श्री महाराज जी :- तुमलोग नहीं जान सकते इस बात को , नहीं पकड़ सकते । क्योंकि भगवद् प्राप्ति के बाद वो इस बात को छुपाता है संसार से और अपने सारे संसारिक कार्य शरीर संबंधी पूर्ववत करता रहता है जब तक उसकी आयु शेष है ।
लेकिन उसका गुरू जानता है । संसार में जिस जीव को भगवद् प्राप्ति हो जाती है वो इस बात को प्रकट नहीं करता किसी से । गोपनीयता का पालन करता है ।
वो शांत हो जाता है , आनंद में डूब जाता है। उसकी सभी संसारिक कामनाए समाप्त हो जाती है अंदर हीं अंदर ।
एक घड़ा है , खाली है जब उसको तालाब में पानी में डूबाते हैं तो वो आवाज करता है भक भक भक भक भक , और फिर शांत , पानी भर गया उसमें , इसीलिए पानी में डूब जाता है वो , अब आवाज नहीं करेगा कभी क्योंकि उसके अंदर की सारी हवा बाहर निकल गई और उसमें पानी भर चुका । पानी भरने के बाद वो तालाब में डूब गया ।
जबतक खाली था , उसमें हवा भरा था तब तक वो आवाज कर रहा था , लेकिन अब आवाज नहीं करेगा वो । विल्कूल शांत ।
उसी प्रकार जिसको भगवद् प्राप्ति हो चुकी इसका मतलव उसके अंतःकरण की सारी गंदगी निकल गई , अंत:करण शूद्ध हो गया, तथा उसको दिव्यानंद मिल गया अपने गुरू से ।
उसकी संसार संबंधी सभी भौतिक कामनाएं समाप्त हो चुकि और भगवान संबंधित दिव्य बस्तूएं मिल चुका । अब वो नहीं बोलेगा उस भरे हुए घरे के समान । अब उसका बोलना बंद , अब वो शांत हो चुका , तृप्त हो चुका । संतुष्ट हो चुका ।
अब वो खूद को छुपाएगा संसार से । तथा जितनी आयु शेष है, उसमें वो केवल अपना शरीर संबधित आवश्यक कर्म करेगा , लेकिन भीतर से दिव्यानंद में डूबा रहेगा हमेशा ।
इसलिए आप लोग उसको नहीं पकड़ सकते । कोई महापुरुष हीं जान सकता है उसको , और गुरू तो जानता हीं है क्योंकि गुरू के द्वारा हीं उसको दिव्यानंद मिला है । लेकिन गुरू भी नहीं बताएगा संसार को कि इसको भगवद् प्राप्ति करा चुका है । महापुरूष और गुरू भी उसके गोपनीयता की रक्षा करता है ।
:- श्री महाराज जी ।
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