Thursday, 20 July 2023

तो यह मौन क्या है ? किसे कहते हैं मौन मैंने पुज्यनियां मां रासेश्वरी देवी जी से यह समझा था जो प्रस्तूत कर रहा हूं यहां :- क्या मौन खामोश रहने का नाम है ? क्या मौन केवल मुख से कुछ न बोलने का नाम है ? नहीं यह मौन नहीं है ।

हमारे गुरूदेव ने मौन साधना को बिशेष रूप से महत्वपूर्ण बताए हैं । 
तो यह मौन क्या है ? किसे कहते हैं मौन 
मैंने पुज्यनियां मां रासेश्वरी देवी जी से यह समझा था जो प्रस्तूत कर रहा हूं यहां :- 

क्या मौन खामोश रहने का नाम है ? क्या मौन केवल मुख से कुछ न बोलने का नाम है ? 
नहीं यह मौन नहीं है । 

मौन को समझने से पहले हमें मन के प्रकृति और कार्य को समझना आवश्यक है । 
बिचारों के प्रवाह का दुसरा नाम मन है । 
मन कभी शांत या मौन रह हीं नहीं सकता । मन सतत कार्यशील रहता है । परम सुषुप्ति की अवस्था में ही मन निष्क्रिय रहता है । 

तो सवाल उठता है कि क्या परम सुषुप्ति कि अवस्था मौन है ? 
नहीं गहरी निंद्रा में मन बुद्धि दोनों सो जाती है , परम स्तबद्धता कि अवस्था । 
तो यह भी मौन नहीं है । 

तो मौन क्या है ? मौन कैसे रहा जाए ?

तो मौन एक ऐसे बिचारों प्रवाह है , चिंतन का प्रवाह है जिसमें साधक केवल भगवद् बिषयों के चिंतन में खोया रहता है, भगवान या गुरू या दोनों के रूपध्यान गुण लीला धाम के चिंतन में मग्न रहता है । 

मौन एक ऐसी अवस्था का नाम है जिसमें जीव बाहरी कोलाहल , ईर्ष्या, राग द्वेष , जलन, किसी से नफरत वाली भावना रूपी संसारिक बिषयों से ध्यान को हटा कर केवल भगवद् चिंतन में लगाए रखता है । 

रूपध्यान युक्त भगवद् चिंतन वाले अवस्था का नाम है मौन । 

मन चुकि बिचारों के प्रवाह का नाम है , अत: जब मन संसारिक बिषयों से हट कर भगवद् चिंतन में लग जाता है तो इसे मौन कि अवस्था कहते हैं । 
मौन दिव्य बिषयों एवं बस्तूओं को आत्मसात करने का सबसे सशक्त माध्यम है । 

मौन साधना में ही सिद्धार्थ अपने अंदर गौतम बुद्ध को अवतरित किए थे , ग्रहण किए थे । 
गया जी में पीपल के बृक्ष के नीचे मौन साधना के माध्यम से हीं दिव्य ज्ञान को प्राप्त करके वो सिद्धार्थ से गौतम बुद्ध बने , किताब पढ़ कर नहीं । 

इस ब्रह्मांड में अनंत ज्ञान है , लौकिक , पारलौकिक तथा दिव्य सभी प्रकार के ज्ञान से अच्छादित है यह ब्रह्मांड। 

इस ब्रह्मांड में भगवान कि आप्त वाणी , उनके तमाम अवतारों तथा महापुरुषों के द्वारा दिया गया ज्ञान व्याप्त है और आसुरी तामसिक बिषय रूपी कोलाहल भी भरा परा है । इस ब्रह्मांड में भौतिक ज्ञान विज्ञान के साथ साथ आध्यात्मिक ज्ञान विज्ञान आदि भी व्याप्त है । 

भगवान महापुरूष के रूप में इस धरा धाम पर गुरू रूप में अवतरित होकर अपने इन्ही दिव्य ज्ञान को स्वाभाविक रूप से बोध करने के लिए जीव को प्रेरित करते हैं, तामसिक बिषय से मन को हटा कर भगवद‌् बिषय में लगाने की प्रेरणा देते हैं । 

दिव्य ज्ञान के बोध के लिए खाली , शूद्ध एवं दिव्य बर्तन कि आवश्यकता है जिसे हासिल करने के लिए एकांत में रूपध्यान करते हुए उनको रो कर पुकारना मौन है । आर्त पुकार , आरती भी मौन कि अवस्था में हीं संभव है । मौन भगवान से जीव को जोड़ने का एक शक्तिशाली माध्यम है । 

