सब तजि भजन करौं दिन राति॥
सीता राम चरन रति मोरें।
अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें।।
अब मोहि भा भरोस हनुमंता,
बिनु हरि कृपा मिलहि नहि संता।
राम कृपाँ नासहिं सब रोगा।
जौं एहि भाँति बनै संजोगा॥
सदगुरू बैद् बचन बिस्वासा।
संजम यह न बिषय कै आसा॥
रघुपति भगति सजीवन मूरी।
अनूपान श्रद्धा मति पूरी॥
एहि बिधि भलेहिं सो रोग नसाहीं।
नाहिं त जतन कोटि नहिं जाहीं॥
शरणागत के राम रखवाला
दीन दयाल राम पद प्यारा ।।
जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया।
तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया॥
निर्मल मन जन सो मोहि पावा।
मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥
निज अनुभव अब कहउँ खगेसा।
बिनु हरि भजन न जाहिं कलेसा॥
राम कृपा बिनु सुनु खगराई।
जानि न जाइ राम प्रभुताई॥
जानें बिनु न होइ परतीति।
बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती।।
प्रीति बिना नहिं भगति दिढ़ाई।
जिमि खगपति जल कै चिकनाई।।
कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू।
आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू॥
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं।
जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥
कहहु भगति पथ कवन प्रयासा।
जोग न मख जप तप उपवासा।।
सरल सुभाव न मन कुटिलाई।
जथा लाभ संतोष सदाई।।
मोर दास कहाइ नर आसा।
करइ तौ कहहु कहा बिस्वासा।।
बहुत कहउँ का कथा बढ़ाई।
एहि आचरन बस्य मैं भाई।।
बैर न बिग्रह आस न त्रासा।
सुखमय ताहि सदा सब आसा।।
अनारंभ अनिकेत अमानी।
अनघ अरोष दच्छ बिग्यानी।।
प्रीति सदा सज्जन संसर्गा।
तृन सम बिषय स्वर्ग अपबर्गा।।
भगति पच्छ हठ नहिं सठताई।
दुष्ट तर्क सब दूरि बहाई।।
सीता-राम मनोहर जोरी,
दशरथ नंदन जनक दुलारी।।
मंगल भवन अमंगल हारि
द्रवहूं सो दशरथ अजिर बिहारी।।
राम सिया राम सियाराम जय जय राम ।।
- रामचरित्रमानस ।।
अयोध्या में जो हैं अबध बिहारी
वहीं ब्रज के श्याम बिहारी।।
ब्रज कि जो हैं राधा रानी
वहीं अयोध्या की सीता रानी ।।
जाके प्रिय न राम बैदेही,
तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जदपि परम सनेही। :- विनय पत्रिका ( तुलसीदास)
भावार्थ :- जिसके ह्रदय में राम नहीं, जो राम को नहीं मानता है उनका त्याग करना हीं कल्याणकारी है मानव के लिए चाहे वो कितना भी सगा और चाहने वाला क्यों न हो ।
बिना हरि कृपा के संत रूप में परम दिव्य गुरू नहीं मिल सकता । और बिना गुरू कृपा के कोई राम को नहीं जान सकता , भले वो किताब पढ़ के राम के प्राकृत इतिहास को जान ले , रट ले । लेकिन राम वास्तव में कौन है वो कभी नहीं जान सकता गुरू के बिना । और बिना जाने उनसे वास्तविक प्रिति नहीं हो सकती है कभी । अगर हम राम के वास्तविक दिव्य स्वरूप को जान पाए हैं तथा उससे भी बड़ी बात कि अगर राम से प्रिति उपजी है ह्रदय में तो समझें कि यह गुरू कृपा का परिणाम है । उनके अकारण करूणा का प्रसाद है ।
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