिए इस बात का ध्यान रहे । 
नोट कर लीजिए संसार में लोगों के मन को रिझाने के उद्देश्य से गाने वाला लोक रंजक और हरिगुरू को भाव भक्ति से रिझाने वाला साधक है । भगवान को भाव का अश्रू चाहिए न कि राग लय ताल और सुर का । 
जैसे गाना आवे बेहिचक, बे झिझक गा कर साधना करें। श्री महाराज जी सहयोग करते हैं । 
श्री राधे । अगर भगवान जीव के सुर लय ताल से रीझते तो बैजू बावरा, तानसेन आदि का नाम भगवद् प्राप्त संतों में सुमार होता, तानसेन के गाने से पत्थर पिघल जाता था और हिरण मंत्र मुग्ध होकर आकर्षित होता था न कि भगवान । कहीं सूना है आपने इतिहास में कि किसी जीव के राग रागिनी सुर लहरी लय ताल से प्रभावित होकर भगवान दर्शन दे दिया हो ।

हां सुर ताल लय लहरी से संसारिक जीव और जंतु मुग्ध अवश्य हुए हैं यह इतिहास में भी है, पर भगवान नहीं । भगवान तो भाव से रीझते है । चाहे साधक को सुर लय ताल का जानकारी हो या न हो । हां यह सुर लय ताल नृत्य आदि सहायक होता है मन को इस बहाने कंट्रोल करके भगवान में लगाने के लिए साधन के तौर पर, लेकिन कंपल्सरी नहीं है । नहीं तो वो बेचारा क्या करें जिनको इन साधनों का ज्ञान नहीं , बल नहीं ,‌वो बेचारा रूपध्यान कैसे करता फिर , यह तो खास लोगों का हीं मार्ग हो जाता ।। 

जब से मुझे इस बात का एहसास श्री महाराज जी एकांत रूपध्यान के दौरान आभास कराए तब से मैने पद के भाव पर मुग्ध होने का रहस्य समझ लिया और जब से सुर ताल लय में न झूम कर पद के भाव में खो कर झूमना शुरू किया , ध्यान करना शुरू किया तब से बहुत लाभ पाया है मैंने । 

तो साधना करने के दौरान इस बात का हमेशा ध्यान रखना आवश्यक है कि कहीं हम सुर ताल लय पर मुग्ध होकर तो नहीं झूम रहे हैं । तुरंत सचेत होकर भगवान के रूप गुण नाम लीला में खो जाना चाहिए नहीं तो मन कब घुमा देता है पता नहीं चलता क्योंकि मन को तो बढ़िया लय ताल सुर और साजो बाजों तथा प्राकृतिक साज सज्जा पर हीं खोने का आकर्षित होने का आदत है मायाबद्ध होने के कारण । 

इसलिए संतो ने बहुत बढ़िया कहें है कि :- 

"जगद् का रंग क्या देखूं तेरा दीदार काफी है 
करूं मैं प्यार किस किस से, तेरा एक प्यार काफी है। 
जगद् के साजो बाजों से हुए हैं कान अब बहरे ।
कहां जाके सुनू अनहद तेरा झनकार काफी है ।‌" 

हमें तो भगवान के नाम रूप गुण लीला के वर्णनों के पद के भाव में खोना है न कि संसारिक चमक दमक , सुर ताल लय में । 
भगवान जब यह देखते हैं कि इसका मन तो मुझको छोड़ कर अपने कर्ण सुख में लीन हैं तो मुख फेर लेते हैं ।हमें सावधान रहना चाहिए। 
श्री राधे । :- 
गुरूदेव प्रदत ज्ञान से । :- संजीव कुमार ।।

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