तो अभी क्या जो कर रहे हैं वो क्या है ? यह अपने अंत:करण को शुद्ध करने के लिय साधना है । साधना के फलस्वरूप जब अंत:करण शुद्ध हो जाएगा तो गुरू इसे दिव्य बना देगा , दिव्य बना कर फिर भक्ति प्रदान करेगा । इसके बाद हम भगवान को देख सकेंगे , सुन सकेंगे , उनका आलिंगन कर सकेंगे , उनकी सेवा कर सकेंगे , उनकी भक्ति कर सकेंगे , उससे पहले नहीं ।
अभी तो हमारा मन माया का, तन माया का , धन मायिक , और भगवान ठहरे दिव्य , भगवान को ए मायिक बस्तुएँ ग्राह्य नहीं है । फिर हम इन मायिक बस्तूओं से उनकी सेवा कैसे करेगें ? अत: हम भगवान कि जो भक्ति अभी कर रहे हैं वो अपने अंतःकरण को शुद्ध करने के लिए साधन भक्ति कर रहे हैं , इसे शुद्ध करके गुरू से भगवान कि भक्ति प्राप्त करेंगे । जब गुरू से भगवान कि भक्ति मिल जाएगी तब हम भक्त बन जाएंगे , उससे पहले नहीं । :- श्री महाराज जी ।
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