बहुत से ऐसे व्यक्ति भी हैं जो संसार में अपराधी है लेकिन फौलोअर के बल पर लोकप्रिय नेता खुद को घोषित करके खड़े हैं ।
बहुत से ऐसे हीरो हिरोइन है जो अपने काम के अलावा , एक्टिंग के अलावा लोगों को मैनर सिखाते हैं लेकिन स्वयं कैसा कैसा व्यवहार करते हैं ये सबको मालुम है लेकिन उनके कड़ोरो फौलोवर हैं ।
अनेकों ऐसे हैं जो अर्धनग्न घुमते हैं ।
गलत गानों और व्यवहार पर हाथ में दारू लेकर थिड़कते है पव में ।
तो कहने का मतलव है कि भीड़ तंत्र , संख्या बल मुर्खो के बीच अपने बात को सिद्ध करने का एक संसारिक तरीका है।
कुछ लोग आध्यात्म में भी इसी फार्मुले के द्वारा भोले भाले लोगों को ठगते हैं और फिर एक दिन जेल के अंदर , कितने उदाहरण है , कुछ बाबा तो आज भी जेल में है । सबको मालुम है ।
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श्री कृपालु महाप्रभु जी :-
बैन्थावे आए और मिल - इन लोगों ने कहा कि देखो भाई! अपना स्वार्थ पीछे रखो और परार्थ पहले रखो। और बहुमत जो हो वो मानो। बहुमत का सिद्धांत ! आजकल भी चल रहा है। वही बैंथावे मिल का सिद्धांत, इलेक्शन होता है जो बहुमत हो वही कानून पास हो जाए। लेकिन अगर बहुमत मूर्खों का हो तो ? तो,
तो सर्वनाश हो जाए। लेकिन बहुमत सिद्धांत मानना चाहिए। एक हजार गधे, धोबी वाले गधे, इन गधों की बुद्धि इकट्ठा हो के एक मनुष्य की बुद्धि के बराबर तो नहीं हो सकते। तो बहुमत से क्या काम चलेगा ? छः अरब आदमीं में तो बहुमत में बेपढ़े-लिखे हैं। और फिर पॉलिटिक्स जानने वाले कितने हैं ?
अरे, आपके इंडिया में ही, लोकसभा में, विधान सभा में हाथ उठाने वाले अधिक हैं। पॉलिटिक्स जाननें वाले कितने लोग हैं ? तो बहुमत से तो सिद्धांत कोई बनेगा नहीं।
तो आधीदैविकवादी आए, उन्होंने कहा- भई देखो! एक कन्शेन्स होती है वह भीतर बोलती है, उसके अनुसार काम करना चाहिए। तो क्यों जी ! ये सबके अंदर कन्शेन्स एक-सी है तो सबके विचार अलग-अलग है, कोई अच्छा आदमी है, कोई बुरा आदमी है, कोई चोर-डाकू है, कोई अत्याचारी, कोई अनाचारी, दुराचारी, भ्रष्टाचारी है। और अगर एक आदमी की भी, मान लो कन्शेन्स अलग-अलग है सबकी, तो उसकी कन्शेन्स ने अभी तो कहा यह काम मत करो, गलत है फिर दो दिन बाद कहा - करो। तो ये भी सब फिजिकल बातें हैं।
फिर आए कौमन सेंसवादी। ये कहते हैं भई देखो ! कौमन सेंस से काम करना चाहिए। लेकिन ये तो बताओ कि तुम्हारी कॉमन सेंस एक्सपीरिएंस के अनुसार होगी न ? तुम्हें जो अनुभव होगा वही तो तुम्हारी कॉमन सेंस होगी। और मैट्रियल (भौतिक) अनुभव है तुम्हारा ! तो फिर तुम कैसे अपने कौमन सेंस से दिव्य-आनंद का निर्णय करोगे ? ये सब गलत। ये सिद्धांत सबका सब गलत, क्योंकि ये अपनी माइक( मैटिरियल) बुद्धि से बनाया है इन लोगों ने।
पश्चात्य दार्शनिकों ने जो फिलौसोफी बनाई है वो अपने दिमाग से बनाई है और हमारी इंडिया में ऐसा नहीं।
हमारे यहां वैदिक सिद्धांत ही माननीय है। ' 'अपौरूषेय वेद' किसी मनुष्य के बनाए हुए नहीं। मनुष्य के बनाए हुए जितने भी ग्रंथ होते हैं, वह चूंँकि मायाबद्ध है इसलिए उसमें तमाम गलतियां होंगी, भ्रम होंगी, विप्रलिप्सा होगी।
वेद ऐसा ग्रंथ है जो विनिर्गत ग्रंथ कहलाता है। माने प्रकट हुआ है। भगवान् ने भी नहीं बनाया है। वो प्रकट होता है, फिर प्रलय काल में भगवान में लीन हो जाता है और फिर सृष्टि के समय प्रकट होता है। :- पंचम मूल जगद्गुरू श्री कृपालु जी महाराज। ( जीव का लक्ष्य, पेंज 3,4, 5, 6)
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