आचारस्य प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः ॥ :- तैत्रियोपनिषद
भावार्थ - सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो, साधना में प्रमाद् अर्थात आलस्य , मत करो, , । श्रेष्ठ पुरूषार्थ तथा कर्मयोग से व्यक्ति को कभी मन नहीं चुराना चाहिए।
साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप ।
जाके हिरदय साँच है, ताके हिरदय आप ।।
साँचे श्राप न लागै, साँचे काल न खाय ।
साँचहि साँचा जो चलै, ताको काह नसाय ।।:- कबीरदास
जो सत्य बोलता है, सत्य आचरण करता है उसे कभी किसी का श्राप नहीं लगता अर्थात् उसका अहित चाहनेवाला उसके सत्यता को नष्ट नहीं कर सकता कभी। सत्य के राही को काल , कल्पना एवं समय-चक्र कोई हानि नहीं पहुँचा सकता ।
सत्य कि विजय हमेशा होती है , बादल कुछ समय के लिए हीं सूर्य या चंद्रमा को ढंक सकता है, हमेशा के लिए कभी नही ।
सत्य केलिए लड़ने की आवश्यकता नहीं होती कभी,सत्य को स्वीकार करने कि जरूरत होती है पहले , सत्य को बिना स्वीकार किए जो सत्य के लिए लड़ने की बात करता है वो मतिमंद है ।
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