जब तक जीव संसार के कोलाहल को , शोर को , कुसंग को अपने कानों से ग्रहण करता रहेगा और केवल मुख से खामोश रहेगा तो कुछ भी हासिल नहीं कर सकता । और यह मौन कदापि नहीं है । 

यहां तक कि संसार में भी एक कक्षा में विद्यार्थी, शिक्षक के डर से भले खामोश रहे लेकिन उसका मन संसार के बिषय में बाहर भटक रहा है तो यह मौन नहीं है और वो कुछ भी सीख नहीं पाता है अपने क्लास के शिक्षक से । असफल रहता है । 

और दुसरा तामम प्रकार के कोलाहल के बीच है लेकिन उसका कान उन कोलाहल को ग्रहण न करके अपने शिक्षक को हीं सुनने में मशगूल हैं तो वो मौन कि अवस्था है । 

उदाहरण :- लाखों मेंढ़क एक खड़े पहाड़ की चढ़ाई पर चढ़ने में असफल रहा । वहीं एक दुबला पतला मेढ़क उस असंभव सा लगने वाले पहाड़ के चोटी पर चढ़ने में सफल हो गया । 
उसके चढ़ने के प्रयास के समय सभी मेढ़क चिल्ला रहा था " तुम यह नहीं कर पाओगे , बड़े बड़े पहलवान मेंढ़क नहीं चढ़ पाए तो तुम कैसे सफल हो सकते हो ? " 
लेकिन वो सफल रहा । जानते हैं क्यों ? 
क्योंकि वो मेंढ़क बहरा था । वो हतोत्साहित करने वाले के शोर को नहीं सुना और अपना ध्यान अपने लक्ष्य तथा प्रयास पर केंद्रित कर दिया था । वो मौन के अवस्था को प्राप्त था । 

आज संसार में सौ में से कुछ हीं छात्र कलक्टर कमिश्नर , या कुछ भी बढ़िया बनने में सफल होते हैं वांकि नहीं । क्योंकि असफल छात्र मौन साधना के तरह केवल पढ़ाई के उपर हीं ध्यान को केन्द्रित करने के महत्व को नहीं जानते ।‌

इस ब्रह्मांड में अनंत ज्ञान है लेकिन जबतक हम मौन तथा एकाग्र होकर अपने गुरू के दिव्य वाणी को नहीं सुनेंगे , तबतक हम इसे अपने अंत:करण में ग्रहण नहीं कर सकते । 
सुनेंगे और कुछ देर में फिर विस्मृति हो जाएगी । 

आज हमारी स्थिति यह है कि हमारा मन दिव्य वाणी को सुनने से अधिक दुसरे को सुनाने के लिए अधीर रहता है । सुनने से अधिक बोलने के लिए आतुर रहता है । 
पढ़ने से अधिक लोक रंजन के लिए लिखने के लिए व्यग्र रहता है । 

महापुरुषों के वाणी को या उनके पुस्तकों से स्वयं बोधात्मक ज्ञान न प्राप्त करके, ग्रहण न करके इसे नकल करके, लिख कर दुसरे को पढ़ाने के लिए अधिक अधीर रहता है । 

यहां तक कि आज संसार में अधिकतर लोगों का मन महापुरुषों के कोटेशन, उनके प्रवचन आदि से खुद लाभ न लेकर इनका इस्तेमाल दुसरे को ज़बाब देने के लिए करते अधिक पाय जाते हैं । ताकि दुसरा खामोश हो जाए । चुप हो जाए । 
नहले पर दहला वाली बात झूठे अहंकार के कारण । इस चक्कर में उनके स्वयं का कितना नुक्सान होता है इसका अंदाजा उन्हें नहीं होता कभी । 
हमें स्वयं के निर्माण के लिए विशेष रूप से हर क्षण प्रयत्न शील रहना चाहिए, सजग रहना चाहिए।  

हमें यह हमेशा याद रखना चाहिए कि अपने मन को राग, द्वेष, ईर्ष्या,घृणा, बदले की भावना रूपी मन के कोलाहल , बेचैनी तथा संसारिक बिषय रूपी जहरीले बातों से हटा कर भगवान और गुरू में लगा देना ही मौन है , मौन साधना है । और इसी से हमारी अंत:करण कि शूद्धि संभव है । 

सिर्फ मुख से कुछ न बोलना लेकिन मन में संसारिक बिषयों का उथल पुथल चलना मौन कदापि नहीं है । 

:- पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी के उत्तर तथा गुरूदेव से प्राप्त ज्ञान के आधार पर ।

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